अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग ६ ] | उत्तरकाण्ड | ३६३ |
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| नाज्ञासीद्गीतवाद्यगरिमा नादर्शि नांश्रावि च ॥ | न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥३२॥ | | एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । | इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ | | आसाते सुखमेकान्ते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥३३॥ | | | अथ रामोऽश्वमेधादींश्चकार बहुदक्षिणान् । | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं-वाले यज्ञ किये ॥३४॥ उस यज्ञशालामें यज्ञोत्सव देखनेके लिये सभी ऋषि, राजर्षि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि आये थे ॥ ३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान् करते हुए कुश और लवको साथ ले वहाँ आये और जहाँ मुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे ॥ ३६ ॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तभावसे बैठे हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुशने कथाके बीचमें ही ज्ञानशास्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३७ ॥ | | यज्ञान् स्वर्णमयीं सीतां विधाय विपुलद्युतिः॥३४॥ | | | तस्मिन्विताने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा । | | | ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुर्दिदृक्षवः॥३५॥ | | | वाल्मीकिरपि सङ्गृह्य गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | | | जगाम ऋषियाटस्य समीपं मुनिपुङ्गवः ॥३६॥ | | | तत्रैकान्ते स्थितं शान्तं समाधिविरमे मुनिम् । | | | कुशः पप्रच्छ वाल्मीकिं ज्ञानशास्त्रं कथान्तरे॥३७॥ | | | भगवन् श्रोतुमिच्छामि सङ्क्षेपान्नृपतोऽखिलम् । | (वह बोला—) “भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे संक्षेप-में यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह सुदृढ संसारबन्धन किस प्रकार प्राप्त होता है ? ॥ ३८ ॥ और फिर इस संसार नामक दृढ बन्धनसे उसे छुटकारा कैसे मिलता है ? हे मुने ! आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत शिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९ ॥ | | देहिनः संसृतिर्बन्धः कथमुत्पद्यते दृढः ॥३८॥ | | | कथं विमुच्यते देही दृढबन्धाह्वयान्मिथात् । | | | वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मह्यं शिष्याय ते मुने ॥३९॥ | | | वाल्मीकिरुवाच | **वाल्मीकिजी बोले—**सुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधन-के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण स्वरूप सुनाता हूँ। मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर तू उसी प्रकार आचरण कर । इससे तेरा कल्याण होगा और तू जीवन्मुक्त हो जायगा । देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा भारी घर है ॥ ४०-४१ ॥ इसमें उसने अहंकारको ही अपना मन्त्री बना रक्खा है। यह अहंकाररूप मन्त्री देहगेहाभिमानरूप अपने आपको चेतन आत्मामें आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं-का आरोप उस चिदानन्दरूप आत्मामें ही करता है। उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही (जीव ) उसीके संकल्प-से प्रेरित होकर संकल्परूपी बेड़ियोंसे बँधता है और फिर रात-दिन पुत्र, स्त्री और गृह आदिके लिये संकल्प-विकल्प करता रहता है ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार | | शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सङ्क्षेपाद्बन्धमोक्षयोः । | | | स्वरूपं साधनं चापि मत्तः श्रुत्वा यथोदितम्॥४०॥ | | | तथैवाचर भद्रं ते जीवन्मुक्तो भविष्यसि । | | | देह एव महागेहमदेहस्य चिदात्मनः ॥४१॥ | | | तस्याहङ्कार एवास्मिन्मन्त्री तेनैव कल्पितः । | | | देहगेहाभिमानं स्वं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | | | तेन तादात्म्यमापन्नः स्वचेष्टितमशेषतः । | | | विदधाति चिदानन्दे तद्वासितवपुः स्वयम् ॥४३॥ | | | तेन सङ्कल्पितो देही सङ्कल्पनिगडावृतः । | | | पुत्रदारगृहादीनि सङ्कल्पयति चानिशम् ॥४४॥ | |