भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] उत्तरकाण्ड ३६१


आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः ।<br>तस्य तुष्टो महादेचो ददौ शूलमनुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>प्राह चानेन यं हंसि स तु भस्मीभविष्यति ।<br>रावणस्यानुजा भार्या तस्य कुम्भीनसी श्रुता ॥ ८ ॥<br>तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः ।<br>आसीदुरात्मा दुर्धर्षो देवब्राह्मणहिंसकः ॥ ९ ॥<br>पीडितास्तेन राजेन्द्र वयं त्वां शरणं गताः ।<br>तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैर्बो मुनिपुङ्गवाः ॥१०॥<br>लवणं नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि भ्रातॄन् को वा हनिष्यति ॥<br>लवणं राक्षसं दद्याद् ब्राह्मणेभ्योऽभयं महत् ।<br>तच्छ्रुत्वा प्राञ्जलिः प्राह भरतो राघवाय वै ॥१२॥<br>अहमेव हनिष्यामि देवाज्ञापय मां प्रभो ।<br>ततो रामं नमस्कृत्य शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥१३॥<br>लक्ष्मणेन महत्कार्यं कृतं राघव संयुगे ।<br>नन्दिग्रामे महाबुद्धिर्भरतो दुःखमन्वभूत् ॥१४॥<br>अहमेव गमिष्यामि लवणस्य वधाय च ।<br>त्वत्प्रसादाद्रघुश्रेष्ठ हन्यां तं राक्षसं युधि ॥१५॥मधु नामक एक बड़ा ही धर्मात्मा और देवता तथा<br>ब्राह्मणोंका भक्त महादैत्य था । उससे प्रसन्न होकर<br>श्रीमहादेवजीने उसे एक अत्युत्तम त्रिशूल दिया ॥ ६-७ ॥<br>और कहा कि इससे तू जिसपर प्रहार करेगा वही<br>भस्मीभूत हो जायगा । सुना जाता है,<br>रावणकी छोटी बहिन कुम्भीनसी उसकी भार्या<br>थी ॥ ८ ॥ उससे उसके लवण नामका एक<br>महापराक्रमी दुष्ट-चित्त, दुर्जय और देवता-ब्राह्मणोंको<br>दुःख देनेवाला राक्षस उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ हे राजेन्द्र !<br>उससे अत्यन्त पीड़ित होकर हम आपकी शरण आये<br>हैं।” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—“हे मुनि-<br>श्रेष्ठ ! आपलोग किसी प्रकारका भय न करें ॥१०॥ आप<br>निश्चिन्त होकर पधारें, मैं लवणको अवश्य मार डालूँगा।”<br>मुनीश्वरोंसे ऐसा कह भगवान् रामने अपने भाइयोंसे<br>पूछा—“तुममेंसे कौन लवण राक्षसको मारेगा और<br>ब्राह्मणोंको महान् अभय देगा ?” यह सुनकर भरतजी-<br>ने श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर कहा-॥ ११-१२॥<br>“देव ! लवणको मैं ही मारूँगा । प्रभो ! इसके लिये मुझे<br>ही आज्ञा दीजिये।” फिर शत्रुघ्नजीने श्रीरामचन्द्रजीको<br>प्रणाम करके कहा—॥ १३ ॥ “हे राघव ! श्रीलक्ष्मण-<br>जी युद्धमें बड़ा भारी कार्य कर चुके हैं, महामति भरत-<br>जीने भी नन्दिग्राममें रहकर बहुत कष्ट सहा है ॥ १४ ॥<br>अब लवणका वध करनेके लिये तो मैं ही जाऊँगा ।<br>हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं उस राक्षसको युद्धमें<br>अवश्य मार डालूँगा” ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा स्वाङ्कमारोप्य शत्रुघ्नं शत्रुसूदनः ।<br>आहाद्यैवाभिषेक्ष्यामि मथुराराज्यकारणात् ॥१६॥<br>आनाय्य च सुसम्भारॉल्लक्ष्मणेनाभिषेचने ।<br>अनिच्छन्तमपि स्नेहादभिषेकमकारयत् ॥१७॥<br>दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं रामः शत्रुघ्नमब्रवीत् ।<br>अनेन जहि बाणेन लवणं लोककण्टकम् ॥१८॥<br>स तु सम्पूज्य तच्छूलं गेहे गच्छति काननम् ।<br>भक्षणार्थं तु जन्तूनां नानाप्राणिवधाय च ॥१९॥शत्रुघ्नके ये वचन सुनकर शत्रुदमन रघुनाथजीने<br>उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया और कहा—“मैं आज<br>ही तुम्हारा (लवणकी राजधानी) मथुराके राज्यपर<br>अभिषेक करूँगा” ॥ १६ ॥ ऐसा कह लक्ष्मणजीसे<br>अभिषेककी सामग्री मँगा शत्रुघ्नजीकी इच्छा न होने-<br>पर भी श्रीरामचन्द्रजीने उनका प्रीतिपूर्वक अभिषेक<br>कर दिया ॥ १७ ॥ फिर उन्हें दिव्य बाण देकर<br>कहा—“तुम संसारके कण्टकरूप लवणको इस बाण-<br>से मार डालना ॥ १८ ॥ राक्षस लवण अपने घरमें<br>ही उस त्रिशूलकी पूजा कर नाना प्रकारके जीवोंको<br>खाने और मारनेके लिये वनको जाया करता है॥ १९॥