भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 391
३६०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥६०॥
अर्थ— निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ ॥ ६० ॥

यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाश्रितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥६१॥
अर्थ— जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरणरजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है ॥ ६१ ॥

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः ॥६२॥
अर्थ— यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा ॥ ६२ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना।

श्रीमहादेव उवाच
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति !

एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः।
आजग्मू राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणरक्षसः ॥ १ ॥
अर्थ— एक दिन यमुना-तटपर रहनेवाले समस्त मुनिजन लवण राक्षससे भय-भीत होकर श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ १ ॥

कृत्वाऽग्रे तु मुनिश्रेष्ठं भार्गवं च्यवनं द्विजाः।
असङ्ख्याताः समायाता रामादभयकाङ्क्षिणः ॥२॥
अर्थ— वे अगणित मुनिगण भृगुपुत्र मुनिश्रेष्ठ च्यवन-को आगे कर भगवान् रामसे अभय-लाभ करनेकी इच्छा-से आये ॥२॥

तान्पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोत्तमः।
उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन्मुनिमण्डलम् ॥ ३ ॥
अर्थ— रघुकुलश्रेष्ठ रामजीने उन मुनीश्वरोंका अत्यन्त भक्तिभावसे पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हुए मधुर वाणीसे कहा—॥ ३ ॥

करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्।
धन्योऽस्मि यदि यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः॥४॥
अर्थ— "हे मुनिश्रेष्ठगण ! आपके यहाँ पधारनेका क्या कारण है ? (मुझे जो आज्ञा होगी) मैं वैसा ही करूँगा। यदि आप लोग मुझे प्रीतिपूर्वक देखनेके लिये ही यहाँ आये हैं, तो मैं धन्य हूँ ॥ ४ ॥

दुष्करं चापि यत्कार्यं भवतां तत्करोम्यहम्।
आज्ञापयन्तु मां भृत्यं ब्राह्मणा दैवतं हि मे ॥ ५ ॥
अर्थ— आपका जो अत्यन्त दुष्कर कार्य होगा वह भी मैं अवश्य करूँगा। आप मुझ सेवकको आज्ञा दीजिये; ब्राह्मण ही मेरे इष्टदेव हैं" ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत्।
मधुनामा महादैत्यः पुरा कृतयुगे प्रभो ॥ ६ ॥
अर्थ— भगवान् रामके ये वचन सुनकर महर्षि च्यवनने सहसा प्रसन्न होकर कहा—"प्रभो ! पहले सत्ययुगमें