अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 386, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ५ ] । उत्तरकाण्ड । ३५५
| वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः ।<br>तत्त्वम्पदार्थौ परमात्मजीवका-<br>वसीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥२५॥ | अर्थका ज्ञान ही कारण है । इस 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'तत्' और 'त्वम्' पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं और 'असि' उन दोनोंकी एकता करता है ॥२५॥ |
| प्रत्यक्परोक्षादिविरोधमात्मनो-<br>र्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम् ।<br>संशोधितां लक्षणया च लक्षितां<br>ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत् ॥२६॥ | इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरणका साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोधको छोड़कर और लक्षणावृत्तिसे लक्षित उनकी शुद्ध चेतनताको ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाने और इसप्रकार एकीभावसे स्थित हो ॥२६॥ |
| एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे-<br>त्तथाऽजहल्लक्षणता विरोधतः ।<br>सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा<br>युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥२७॥ | इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें एकरूप होनेके कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरुद्ध होनेके कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती । इसलिये 'सोऽयम्' (यह वही है) इन दोनों पदोंके अर्थकी भाँति इन तत् और त्वम् पदोंमें भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषतासे हो सकती है * ॥२७॥ |
| रसादिपञ्चीकृतभूतसम्भवं<br>भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम् ।<br>शरीरमाद्यन्तवदादिकर्मजं<br>मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः ॥२८॥ | पृथिवी आदि पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए, सुख-दुःखादि कर्म-भोगोंके आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफलसे प्राप्त होनेवाले इस मायामय आदि-अन्तवान् शरीरको विज्ञजन आत्माकी स्थूल उपाधि मानते हैं |
| सूक्ष्मं मनो बुद्धिदशेन्द्रियैर्युतं<br>प्राणैरपञ्चीकृतभूतसम्भवम् । | और मन, बुद्धि, दश इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अङ्गों) से युक्त और अपञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीरको |
* जहाँ शब्दोंके वाच्यार्थ (अर्थात् उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ) को छोड़कर दूसरा अर्थ लिया जाता है वहाँ लक्षणा वृत्ति होती है । यह जहती, अजहती और जहदजहती नामसे तीन प्रकारकी है । जहतीलक्षणा में शब्दके वाच्यार्थका सर्वथा त्याग करके उसका बिलकुल नया ही अर्थ किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' (गङ्गाजीपर पशुशाला है) इस वाक्यके वाच्यार्थसे गङ्गाजीके प्रवाहपर पशुशालाका होना सिद्ध होता है। परन्तु यह सर्वथा असम्भव है । इसलिये यहाँ 'गङ्गा' शब्दका अर्थ 'गङ्गाप्रवाह' न करके 'गङ्गा-तीर' किया जाता है । परन्तु 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ 'ईश्वर' और 'जीव' का सर्वथा त्याग कर देनेसे उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता है और चेतनताकी एकता ही अभीष्ट है; इसलिये जहतीलक्षणासे इन पदोंके अर्थकी एकता नहीं हो सकती ।
अजहतीलक्षणामें वाच्यार्थका त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी ग्रहण किया जाता है । जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' (कौओंसे दहीकी रक्षा करो) इस वाक्यका अभिप्राय केवल कौओंसे दहीकी रक्षा कराना ही नहीं है बल्कि उसके साथ कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य जीवोंसे सुरक्षित रखना भी है । यहाँ 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थमें विरोध है फिर अन्य अर्थको सम्मिलित करनेसे भी वह विरोध तो दूर होगा ही नहीं; इसलिये अजहल्लक्षणासे भी उनकी एकता सिद्ध नहीं हो सकती । इन दोनोंके सिवा जहाँ कुछ अर्थ रक्खा जाता है और कुछ छोड़ा जाता है वह जहदजहती (भाग त्याग) लक्षणा होती है । जैसे 'सोऽयम्' (यह वही है) इस वाक्यमें 'अयम्' पदसे कहे जानेवाले पदार्थकी अपरोक्षता और 'सः' पदके वाच्य पदार्थकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विरोध पदार्थ है उसकी एकता कही जाती है । इसी प्रकार महावाक्यके 'तत्' पदके वाच्य 'ईश्वर' के गुण सर्वज्ञता, परोक्षता आदिका और 'त्वम्' पदके वाच्य 'जीव' के गुण अल्पज्ञता, प्रत्यक्ता आदिका त्याग करके केवल चेतनांशमें एकता बतलायी जाती है ।