भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३५६अध्यात्मरामायण[सर्ग ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोक्तुः सुखादेरनुसाधनं भवे-<br>च्छरीरमन्यद्विदुरात्मनो बुधाः ॥२९॥जो भोक्ताके सुख-दुःखादि-अनुभवका साधन है, आत्माका दूसरा देह मानते हैं॥२८–२९॥
अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं<br>मायाप्रधानं तु परं शरीरकम्।<br>उपाधिभेदात्तु यतः पृथक् स्थितं<br>स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥३०॥(इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीवका तीसरा देह है। इसप्रकार उपाधि-भेदसे सर्वथा पृथक् स्थित अपने आत्मस्वरूपको क्रमशः (उपाधियोंका बाध करते हुए) अपने हृदयमें निश्चय करे ॥३०॥
कोषेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृति-<br>र्विभाति सङ्गात्स्फटिकोपलो यथा।<br>असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो<br>विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥३१॥स्फटिकमणिके समान यह आत्मा भी (अन्नमयादि) भिन्न-भिन्न कोशोंमें उनके सङ्गसे उन्हींके आकारका भासने लगता है। किन्तु इसका भली-प्रकार विचार करनेसे यह अद्वितीय होनेके कारण असङ्गरूप और अजन्मा निश्चित होता है ॥३१॥
बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते<br>स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः।<br>अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतो मृषा<br>नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥३२॥त्रिगुणात्मिका बुद्धिकी ही स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति-भेदसे तीन प्रकारकी वृत्तियाँ दिखायी देती हैं किन्तु इन तीनों वृत्तियोंमेंसे प्रत्येकका एक दूसरीमें व्यभिचार होनेके कारण, ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्ममें मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियोंका सर्वथा अभाव है) ॥३२॥
देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां<br>सङ्घादजस्रं परिवर्तते धियः।<br>वृत्तिस्तमोमूलतयाऽङ्गलक्षणा<br>यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥३३॥बुद्धिकी वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाली होनेके कारण अज्ञानरूपा है और जबतक यह रहती है तबतक ही संसारमें जन्म होता रहता है ॥३३॥
नेतिप्रमाणेण निराकृताखिलो<br>हृदा समास्वादितचिद्धनामृतः।<br>त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं<br>पीत्वा यथाऽम्भः प्रजहाति तत्फलम् ३४'नेति-नेति' आदि श्रुति-प्रमाणसे निखिल संसारका बाध करके और हृदयमें चिद्धनामृतका आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म) को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियलके जलको पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं ॥३४॥
कदाचिदात्मा न मृतो न जायते<br>न क्षीयते नापि विवर्धतेऽन्वयः।<br>निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः<br>स्वयंप्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥३५॥आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है ॥३५॥
एवंविधे ज्ञानमये सुखात्मके<br>कथं भवो दुःखमयः प्रतीयते।<br>अज्ञानतोऽध्यासवशात्प्रकाशते<br>ज्ञाने विलीयेत विरोधतः क्षणात् ॥३६॥जो इसप्रकार ज्ञानमय और सुख-स्वरूप है उसमें (ज्ञान होनेके बाद) यह दुःखमय संसार कैसे प्रतीत हो सकता है? यह तो अध्यासके कारण अज्ञान-से ही प्रतीत होता है ज्ञानसे तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका परस्पर