भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

सर्ग ४ ] : उत्तरकाण्ड ३४९


संस्कृत (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन ।<br>चिदानन्दादिमध्यान्तरहिताशेषकारण ॥३५॥<br>देव देवाः समासाद्य मामेकान्तेऽब्रुवन्वचः ।<br>बहुशोऽर्थ्यमानास्ते वैकुण्ठागमनं प्रति ॥३६॥<br>त्वया समेतश्चिच्छक्त्या रामस्तिष्ठति भूतले ।<br>विसृज्यास्मान्स्वकं धाम वैकुण्ठं च सनातनम्॥३७॥<br>आस्ते त्वया जगद्धात्रि रामः कमललोचनः ।<br>अग्रतो याहि वैकुण्ठं त्वं तथा चेद्रघूत्तमः ॥३८॥<br>आगमिष्यति वैकुण्ठं सनाथान्नः करिष्यति ।<br>इति विज्ञापिताऽहं तैर्मया विज्ञापितो भवान् ॥३९॥<br>यद्युक्तं तत्कुरुष्वाद्य नाहमाज्ञापये प्रभो ।<br>सीतायास्तद्वचः श्रुत्वा रामो ध्यात्वाऽब्रवीत्क्षणम्४०<br>देवि जानामि सकलं तत्रोपायं वदामि ते ।<br>कल्पयित्वा मिषं देवि लोकवादं त्वदाश्रयम्॥४१॥<br>त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीत इवापरः ।<br>भविष्यतः कुमारौ द्वौ वाल्मीकेराश्रमान्तिके॥४२॥<br>इदानीं दृश्यते गर्भः पुनरागत्य मेऽन्तिकम् ।<br>लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं कृत्वा शपथमादरात् ॥४३॥<br>भूमेर्विवरमात्रेण वैकुण्ठं यास्यसि द्रुतम् ।<br>पश्चादहं गमिष्यामि एष एव सुनिश्चयः ॥४४॥<br>इत्युक्त्वा तां विसृज्याथ रामो ज्ञानैकलक्षणः ।<br>मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्बलमुख्यैश्च संवृतः ॥४५॥<br>तत्रोपविष्टं श्रीरामं सुहृदः पर्युपासत ।<br>हास्यप्रौढकथासुज्ञा हासयन्तः स्थिता हरिम् ॥४६॥<br>कथाप्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् ।<br>पौरा जानपदा मे किं वदन्तीह शुभाशुभम् ॥४७॥जगन्नाथ ! हे सनातन परमात्मन् ! हे चिदानन्द-स्वरूप ! हे आदि, मध्य और अन्तसे रहित सबके कारण ! हे देव ! देवताओंने आकर मुझसे एकान्तमें बहुत कुछ प्रार्थना करते हुए आपके वैकुण्ठ पधारनेके विषयमें कहा है ॥ ३५-३६ ॥ वे कहते हैं कि 'तुझ चिच्छक्तिसे युक्त होकर ही राम हम सबको और अपने सनातन स्थान वैकुण्ठको छोड़कर पृथिवीतलमें ठहरे हुए हैं ॥ ३७ ॥ हे जगद्धात्रि ! कमलनयन राम सदा तेरे साथ ही रहते हैं । यदि तू पहले वैकुण्ठको चली जाय तो श्रीरघुनाथजी भी वहाँ आकर हमें सनाथ कर देंगे ।' मुझसे उन्होंने इसप्रकार कहा है सो मैंने आपको सुना दिया ॥ ३८-३९ ॥ हे प्रभो ! मेरा कोई आदेश तो है नहीं, अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें ।”<br><br>सीताजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने कुछ देर सोचकर कहा- ॥ ४० ॥ “देवि ! मैं यह सब जानता हूँ । उसके लिये मैं तुम्हें उपाय बतलाता हूँ । मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले लोकापवादके मिषसे तुम्हें लोकनिन्दासे डरनेवाले अन्य पुरुषोंके समान वनमें त्याग दूँगा । वहाँ श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमके पास तुम्हारे दो बालक होंगे ॥ ४१-४२ ॥ इस समय तुम्हारे शरीरमें गर्भावथाके चिह्न दिखायी दे रहे हैं । (बालकोंके उत्पन्न होनेपर) तुम मेरे पास फिर आओगी और लोकोंकी प्रतीतिके लिये आदरपूर्वक शपथ करके तुरन्त ही पृथिवीके (फटनेपर उसके) छिद्रद्वारा वैकुण्ठको चली जाओगी । पीछे मैं भी वहाँ आ जाऊँगा; बस, अब यही निश्चय रहा" ॥४३-४४॥<br><br>एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान् रामने सीताजीसे ऐसा कह उन्हें अन्तःपुरको भेज दिया और स्वयं नीतिशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियों तथा मुख्य-मुख्य सेनापतियोंसे घिरकर वहाँ विराजमान हुए । सुहृद्गण वहाँ बैठे हुए रामकी परिचर्यामें लगे हुए थे और हास्योक्तिमें कुशल विदूषकगण उन्हें हँसा रहे थे ॥ ४५-४६ ॥<br><br>तब भगवान् रामने प्रसंगवश विजय-नामक एक दूतसे पूछा- "मेरे, सीताके, मेरी माता और