अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ३४८. | अध्यात्मरामायण | [सर्गः ४ |
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| समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह ।<br>वानरैर्भ्रातृभिः सार्धं सञ्चचारावनिं प्रभुः ॥२३॥<br>अमानुषाणि कार्याणि चकार बहुशो भुवि ।<br>ब्राह्मणस्य सुतं दृष्ट्वा बालं मृतमकालतः ॥२४॥<br>शोचन्तं ब्राह्मणं चापि ज्ञात्वा रामो महामतिः।<br>तपस्यन्तं वने शूद्रं हत्वा ब्राह्मणबालकम् ॥२५॥<br>जीवयामास शूद्रस्य ददौ स्वर्गमनुत्तमम् ।<br>लोकानाम्युपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥२६॥<br>कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः ।<br>सीतां च रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२७॥<br>शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् ।<br>कथां संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाम् ॥२८॥<br>दशवर्षसहस्राणि मायामानुषविग्रहः ।<br>चकार राज्यं विधिवल्लोकवन्द्यपदाम्बुजः ॥२९॥ | पड़ता था ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीताजी, भाइयों और वानरोंके साथ विमानपर चढ़कर पृथिवीपर घूमा करते थे ॥२३॥ उन्होंने संसारमें बहुत-सी अमानवीय लीलाएँ कीं । एक बार एक ब्राह्मण-पुत्रको बाल्यावस्थामें ही असमय मरा देख और उस ब्राह्मणको बहुत शोक करते जान रघुश्रेष्ठ परमात्मा महामति रामने वनमें तपस्या करते हुए एक शूद्रको (उसका कारण मानकर) मारा और उस बालकको जीवित किया तथा शूद्रको अत्युत्तम स्वर्गलोक दिया ॥२४-२६ ॥ उन्होंने लोगोंको उपदेश देनेके लिये जगह-जगह करोड़ों शिव-लिंग स्थापित किये और सीताजीका सब प्रकारके अलौकिक भोगोंसे अनुरञ्जन किया ॥ २७ ॥ इस प्रकार परमधार्मिक भगवान् राम धर्मपूर्वक राज्य-शासन करते रहे और उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके पाप दूर करनेवाली अपनी पवित्र कीर्ति-कथा संसारमें स्थापित की ॥ २८ ॥ तीनों लोक जिनके चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं उन माया-मानव-शरीरधारी श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक दश हजार वर्ष राज्य किया ॥ २९ ॥ |
| एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ।<br>गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षयन् जनान् ॥३०॥<br>सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च ।<br>भर्तुर्मनोहरा साध्वी भावज्ञा सा हिया भिया ॥३१॥<br>एकदा क्रीडाविपिने सर्वभोगसमन्विते ।<br>एकान्ते दिव्यभवने सुखासीनं रघूत्तमम् ॥३२॥<br>नीलमाणिक्यसंकाशं दिव्याभरणभूषितम् ।<br>प्रसन्नवदनं शान्तं विद्युत्पुञ्जनिभाम्बरम् ॥३३॥<br>सीता कमलपत्राक्षी सर्वाभरणभूषिता ।<br>राममाह कराभ्यां सा लालयन्ती पदाम्बुजे ॥३४॥ | राजर्षि भगवान् राम एकपत्नीव्रतका पालन करने-वाले थे। वे पवित्र-चरित्र रामजी लोगोंको शिक्षा देते हुए गृहस्थाश्रमके समस्त धर्मोंका पालन करते रहे ॥३०॥ साध्वी सीताजी भी उनके हृदयका रुख परखने-वाली थीं। उन्होंने अपने प्रेम, आज्ञापालन, नम्रता, इन्द्रियसंयम, लज्जा और भीरुता आदि गुणोंसे पतिका मन हर लिया था ॥ ३१ ॥ एक दिन श्रीरघुनाथजी अपने क्रीडावनके सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न भवनमें एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे थे। उनके शरीरकी आभा नीलमाणिके समान थी, वे दिव्य भूषणोंसे भूषित थे, उनका मुख प्रसन्न और भाव गम्भीर था तथा वे विद्युत्पुञ्जके समान देदीप्यमान पीताम्बर धारण किये थे। उस समय सर्वालङ्कारसुसज्जिता कमलदललोचना श्रीसीताजीने अपने करकमलोंसे रघुनाथजीकी चरणसेवा करते हुए उनसे कहा-॥ ३२-३४ ॥ “हे देवाधिदेव ! हे |