अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ४] उत्तरकाण्ड ३९७
| भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलना- | एवं विकल्पसे रहित होकर अपनी ज्ञान-दृष्टिसे भूत, |
| साक्षी विकल्पोज्झितः। | भविष्य और वर्तमान ये सब कुछ जानते हैं, हे |
| भक्तानामनुवर्तनाय सकलां | स्वामिन् ! आप अपने भक्तोंको मार्ग दिखानेके लिये |
| कुर्वन् क्रियासंहतिं | ही सारी लीलाएँ रचते हैं तथा आप सम्पूर्ण |
| त्वं शृण्वन्मनुजाकृतिर्मुनिवचो | लोकोंसे पूजित होकर भी मनुष्यरूपसे हम-जैसे |
| भासीश लोकाञ्चितः ॥१२॥ | मुनियोंके वचन सुनते हुए दिखलायी दे रहे हैं॥१२॥ |
| स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुम्भसम्भवः। | इसप्रकार श्रीरघुनाथजीकी स्तुतिकर और उनसे |
| स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ हृष्टमानसः ॥१३॥ | सत्कार पा श्रीअगस्त्यजी अन्य मुनीश्वरोंके साथ प्रसन्न-चित्तसे अपने आश्रमको चले गये ॥ १३ ॥ |
| रामस्तु सीतया सार्धं भ्रातृभिः सह मन्त्रिभिः। | लक्ष्मीपति भगवान् राम सीताजी, भाइयों तथा |
| संसारीव रमानाथो रममाणोऽवसद्गृहे ॥१४॥ | मन्त्रियोंके सहित संसारी पुरुषोंके समान रमण (आचरण) करते हुए घरमें रहने लगे ॥ १४ ॥ |
| अनासक्तोऽपि विषयान्वभुजे प्रियया सह। | उन्होंने असंग होते हुए भी अपनी प्रियाके साथ नाना प्रकारके भोगोंको भोगा। वे सदा ही हनुमान् |
| हनुमत्प्रमुखैः सद्भिर्वानरैः परिवेष्टितः ॥१५॥ | आदि श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे रहते थे ॥ १५ ॥ एक बार |
| पुष्पकं चागमद्राममेकदा पूर्ववत्प्रभुम्। | पहलेहीके समान भगवान् रामके पास पुष्पक विमान आया और बोला—"भगवन् ! मुझे कुबेरजीने अपने |
| प्राह देवं कुबेरेण प्रेषितं त्वामहं ततः ॥१६॥ | यहाँसे फिर आपकीही सेवामें भेजा है ॥ १६ ॥ (वे कहते हैं कि ) पहले तुझे रावणने जीता था |
| जितं त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितम्। | और फिर उससे श्रीरामचन्द्रजीने जीता है। अतः |
| अतस्त्वं राघवं नित्यं वह यावद्वसेद्भुवि ॥१७॥ | जबतक वे पृथिवीतलपर रहें तबतक तू उन्हींको धारण कर ॥ १७॥ जिस समय रघुनाथजी वैकुण्ठको |
| यदा गच्छेद्रुघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा। | चले जायँ उस समय तू मेरे पास आ जाना।" यह |
| तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह पुष्पकं सूर्यसन्निभम् ॥१८॥ | सुनकर श्रीरघुनाथजीने सूर्यके समान देदीप्यमान पुष्पकसे कहा—॥ १८ ॥ "तेरा कल्याण हो, जिस |
| यदा स्मरामि भद्रं ते तदाऽऽगच्छ ममान्तिकम्। | समय मैं तेरा स्मरण करूँ उसी समय तू मेरे पास आ जाना, अब तू जा और मेरी आज्ञासे गुप्तरूपसे |
| तिष्ठान्तर्धाय सर्वत्र गच्छेदानीं ममाज्ञया ॥१९॥ | सर्वत्र रह" ॥ १९ ॥ पुष्पकको इसप्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों और मन्त्रियोंके साथ |
| इत्युक्त्वा रामचन्द्रोऽपि पौरकार्याणि सर्वशः। | मिलकर पुरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य यथायोग्य रीतिसे |
| भ्रातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं यथान्यायं चकार सः ॥२०॥ | करने लगे ॥ २० ॥ |
| राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ। | त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासन- |
| वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहाः ॥२१॥ | कालमें पृथिवी धनधान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे ॥ २१ ॥ श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त |
| जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपराः स्त्रियः। | पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति-सेवामें तत्पर रहती |
| नापश्यत्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥२२॥ | थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना |