भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ] बालकाण्ड [ १९


अतस्तयोर्वधार्थाय ज्येष्ठं रामं प्रयच्छ मे ।
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा तव श्रेयो भविष्यति ॥७॥

वसिष्ठेन सहामन्त्र्य दीयतां यदि रोचते ।
पप्रच्छ गुरुमेकान्ते राजा चिन्तापरायणः ॥८॥

किं करोमि गुरो रामं त्यक्तुं नोत्सहते मनः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते कष्टेनोत्पादिताः सुताः ॥९॥

चत्वारोऽमरतुल्यास्ते तेषां रामोऽतिवल्लभः ।
रामस्त्वितो गच्छति चेन्न जीवामि कथञ्चन ॥१०॥

प्रत्याख्यातो यदि मुनिः शापं दास्यत्यसंशयः ।
कथं श्रेयो भवेन्मह्यमसत्यं चापि न स्पृशेत् ॥११॥

वसिष्ठ उवाच

शृणु राजन्देवगुह्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
रामो न मानुषो जातः परमात्मा सनातनः ॥१२॥

भूमेर्भारावताराय ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ।
स एव जातो भवने कौसल्यायां तवानघ ॥१३॥

त्वं तु प्रजापतिः पूर्वं कश्यपो ब्रह्मणः सुतः ।
कौसल्या चादितिर्देवमाता पूर्वं यशस्विनी ।

भवन्तौ तप उग्रं वै तेपाथे बहुवत्सरम् ॥१४॥
अग्राम्यविषयौ विष्णुपूजाध्यानैकतत्परौ ।

तदा प्रसन्नो भगवान्वरदो भक्तवत्सलः ॥१५॥
वृणीष्व वरमित्युक्ते त्वं मे पुत्रो भवामल ।

इति त्वया याचितोऽसौ भगवान्भूतभावनः ॥१६॥
तथेत्युक्त्वाऽद्य पुत्रस्ते जातो रामः स एव हि ।

शेषस्तु लक्ष्मणो राजन् राममेवान्वपद्यत ॥१७॥
जातौ भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे गदाभृतः ।
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी ॥१८॥


वध करनेके लिये तुम अपने बड़े पुत्र रामको भाई लक्ष्मणके सहित मुझे दो, इससे तुम्हारा भी परम कल्याण होगा ॥७॥ इस विषयमें वसिष्ठजीसे सम्मति करके यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम मुझे दोनों कुमारोंको दे दो।" तब राजाने चिन्ताकुल होकर एकान्तमें गुरुजीसे पूछा ॥८॥ "हे गुरो ! सहस्रों वर्ष बीतनेपर बड़े कष्टसे मुझे ये देवताओंके सदृश चार पुत्र मिले हैं। इनमें राम मुझे बहुत ही प्रिय है, सो अब मैं क्या करूँ ? मेरा चित्त तो रामको छोड़नेके लिये तैयार नहीं है। यदि राम यहाँसे चला जायगा तो मैं किसी प्रकार भी जी नहीं सकूँगा ॥९-१०॥ परन्तु यदि मैं सूखा जवाब दूँ तो यह निश्चय है कि मुनि मुझे शाप दे देंगे। अतः अब यह बताइये कि मेरा हित किस प्रकार हो और मैं असत्य-भाषणसे भी कैसे बचूँ ?" ॥११॥

**वसिष्ठजी बोले—**राजन् ! यह देवताओंकी गुह्य लीला सुनो, इसे किसी प्रकार प्रकट न होने देना चाहिये। ये राम मनुष्य नहीं हैं साक्षात् पुराण-पुरुष परमात्मा ही (अपनी मायासे) इस रूपमें प्रकट हुए हैं ॥१२॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माजीने भगवान्‌से प्रार्थना की थी, उसे पूर्ण करनेके लिये उन परमेश्वरने तुम्हारे यहाँ कौसल्याके गर्भसे जन्म लिया है ॥१३॥ पूर्व जन्ममें तुम ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति कश्यप थे और यशस्विनी कौसल्या देवमाता अदिति थीं। उस समय तुम दोनोंने बहुत वर्षोंतक ग्राम्य-विषयोंसे रहित और एकमात्र भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहकर बड़ा उग्र तप किया। तब कालान्तरमें भक्तवत्सल वरदायक भगवान्‌ने तुम दोनोंपर प्रसन्न होकर कहा कि 'वर माँगो' तो तुमने (भगवान्‌से) यही माँगा कि 'हे निरञ्जन ! आप हमारे पुत्र हों' तब भूतभावन भगवान्‌ने कहा कि 'ऐसा ही हो।' इसलिये वे ही विष्णु भगवान् इस समय रामरूपसे तुम्हारे पुत्र हुए हैं और (उनकी सेवा करनेके लिये) शेषजी लक्ष्मणके रूपमें प्रकट होकर उनके अनुयायी हुए हैं ॥१४—१७॥ भगवान् गदाधरके शङ्ख और चक्रने भरत और शत्रुघ्नके रूपसे अवतार लिया है तथा योगमाया जनक-दुलारी सीताजी होकर प्रकट हुई हैं ॥१८॥ इस