भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४


विश्वामित्रोऽपि रामाय तां योजयितुमागतः।
एतद्गुह्यतमं राजन्न वक्तव्यं कदाचन ॥१९॥

अतः प्रीतेन मनसा पूजयित्वाऽथ कौशिकम्।
प्रेषयस्व रमानाथं राघवं सहलक्ष्मणम् ॥२०॥

वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु राजा दशरथस्तदा।
कृतकृत्यमिवात्मानं मेने प्रमुदितान्तरः ॥२१॥

आहूय रामरामेति लक्ष्मणेति च सादरम्।
आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय कौशिकाय समर्पयत्॥२२॥

ततोऽतिहृष्टो भगवान्विश्वामित्रः प्रतापवान्।
आशीर्भिरभिनन्द्याथ आगतौ रामलक्ष्मणौ ॥२३॥

गृहीत्वा चापतूणीरवाणखड्गधरौ ययौ।
किञ्चिद्देशमतिक्रम्य राममाहूय भक्तितः ॥२४॥

ददौ वलां चातिबलां विद्ये द्वे देवनिर्मिते।
ययोर्ग्रहणमात्रेण क्षुत्क्षामादि न जायते ॥२५॥

तत उत्तीर्य गङ्गां ते ताटकावनमागमन्।
विश्वामित्रस्तदा प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥२६॥

अत्रास्ति ताटका नाम राक्षसी कामरूपिणी।
बाधते लोकमखिलं जहि तामविचारयन् ॥२७॥

तथेति धनुरादाय सगुणं रघुनन्दनः।
टङ्कारमकरोत्तेन शब्देनापूरयद्वनम् ॥२८॥

तच्छ्रुत्वासहमाना सा ताटका घोररूपिणी।
क्रोधसंमूर्च्छिता राममभिदुद्राव मेघवत् ॥२९॥

तामेकेन शरेणाशु ताडयामास वक्षसि।
पपात विपिने घोरा वमन्ती रुधिरं बहु ॥३०॥


समय विश्वामित्रजी रामसे सीताका संयोग करानेके लिये ही आये हैं। हे राजन् ! यह रहस्य अत्यन्त गुह्य है, इसे कभी प्रकाशित मत करना ॥ १९ ॥ (अब सम्पूर्ण रहस्य तुमको मालूम हो गया है) इसलिये अब तुम प्रसन्न-चित्तसे श्रीविश्वामित्रजीका सत्कार करके लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीको लक्ष्मणसहित इनके साथ भेज दो॥२०॥

वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर राजा दशरथने उस समय अपनेको कृतकृत्य माना और प्रसन्न-चित्तसे आदरपूर्वक 'हे राम ! हे राम ! हे लक्ष्मण !' ऐसा कहकर पुकारा तथा उन दोनों भाइयोंके आनेपर उन्हें हृदयसे लगाकर और शिर सूंघकर श्रीविश्वामित्रजीको सौंप दिया ॥ २१-२२ ॥ तब अति प्रतापी भगवान् विश्वामित्रजीने उन्हें अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर सम्मानित किया और फिर धनुष, तरकश, बाण एवं खड्ग आदिसे सुसज्जित होकर अपने पास आये हुए राम और लक्ष्मणको साथ लेकर वहाँसे चल पड़े। थोड़ी दूर जानेपर विश्वामित्रजीने भक्तिपूर्वक रामको बुलाया और उन्हें देव-निर्मित बला और अतिबला नामकी ऐसी दो विद्याएँ दीं, जिनके ग्रहण करने-से ही क्षुधा और दुर्बलता आदिकी बाधा नहीं होती ॥ २३-२५ ॥

तदनन्तर गङ्गाजीको पार कर वे ताटकावनमें आये; तब विश्वामित्रजीने सत्यपराक्रमी रामसे कहा ॥ २६ ॥ "यहाँ एक ताटका नामकी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी रहती है जो इस प्रदेशके समस्त निवासियोंको अत्यन्त कष्ट पहुँचाती है, तुम बिना कुछ सोच-विचार किये उसे मार डालो ॥ २७॥ तब रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार किया, जिसके शब्दसे वह सम्पूर्ण वन गुञ्जायमान हो गया ॥ २८ ॥ उस शब्दको सुनकर घोररूपिणी ताटका उसे सहन न कर सकने-के कारण क्रोधसे पागल होकर मेघके समान रामकी ओर दौड़ी ॥ २९ ॥ भगवान् रामने तुरन्त ही उसके वक्षःस्थलमें एक बाण मारा, जिससे वह घोर राक्षसी बहुत-सा रुधिर उगलती हुई उस वनमें गिर पड़ी ॥३०॥ फिर शापवश पिशाचताको प्राप्त हुई वह ताटका श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे शापमुक्त होकर एक सर्वाङ्कार-