अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ५ ] । बालकाण्ड । २१
ततोऽतिसुन्दरी यक्षी सर्वाभरणभूषिता ।
शापात्पिशाचतां प्राप्ता मुक्ता रामप्रसादतः ॥ ३१ ॥
नत्वा रामं परिक्रम्य गता रामाज्ञया दिवम् ॥ ३२ ॥
ततोऽतिहृष्टः परिरभ्य रामं
मूर्ध्न्यवघ्राय विचिन्त्य किञ्चित् ।
सर्वास्त्रजालं सरहस्यमन्त्रं
प्रीत्याऽभिरामाय ददौ मुनीन्द्रः ॥ ३३ ॥
विभूषिता परम सुन्दरी यक्षिणी हो गयी तथा रामचन्द्रजीकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणामकर उनकी आज्ञासे स्वर्गलोकको चली गयी ॥ ३१-३२ ॥ तब मुनिवर विश्वामित्रजीने अति हर्षित होकर रामजीका आलिंगन किया और उनका शिर सूँघकर कुछ सोच-विचारकर रहस्य और मन्त्रादिके सहित समस्त अस्त्र-शस्त्र प्रीतिपूर्वक अभिराम रामको दिये ॥ ३३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चम सर्ग
मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहक्योद्धार
श्रीमहादेव उवाच
तत्र कामाश्रमे रम्ये कानने मुनिसङ्कुले ।
उषित्वा रजनीमेकां प्रभाते प्रस्थिताः शनैः ॥ १ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदुपरात्त विश्वामित्रजीके सहित वे दोनों भाई एक रात मुनिजनसंकुलित अति सुन्दर उस कामा श्रम नामक वनमें रहकर प्रातःकाल होते ही धीरे-धीरे वहाँसे चले ॥ १ ॥
सिद्धाश्रमं गताः सर्वे सिद्धचारणसेवितम् ।
विश्वामित्रेण संदिष्टा मुनयस्तन्निवासिनः ॥ २ ॥
पूजां च महतीं चक्रू रामलक्ष्मणयोर्द्रुतम् ।
श्रीरामः कौशिकं प्राह मुने दीक्षां प्रविश्यताम् ॥ ३ ॥
दर्शयस्व महाभाग कुतस्तौ राक्षसाधमौ ।
तथेत्युक्त्वा मुनिर्यष्टुमारेभे मुनिभिः सह ॥ ४ ॥
तब वे सब सिद्ध और चारणोंसे सेवित सिद्धाश्रमपर आये । वहाँके रहनेवाले मुनिजनोंने विश्वामित्रजीकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक राम और लक्ष्मणका बड़ा सत्कार किया । तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे कहा—"हे मुने ! आप दीक्षामें स्थित होइये ॥ २-३ ॥ और हे महाभाग ! हमें केवल यह दिखा दीजिये कि वे राक्षसाधम कहाँ हैं ?" तब मुनिवरने 'बहुत अच्छा' कहकर अन्य मुनियोंके साथ यज्ञ करना आरम्भ कर दिया ॥ ४ ॥
मध्याह्ने ददृशाते तौ राक्षसौ कामरूपिणौ ।
मारीचश्च सुबाहुश्च वर्षन्तौ रुधिरास्थिनी ॥ ५ ॥
मध्याह्नके समय मारीच और सुबाहु नामक वे दोनों कामरूपी राक्षस रक्त और अस्थियोंकी वर्षा करते दिखायी दिये ॥ ५ ॥
रामोऽपि धनुरवादाय द्वौ बाणौ सन्दधे सुधीः ।
आकर्णान्तं समाकृष्य विससर्ज तयोः पृथक् ॥ ६ ॥
बुद्धिमान् रामने भी दो बाण लेकर धनुषपर चढ़ाये और कर्णपर्यन्त खींचकर अलग-अलग उन दोनों राक्षसोंकी ओर छोड़े ॥ ६ ॥
तयोरेकस्तु मारीचं भ्रामयञ्छतयोजनम् ।
पातयामास जलधौ तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ७ ॥
उनमेंसे एक बाणने मारीचको आकाशमें घुमाते हुए सौ योजनकी दूरीपर समुद्रमें गिरा दिया । यह एक बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ७ ॥
द्वितीयोऽग्निमयो बाणः सुबाहुमजयत्क्षणात् ।
अपरे लक्ष्मणेनाशु हतास्तदनुयायिनः ॥ ८ ॥
दूसरे अग्निमय बाणने क्षणभरमें सुबाहुको भस्म कर डाला तथा जो उनके अन्यान्य अनुयायी थे उन सबको तुरन्त ही लक्ष्मणजीने मार डाला ॥ ८ ॥