भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

पुष्पौघैराकिरन्देवा राघवं सहलक्ष्मणम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुः सिद्धचारणाः ॥ ९॥<br>विश्वामित्रस्तु संपूज्य पूजाहं रघुनन्दनम्।<br>अङ्के निवेश्य चालिङ्ग्य भक्त्या बाष्पाकुलेक्षणः १०<br>भोजयित्वा सह भ्रात्रा रामं पक्वफलादिभिः।<br>पुराणवाक्यैर्मधुरैर्निनाय दिवसत्रयम् ॥११॥<br>चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते कौशिको राममब्रवीत् ।<br>राम राम महायज्ञं द्रष्टुं गच्छामहे वयम् ॥१२॥<br>विदेहराजनेगरे जनकस्य महात्मनः।<br>तत्र माहेश्वरं चापमस्ति न्यस्तं पिनाकिना ॥१३॥<br>द्रक्ष्यसि त्वं महासत्त्वं पूज्यसे जनकेन च।<br>इत्युक्त्वा मुनिभिस्ताभ्यां ययौ गङ्गासमीपगम् १४<br>गौतमस्याश्रमं पुण्यं यत्राहल्यास्थिता तपः।<br>दिव्यपुष्पफलोपेतपादपैः परिवेष्टितम् ॥१५॥ | | उस समय देवताओंने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरघुनाथजीपर फूल बरसाये और देवदुन्दुभि आदि बाजोंका घोष किया तथा सिद्ध और चारणगण उनकी स्तुति करने लगे ॥ ९॥ विश्वामित्रजीने पूजनीय रघुनाथजीका भली प्रकार पूजन किया और उन्हें गोदमें ले नेत्रोंमें भक्तिपूर्वक प्रेमाश्रु भरकर गले लगा लिया ॥ १०॥ फिर भाई लक्ष्मणके सहित रामको पके फल आदि खिलाकर पुराण और इतिहासादिकों मधुर कथाएँ सुनाते हुए तीन दिन बिताये ॥ ११ ॥ चौथा दिन आनेपर विश्वामित्रजीने रामसे कहा-"हे राम ! महात्मा जनकजीका बड़ा भारी यज्ञ देखनेके लिये हम-लोग जनकपुर चलेंगे। वहाँ श्रीमहादेवजीका धरोहरके रूपमें रखा हुआ एक बड़ा भारी धनुष है ॥१२-१३॥ उस सुदृढ़ धनुषको तुम देखोगे और महाराज जनक तुम्हारा भली प्रकार सत्कार करेंगे।" विश्वामित्र-जी इस प्रकार कह मुनियोंको और राम-लक्ष्मणको साथ ले गङ्गाजीके निकट मुनिश्रेष्ठ गौतमजीके उस पवित्र आश्रमपर आये जो दिव्य और पवित्र फलों-वाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था और जहाँ अहल्या तप कर रही थी ॥ १४-१५ ॥ मृगपक्षिगणैर्हीनं नानाजन्तुविवर्जितम् ।<br>दृष्ट्वोवाच मुनिं श्रीमान् रामो राजीवलोचनः ॥१६॥<br>कस्यैतदाश्रमपदं भाति भास्वच्छुभं महत् ।<br>पत्रपुष्पफलैर्युक्तं जन्तुभिः परिवर्जितम् ॥१७॥<br>आह्लादयति मे चेतो भगवन् ब्रूहि तत्त्वतः ॥१८॥ | | कमलनयन श्रीमान् रामजीने उस आश्रमको मृग, पक्षी तथा नाना प्रकारके जीवोंसे रहित देख मुनिवर कौशिकसे कहा ॥ १६ ॥ "यह पत्र, पुष्प और फल आदिसे सम्पन्न तथा जीवशून्य महान् आश्रम जो बड़ा सुन्दर, रमणीय और पवित्र दीख पड़ता है, किसका है ? भगवन् ! इसे देखकर मेरा चित्त अति आह्लादित हो रहा है; आप इसका सब वृत्तान्त यथावत् कहिये ॥ १७-१८ ॥ विश्वामित्र उवाच<br>शृणु राम पुरा वृत्तं गौतमो लोकविश्रुतः ।<br>सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठस्तपसाराधयन् हरिम् ॥१९॥<br>तस्मै ब्रह्मा ददौ कन्यामहल्यां लोकसुन्दरीम् ।<br>ब्रह्मचर्येण सन्तुष्टः शुश्रूषणपरायणाम् ॥२०॥<br>तया सार्द्धमिहावात्सीद्गौतमस्तपतां वरः ।<br>शक्रस्तु तां धर्षयितुमन्तरं प्रेप्सुरन्वहम् ॥२१॥ | | श्रीविश्वामित्रजी बोले—हे राम ! इस आश्रमका पूर्व-वृत्तान्त सुनो। पहले इस आश्रममें जगद्विख्यात धार्मिक-श्रेष्ठ मुनिवर गौतमजी तपस्याद्वारा श्रीहरिकी आराधना करते हुए रहते थे ॥ १९ ॥ उनके ब्रह्मचर्यसे सन्तुष्ट होकर भगवान् ब्रह्माजीने उनकी सेवाके लिये उन्हें अहल्या नामकी एक लोक-सुन्दरी सेवा-परायणा कन्या दी ॥ २० ॥ और तापसप्रवर गौतमजी उस अहल्याके साथ यहाँ रहने लगे, इधर देवराज इन्द्र अहल्याके रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर नित्य-प्रति उसके साथ रमण करनेका अवसर देखने लगे ॥२१॥