अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ५] बालकाण्ड २३
| कदाचिन्मुनिवेषेण गौतमे निर्गते गृहात् ।<br>धर्षयित्वाऽथ निरगाच्चरितं मुनिरप्यगात् ॥२२॥<br>दृष्ट्वा यान्तं स्वरूपेण मुनिः परमकोपनः ।<br>पप्रच्छ कस्त्वं दुष्टात्मन्मम रूपधरोऽधमः ॥२३॥<br>सत्यं ब्रूहि न चेद्भस्म करिष्यामि न संशयः ।<br>सोऽब्रवीद्देवराजोऽहं पाहि मां कामकिङ्करम् ॥२४॥<br>कृतं जुगुप्सितं कर्म मया कुत्सितचेतसा ।<br>गौतमः क्रोधताम्राक्षः शशाप दिविजाधिपम् ॥२५॥<br>योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहस्रभगवान्भव ।<br>शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य स्वाश्रमं द्रुतम् ॥२६॥<br>दृष्ट्वाऽहल्यां वेपमानां प्राञ्जलिं गौतमोऽब्रवीत् ।<br>दुष्टे त्वं तिष्ठ दुर्वृत्ते शिलायामाश्रमे मम ॥२७॥<br>निराहारा दिवारात्रं तपः परममास्थिता ।<br>आतपानिलवर्षादिसहिष्णुः परमेश्वरम् ॥२८॥<br>ध्यायन्ती राममेकाग्रमनसा हृदि संस्थितम् ।<br>नानाजन्तुविहीनोऽयमाश्रमो मे भविष्यति ॥२९॥<br>एवं वर्षसहस्रेषु ह्यनेकेषु गतेषु च ।<br>रामो दाशरथिः श्रीमानागमिष्यति सानुजः ॥३०॥<br>यदा त्वदाश्रयशिलां पादाभ्यामाक्रमिष्यति ।<br>तदैव धूतपापा त्वं रामं संपूज्य भक्तितः ॥३१॥<br>परिक्रम्य नमस्कृत्य स्तुत्वा शापाद्विमोक्ष्यसे ।<br>पूर्ववन्मम शुश्रूषां करिष्यसि यथासुखम् ॥३२॥<br>इत्युक्त्वा गौतमः प्रागाद्धिमवन्तं नगोत्तमम् ।<br>तदाद्यहल्या भूतानामदृश्या स्वाश्रमे शुभे ॥३३॥<br>तव पादरजःस्पर्शं काङ्क्षते पवनाशना ।<br>आस्तेऽद्यापि रघुश्रेष्ठ तपो दुष्करमास्थिता ॥३४॥<br>पावयस्व मुनेर्भार्यामहल्यां ब्रह्मणः सुताम् ।<br>इत्युक्त्वा राघवं हस्ते गृहीत्वा मुनिपुङ्गवः ॥३५॥ | एक दिन मुनिवर गौतमके बाहर चले जानेपर वह गौतमके रूपसे अहल्याके साथ रमण कर जल्दीसे वहाँसे चलता बना, इसी समय मुनि भी वहाँ लौट आये ॥२२॥ उसे अपना रूप धारण कर वहाँसे जाते देख गौतम मुनिने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—"रे दुष्टात्मा ! रे अधम ! मेरे रूपको धारण करनेवाला तू कौन है ? ॥२३॥ सच-सच बता, नहीं तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा—इसमें सन्देह न करना।" तब वह बोला—"भगवन् ! मैं कामके वशीभूत देवराज इन्द्र हूँ, मेरी रक्षा कीजिये ॥२४॥ मुझ पापात्माने बड़ा घृणित कार्य किया है।" तब गौतमने क्रोधसे आँखें लाल कर देवराजको शाप दिया ॥२५॥ "हे दुष्टात्मन् ! तू योनि-लम्पट है इसलिये तेरे शरीरमें सहस्र भग हो जायँ।" इस प्रकार देवराजको शाप देकर मुनिने अपने आश्रममें प्रवेश किया तो देखा कि अहल्या भयसे काँपती हुई हाथ जोड़े खड़ी है। उसे देखकर गौतमने कहा—"हे दुष्टे ! तू मेरे आश्रममें शिलामें निवास कर ॥२६-२७॥ यहाँ तू निराहार रहकर धूप, वायु और वर्षा आदिको सहन करती हुई दिन-रात तपस्या कर और एकाग्रचित्तसे हृदयमें विराजमान परमात्मा रामका ध्यान कर। अबसे यह मेरा आश्रम विविध प्रकारके जीव-जन्तुओं-से रहित हो जायगा ॥२८-२९॥ इसी प्रकार कई हजार वर्ष बीत जानेपर यहाँ दशरथ-नन्दन श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मणके साथ आयेंगे ॥३०॥ जिस समय वे तेरी आश्रयभूत शिलापर अपने दोनों चरण रखेंगे उसी समय तू पाप-मुक्त हो जायगी, तथा भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका पूजन कर उनकी परिक्रमा और नमस्कारपूर्वक स्तुति कर शापसे छूट जायगी और फिर पूर्ववत् मेरी सुखपूर्वक सेवा करने लगेगी" ॥३१-३२॥ ऐसा कहकर महर्षि गौतम पर्वतश्रेष्ठ हिमालयपर चले गये। हे रघुश्रेष्ठ ! उसी दिनसे यह अहल्या वायु-भक्षण करती हुई कठोर तपस्यामें स्थित हो आपके चरण-रजके स्पर्शकी कामनासे आजतक प्राणियोंसे अलक्षिता रहकर अपने शुभ आश्रममें रहती है ॥३३-३४॥ हे राम ! अब तुम ब्रह्माजीकी पुत्री गौतम-पत्नी अहल्याका उद्धार करो।<br>मुनिवर विश्वामित्रजीने ऐसा कह रघुनाथजीका |