भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

संस्कृत मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
दर्शयामास चाहल्यामुग्रेण तपसा स्थिताम् ।<br>रामः शिलां पदा स्पृष्ट्वा तां चापश्यत्तपोधनाम् ३६<br>ननाम राघवोऽहल्यां रामोऽहमिति चाब्रवीत् ।<br><br>ततो दृष्ट्वा रघुश्रेष्ठं पीतकौशेयवाससम् ॥३७॥<br>चतुर्भुजं शङ्खचक्रगदापङ्कजधारिणम् ।<br>धनुर्बाणधरं रामं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥३८॥<br>स्मितवक्त्रं पद्मनेत्रं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ।<br>नीलमाणिक्यसङ्काशं द्योतयन्तं दिशो दश ॥३९॥<br>दृष्ट्वा रामं रमानाथं हर्षविस्फारितेक्षणा ।<br>गौतमस्य वचः स्मृत्वा ज्ञात्वा नारायणं परम् ॥४०॥<br>सम्पूज्य विधिवद्राममर्ध्यादिभिरनिन्दिता ।<br>हर्षाश्रुजलनेत्रान्ता दण्डवत्प्रणिपत्य सा ॥४१॥<br>उत्थाय च पुनर्द्दष्ट्वा रामं राजीवलोचनम् ।<br>पुलकाङ्कितसर्वाङ्गा गिरा गद्गदयैडत ॥४२॥<br><br>अहल्योवाच<br>अहो कृतार्थाऽस्मि जगन्निवास ते<br>पादाम्बुजसंलग्नरजःकणादहम् ।<br>स्पृशामि यत्पद्मजशङ्करादिभि-<br>र्विमृग्यते रन्धितमानसैः सदा ॥४३॥<br>अहो विचित्रं तव राम चेष्टितं<br>मनुष्यभावेन विमोहितं जगत् ।<br>चलस्यजस्रं चरणादिवर्जितः<br>सम्पूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिकः ॥४४॥<br>यत्पादपङ्कजपरागपवित्रगात्रा<br>भागीरथी भवविरिञ्चिमुखान्पुनाति ।<br>साक्षात्स एव मम दृग्विषयो यदास्ते<br>किं वर्ण्यते मम पुराकृतभागधेयम् ॥४५॥<br>मर्त्यावतारे मनुजाकृतिं हरिं<br>रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम् ।<br>धनुर्धरं पद्मविशाललोचनं<br>भजामि नित्यं न परान्मजिष्ये ॥४६॥हाथ पकड़ उन्हें उग्र तपमें स्थित अहल्याको दिखलाया । तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणसे उस शिलाको स्पर्शकर तपस्विनी अहल्याको देखा ॥ ३५-३६ ॥ उसे देखकर भगवान् रामने 'मैं राम हूँ' ऐसा कहकर प्रणाम किया ।<br><br>तब अहल्याने रेशमी पीताम्बर धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखा ॥ ३७ ॥ उनकी चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे, कन्धेपर धनुष-बाण विराजमान थे तथा साथमें श्रीलक्ष्मणजी थे ॥ ३८ ॥ उनका मुख मुसकान-युक्त, नेत्र कमलदलके समान और वक्षःस्थल श्रीवत्साङ्कसे सुशोभित था । अपने नीलमणि-सदृश श्याम विग्रहसे वे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ३९ ॥ रमानाथ श्रीरामचन्द्रको देखकर अहल्याके नेत्र हर्षसे खिल गये और उसे मुनिवर गौतमके वाक्योंका स्मरण हो आया । तब उन्हें साक्षात् श्रीनारायण जान उस अनिन्दिताने अर्ध्यादिसे उनका विधिवत् पूजन किया और नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ४०-४१ ॥ फिर खड़ी होकर वह कमलनयन भगवान् रामको देख सर्वांगसे पुलकित हो गद्गदवाणीसे उनकी स्तुति करने लगी ॥ ४२ ॥<br><br>अहल्या बोली—हे जगन्निवास ! आपके चरण-कमलोंके रजःकणका स्पर्श कर आज मैं कृतार्थ हो गयी । अहो !(बड़े भाग्यकी बात है कि) आपके जिन पादार-विन्दोंका ब्रह्मा और शंकर आदि एकाग्र-चित्तसे सर्वदा अनुसन्धान किया करते हैं उन्हींका आज मैं स्पर्श कर रही हूँ ॥ ४३ ॥ हे राम ! आपकी लीलाएं बड़ी विचित्र हैं, आपके मानुष-भावसे सम्पूर्ण जगत् मोहित हो रहा है । आप पूर्णानन्दमय और अति मायावी हैं; क्योंकि चरणादिहीन होकर भी आप निरन्तर चलते रहते हैं ॥ ४४ ॥ जिनके चरण-कमलके परागसे पवित्र हुई श्रीगङ्गाजी शिव और ब्रह्मा आदि जगदीश्वरोंको भी पवित्र करती हैं, आज साक्षात् वे ही मेरे नेत्रोंके विषय हो रहे हैं—मैं अपने पूर्वकृत पुण्यकर्मोंका किस प्रकार वर्णन करूँ ? ॥ ४५ ॥ जिन्होंने परम सुन्दर मानव-देहसे मर्त्यलोकमें अवतार लिया है, मैं उन धनुषधारी कमलदल-लोचन भगवान् रामको सर्वदा भजती हूँ, और किसीको भी नहीं भजना चाहती ॥ ४६ ॥