अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग ५ ] | बालकाण्ड | २५ |
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यत्पादपङ्कजरजः श्रुतिभिर्विमृग्यं<br>यन्नाभिपङ्कजभवः कमलासनश्च ।<br>यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारि-<br>स्तं रामचन्द्रमनिशं हृदि भावयामि ॥४७॥ | जिनके चरण-कमलोंकी रजको श्रुति भी ढूँढ़ती रहती है, जिनकी नाभिसे उत्पन्न हुए कमलसे ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं तथा जिनके नामामृतके भगवान् शंकर रसिक हैं उन श्रीरामचन्द्रजीका मैं अपने हृदयमें अहर्निश ध्यान करती हूँ ॥ ४७ ॥ यस्यावतारचरितानि विरिञ्चिलोके<br>गायन्ति नारदमुखा भवपद्मजाद्याः ।<br>आनन्दजाश्रुपरिपिक्तकुचाग्रसीमा<br>वागीश्वरी च तमहं शरणं प्रपद्ये ॥४८॥ | जिनके अवतार-चरित्रोंका नारदादि देवर्षिगण, ब्रह्मा और महादेव आदि देवेश्वरगण तथा आनन्दाश्रुओंसे जिनके कुचमण्डल भीगे हुए हैं वे सरस्वतीजी भी ब्रह्मलोकमें निरन्तर गान किया करती हैं उन प्रभुकी मैं शरण लेती हूँ ॥ ४८ ॥ सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराण<br>एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः ।<br>मायातनूं लोकविमोहनीयां<br>धत्ते परानुग्रह एष रामः ॥४९॥ | उन्हीं पुराण-पुरुष परमात्मा रामने संसारपर परम अनुग्रह करनेके लिये स्वयंप्रकाश, अनन्त और सबके आदिकारण होते हुए भी यह जगन्मोहन मायामय रूप धारण किया है ॥ ४९ ॥ अयं हि विश्वोद्भवसंयमाना-<br>मेकः स्वमायागुणविम्वितो यः ।<br>विरिञ्चिविष्ण्वीश्वरनामभेदान्<br>धत्ते स्वतन्त्रः परिपूर्ण आत्मा ॥५०॥ | जो अकेले ही संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाशके लिये अपनी मायाके गुणोंका आश्रयकर ब्रह्मा, विष्णु और महादेव नामक विभिन्न रूप धारण करते हैं वे स्वतन्त्र और परिपूर्ण आत्मा आप ही हैं ॥५०॥ नमोऽस्तु ते राम तवाङ्घ्रिपङ्कजं<br>श्रिया धृतं वक्षसि लालितं प्रियात् ।<br>आक्रान्तमेकेन जगत्त्रयं पुरा<br>ध्येयं मुनीन्द्रैरभिमानवर्जितैः ॥५१॥ | हे राम ! आपके जिन चरण-कमलोंको श्रीलक्ष्मीजी अपने वक्षःस्थलपर रखकर बड़े प्रेमसे लाड़ लड़ाती हैं, जिन्होंने पूर्वकालमें (बलि-बन्धनके समय ) एक ही पगमें सम्पूर्ण त्रिलोकी माप ली थी तथा अभिमान-हीन मुनिजन जिनका निरन्तर ध्यान किया करते हैं उन आपके चरण-कमलोंको मैं नमस्कार करती हूँ ॥५१॥ जगतामादिभूतस्त्वं जगत्त्वं जगदाश्रयः ।<br>सर्वभूतेष्वसंयुक्त एको भाति भवान्परः ॥५२॥ | हे प्रभो ! आप ही जगत्के आदिकारण, आप ही जगत्-रूप और आप ही उसके आश्रय हैं, तथापि आप समस्त प्राणियोंसे पृथक् हैं और अद्वितीय परब्रह्मरूपसे प्रकाशमान हैं ॥ ५२ ॥ ओंकारवाच्यस्त्वं राम वाचामविषयः पुमान् ।<br>वाच्यवाचकभेदेन भवानेव जगन्मयः ॥५३॥ | हे राम ! आप ओंकारके वाच्य हैं तथा आप ही वाणीके अगोचर परम पुरुष हैं । हे प्रभो ! वाच्य-वाचक (शब्द-अर्थ) भेदसे आप ही सम्पूर्ण जगत्-रूप हैं ॥ ५३ ॥ कार्यकारणकर्तृत्वफलसाधनभेदतः ।<br>एको विभासि राम त्वं मायया बहुरूपया ॥५४॥ | हे राम ! आप अकेले ही बहु-रूपमयी मायाके आश्रयसे कार्य, कारण, कर्त्तृत्व, फल और साधनादिके भेदसे अनेक रूपोंमें भासमान हो रहे हैं ॥ ५४ ॥ त्वन्मायामोहितधियस्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः।<br>मानुषं त्वाभिमन्यन्ते मायिनं परमेश्वरम् ॥५५॥ | आपकी मायासे जिनकी बुद्धि मोहित हो रही है वे लोग आपका वास्तविक रूप नहीं जान सकते । आप मायापति परमेश्वरको वे मूढ़-जन साधारण मनुष्य समझते हैं ॥५५॥ आकाशवत्त्वं सर्वत्र बहिरन्तर्गतोऽमलः ।<br>असङ्गो ह्यचलो नित्यः शुद्धो बुद्धः सदव्ययः॥५६॥ | आप आकाशके समान बाहर-भीतर सब ओर विराजमान, निर्मल, असङ्ग, अचल, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्यस्वरूप और अव्यय हैं ॥ ५६ ॥ हे विभो ! मैं मूढ़ और अज्ञानी स्त्री-जाति
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