अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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योपिन्मूढाऽहमज्ञा ते तत्त्वं जाने कथं विभो ।
तस्मात्ते शतशो राम नमस्कुर्यामनन्यधीः ॥५७॥
देव मे यत्र कुत्रापि स्थिताया अपि सर्वदा ।
त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ॥५८॥
नमस्ते पुरुषाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश नारायण नमोऽस्तु ते ॥५९॥
भवभयहरमेकं भानुकोटिप्रकाशं
करधृतशरचापं कालमेघावभासम् ।
कनकरुचिरवस्त्रं रत्नवत्कुण्डलाढ्यं
कमलविशदनेत्रं सानुजं राममीडे ॥६०॥
भला आपके तत्त्वको क्या जानूँ ? अतः हे राम ! मैं अनन्यभावसे आपको सैकड़ों बार केवल नमस्कार ही करती हूँ ॥ ५७ ॥ हे देव ! मैं जहाँ-कहीं भी रहूँ वहीं सर्वदा आपके चरण-कमलोंमें मेरी आसक्तिपूर्ण भक्ति बनी रहे ॥ ५८ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है; हे भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार है; हे हृषीकेश ! आपको नमस्कार है; हे नारायण ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ५९ ॥ जो संसारके एकमात्र भय दूर करनेवाले हैं, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान हैं, कर-कमलोंमें धनुष और बाण धारण किये हैं, श्याम मेघके समान आभावाले हैं, सुवर्णके समान पीत वस्त्र धारण किये हैं, रत्न-जटित कुण्डलोंसे सुशोभित हैं, तथा जिनके कमल-दलके समान अति सुन्दर विशाल नेत्र हैं, भाई लक्ष्मणसहित उन श्रीरघुनाथजीकी मैं स्तुति करती हूँ ॥ ६० ॥
स्तुत्वैवं पुरुषं साक्षाद्राघवं पुरतः स्थितम् ।
परिक्रम्य प्रणम्याशु साऽनुज्ञाता ययौ पतिम् ॥६१॥
इस प्रकार सम्मुख खड़े हुए साक्षात् परमपुरुष श्रीरघुनाथजीकी स्तुति, परिक्रमा और वन्दना कर वह उनकी आज्ञा ले शीघ्र ही अपने पतिके पास चली गयी ॥६१॥
अहल्या कृतं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिसंयुतः ।
स मुच्यतेऽखिलैः पापैः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥६२॥
पुत्रार्थ्ये पठेद्भक्त्या रामं हृदि निधाय च ।
संवत्सरेण लभते वन्ध्या अपि सुपुत्रकम् ॥६३॥
सर्वान्कामानवाप्नोति रामचन्द्रप्रसादतः ॥६४॥
जो पुरुष अहल्याके किये हुए इस स्तोत्रको भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ जो वन्ध्या स्त्री भी श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें धारणकर पुत्रकी कामनासे इसका भक्तिपूर्वक पाठ करे तो एक वर्षमें ही उसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो सकता है तथा श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ६३–६४ ॥
ब्रह्मघ्नो गुरुतल्पगोऽपि पुरुषः
स्तेयी सुरापोऽपि वा
मातृभ्रातृविहिंसकोऽपि सततं
भोगैकबद्धाऽतुरः ।
नित्यं स्तोत्रमिदं जपन् रघुपतिं
भक्त्या हृदिस्थं स्मरन्
ध्यायन्मुक्तिमुपैति किं पुनरसौ
स्वाचारयुक्तो नरः ॥६५॥
ब्राह्मणका वध करनेवाला, गुरु-स्त्रीसे भोग करनेवाला, चोर, मद्यप, माता-पिता और भाईकी हिंसा करनेवाला तथा निरन्तर भोगासक्त रहनेवाला पुरुष भी यदि अपने हृदयमें विराजमान श्रीरघुनाथजीका भक्तिपूर्वक नित्य स्मरण करता है और उनका ध्यान करते हुए इस स्तोत्रका पाठ करता है तो मुक्त हो जाता है; फिर स्वधर्म-परायण पुरुषोंकी तो बात ही क्या है ? ॥ ६५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे
अहल्योद्धरणं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥