भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] | बालकाण्ड | २७


षष्ठ सर्ग

धनुर्भङ्ग और विवाह ।

सूत उवाच<br>विश्वामित्रोऽथ तं प्राह राघवं सहलक्ष्मणम् ।<br>गच्छामो वत्स मिथिलां जनकेनाभिपारिताम् ॥ १॥<br>दृष्ट्वा क्रतुवरं पश्चादयोध्यां गन्तुमर्हसि ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ गङ्गामुत्तर्तुं सहराघवः ।<br>तस्मिन्काले नाविकेन निषिद्धो रघुनन्दनः ॥ २॥<br><br>नाविक उवाच<br>क्षालयामि तव पादपङ्कजं<br>नाथ दारुदृषदोः किमन्तरम् ।<br>मानुषीकरणचूर्णमस्ति ते<br>पादयोरिति कथा प्रथीयसी ॥ ३॥<br>पादाम्बुजं ते विमलं हि कृत्वा<br>पश्चात्परं तीरमहं नयामि ।<br>नोचेत्तरी सद्युवती मलेन<br>स्याच्चेद्विभो विद्धि कुटुम्बहानिः ॥४॥<br>इत्युक्त्वा क्षालितौ पादौ परं तीरं ततो गताः ।<br>कौशिको रघुनाथेन सहितो मिथिलां ययौ ॥ ५॥<br>विदेहस्य पुरं प्रातर्ऋषिवाटं समाविशत् ।<br>प्राप्तं कौशिकमाकर्ण्य जनकोऽतिमुदान्वितः ॥ ६॥<br>पूजाद्रव्याणि संगृह्य सोपाध्यायः समाययौ ।<br>दण्डवत्प्रणिपत्याथ पूजयामास कौशिकम् ॥ ७॥<br>पप्रच्छ राघवौ दृष्ट्वा सर्वलक्षणसंयुतौ ।<br>द्योतयन्तौ दिशः सर्वाश्चन्द्र-सूर्याविवापरौ ॥ ८॥<br>कस्यैतौ नरशार्दूलौ पुत्रौ देवसुतोपमौ ।<br>मनःप्रीतिकरौ मेऽद्य नरनारायणाविव ॥ ९॥<br>प्रत्युवाच मुनिः प्रीतो हर्षयन् जनकं तदा ।<br>पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१०॥**सूतजी बोले—**तदनन्तर विश्वामित्रजीने लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीसे कहा, "वत्स ! अब हम महाराज जनकसे पालित मिथिलापुरीको चलेंगे ॥ १ ॥ वहाँ यज्ञोत्सव देखकर फिर तुम अयोध्यापुरीको लौट सकते हो।" ऐसा कह वे रघुनाथजीके साथ गङ्गाजी पार करनेके लिये तटपर आये, तब नाविकने रघुनाथजीको नावपर चढ़नेसे रोक दिया ॥ २ ॥<br><br>**नाविक बोला—**हे नाथ ! यह बात प्रसिद्ध है कि आपके चरणोंमें कोई मनुष्य बना देनेवाला चूर्ण है । (आपने अभी शिलाको स्त्री बना दिया, फिर) शिला और काष्ठमें भेद ही क्या है ? अतः नौकापर चढ़ाने-से पूर्व मैं आपके चरणकमलोंको धोऊँगा ॥ ३ ॥ इस प्रकार आपके चरणोंको मलरहित करके मैं आपको श्रीगङ्गाजीके उस पार ले चलूँगा । नहीं तो, हे विभो ! आपके चरण-रजके स्पर्शसे यदि मेरी नौका युवती हो गयी तो मेरे कुटुम्बकी आजीविका ही मारी जायगी ॥ ४ ॥ ऐसा कह केवटने उनके चरण धोये और फिर गङ्गाजीके पार ले गया । वहाँसे राम और लक्ष्मणके सहित श्रीविश्वामित्रजी मिथिलापुरी-को चले ॥ ५ ॥<br><br>प्रातःकाल होते ही वे विदेहनगरमें पहुँचकर ऋषियोंके निवास-स्थानमें ठहर गये । उसी समय, विश्वामित्रजीके आगमनकी सूचना पाकर जनकजी अत्यन्त प्रसन्नता-पूर्वक पूजन-सामग्री लिये अपने पुरोहितके साथ वहाँ आये, और साष्टांग दण्डवत् कर उन्होंने मुनिवर कौशिककी पूजा की ॥ ६-७ ॥ फिर साक्षात् दूसरे सूर्य और चन्द्रमाके समान अपने तेज-से सम्पूर्ण दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए उन सर्व-लक्षण-सम्पन्न रघुकुमारोंको देखकर पूछा—॥ ८ ॥ "ये देवपुत्रोंके समान दो नरशार्दूल किसके पुत्र हैं; ये मेरे हृदयमें इस समय नर और नारायणके समान प्रीति उत्पन्न करते हैं" ॥ ९ ॥<br><br>तब मुनिवर विश्वामित्रजीने महाराज जनकको आनन्दित करते हुए प्रसन्नतापूर्वक कहा—"ये दोनों