भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६
(संस्कृत)(हिन्दी अनुवाद)
मखसंरक्षणार्थाय मयानीतौ पितुः पुरात् ।<br>आगच्छन् राघवो मार्गे ताटकां विश्वघातिनीम् ११<br>शरेणैकेन हतवाबोदितो मेऽतिविक्रमः ।<br>ततो ममाश्रमं गत्वा मम यज्ञविहिंसकान् ॥१२॥<br>सुबाहुप्रमुखान्हत्वा मारीचं सागरेऽक्षिपत् ।<br>ततो गङ्गातटे पुण्ये गौतमस्याश्रमं शुभम् ॥१३॥<br>गत्वा तत्र शिलारूपा गौतमस्य वधूः स्थिता ।<br>पादपङ्कजसंस्पर्शात्कृता मानुषरूपिणी ॥१४॥<br>दृष्ट्वाहल्यां नमस्कृत्य तया सम्यक्प्रपूजितः ।<br>इदानीं द्रष्टुकामस्ते गृहे माहेश्वरं धनुः ॥१५॥<br>पूजितं राजभिः सर्वैरिष्टमित्यनुशुश्रुवे ।<br>अतो दर्शय राजेन्द्र शैवं चापमनुत्तमम् ॥<br>दृष्ट्वाऽयोध्यां जिगमिषुः पितरं द्रष्टुमिच्छति ॥१६॥<br><br>इत्युक्तो मुनिना राजा पूजार्हाविति पूज्य ।<br>पूजयामास धर्मज्ञो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥<br>ततः सम्प्रेषयामास मन्त्रिणं बुद्धिमत्तरम् ॥१७॥<br><br>जनक उवाच<br>शीघ्रमानय विश्वेशचापं रामाय दर्शय ॥१८॥<br><br>ततो गते मन्त्रिवरे राजा कौशिकमब्रवीत् ।<br>यदि रामो धनुर्धृत्वा कोट्यामारोपयेद्गुणम् ॥१९॥<br><br>तदा मयाऽऽत्मजा सीता दीयते राघवाय हि।<br>तथेति कौशिकोऽप्याह रामं संवीक्ष्य सस्मितम् ॥२०॥<br><br>शीघ्रं दर्शय चापाग्र्यं रामायामिततेजसे ।<br>एवं ब्रुवति मौनीशे आगताश्चापवाहकाः ॥२१॥<br><br>चापं गृहीत्वा बलिनः पञ्चसाहस्रसङ्ख्यकाः ।<br>घण्टाशतसमायुक्तं मणिवज्रादिभूषितम् ॥२२॥भाई राम और लक्ष्मण कोशल-नरेश दशरथजीके पुत्र हैं ॥१०॥ मैं इन्हें अपने यज्ञकी रक्षाके लिये अयोध्यासे ले आया था । मार्गमें आते समय मेरी प्रेरणासे इन अति पराक्रमी रघुनाथजीने एक ही बाणसे विश्वघातिनी ताटकाको मार डाला, फिर मेरे आश्रममें पहुँचकर मेरा यज्ञविध्वंस करनेवाले सुबाहु आदि राक्षसोंको मार डाला, तथा मारीचको समुद्रमें फेंक दिया । नन्दनन्दन ये गङ्गातटपर महर्षि गौतमके पुनीत आश्रममें आये और वहाँ शिलारूपमें स्थित गौतम-पत्नीको देख अपने चरणकमलके स्पर्शसे उसे मनुष्यरूप बना दिया ॥११-१४॥ अहल्याको देखकर रामजीने उसे नमस्कार किया फिर उसने भली प्रकार पूजा ग्रहणकर इस समय तुम्हारे यहाँ शंकरका धनुष देखनेके लिये आये हैं ॥१५॥ हमने सुना है उस धनुषकी तुम्हारे यहाँ बड़ी पूजा होती है और सब राजा लोग उसे देख गये हैं । अतः हे राजेन्द्र ! आप महादेवजीका वह उत्तम धनुष इन्हें दिखा दीजिये, क्योंकि ये उसे देखकर शीघ्र ही अपने माता-पितासे मिलनेके लिये अयोध्या जाना चाहते हैं। १६<br><br>मुनिवर विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मज्ञ राजा जनकने राम और लक्ष्मणको पूजनीय समझकर उनकी विधिपूर्वक पूजा की ॥१७॥ फिर अपने बुद्धिमान् मन्त्रीको यह कहकर भेजा कि तुम शीघ्र ही श्रीविश्वेश्वरका धनुष लाकर रामचन्द्रजीको दिखाओ ॥१८॥<br><br>मन्त्रीके चले जानेपर राजाने श्रीविश्वामित्रजीसे कहा, "यदि रामचन्द्रजी उस धनुषको उठाकर उसकी कोटियोंपर रोदा चढ़ा देंगे तो निश्चय मैं उन्हें ही अपनी कन्या सीता विवाह दूँगा ।" तब विश्वामित्रजीने रामजीकी ओर देखते हुए मुसकाकर कहा— "ठीक है ॥१९-२०॥ राजन् ! आप शीघ्र ही वह श्रेष्ठ धनुष अमित तेजसी रघुनाथजीको दिखाइये ।" मुनीश्वरके ऐसा कहते ही बड़े बलवान् पाँच हजार धनुष-वाहक उस धनुष-श्रेष्ठको लेकर वहाँ आ पहुँचे । उस धनुषमें सैकड़ों घंटियाँ बँधी हुई थीं तथा वह हीरे और मणि आदि रत्नोंसे सुसज्जित था ॥२१-२२॥ तब परामर्श-दाताओंमें श्रेष्ठ उन मन्त्रि-