भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७ ]उत्तरकाण्ड३६९
भक्त्याऽऽगत्य प्रसन्नं तं प्रणता प्राह हृष्टधीः ।<br>राम त्वं जगतामादिरादिमध्यान्तवर्जितः ॥५४॥जानकर अति भक्तिभावसे उनके पास आ उन्हें प्रसन्न जान अति हर्षसे विनयपूर्वक कहा—“हे राम ! तुम संसारके आदिकारण हो, तथा स्वयं आदि, अन्त और मध्यसे रहित हो ॥ ५३-५४॥
परमात्मा परानन्दः पूर्णः पुरुष ईश्वरः ।<br>जातोऽसि मे गर्भगृहे मम पुण्यातिरेकतः ॥५५॥तुम परमात्मा, परानन्दस्वरूप, सर्वत्र पूर्ण, जीवरूपसे शरीररूप पुरमें शयन करनेवाले और सबके स्वामी हो; मेरे प्रबल पुण्यके उदय होनेसे ही तुमने मेरे गर्भसे जन्म लिया है ॥५५॥
अवसाने ममाप्यद्य समयोऽभूद्रघूत्तम ।<br>नाद्याप्यबोधजः कृत्स्नो भवबन्धो निवर्तते ॥५६॥हे रघुश्रेष्ठ ! अब अन्त-समयमें मुझे आज ही (आपसे कुछ पूछनेका) समय मिला है, अभीतक मेरा अज्ञानजन्य संसार-बन्धन पूर्णतया नहीं टूटा ॥५६॥
इदानीमपि मे ज्ञानं भवबन्धनिर्वर्तकम् ।<br>यथा संक्षेपतो भूयात्तथा बोधय मां विभो ॥५७॥हे विभो! मुझे संक्षेपमें कोई ऐसा उपदेश दीजिये जिससे अब भी मुझे भवबन्धनका काटनेवाला ज्ञान हो जाय” ॥५७॥
निर्वेदवादिनीमेवं मातरं मातृवत्सलः ।<br>दयालुः प्राह धर्मात्मा जराजर्जरितां शुभाम् ॥५८॥माताके इस प्रकार वैराग्यपूर्ण वचन कहनेपर मातृ-भक्त, दयामय, धर्मपरायण भगवान् रामने जराजर्जरित शुभलक्षणा कौसल्याजीसे कहा—॥ ५८ ॥
मार्गास्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधकाः।<br>कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥५९॥“मैंने पूर्व-कालमें मोक्षप्राप्तिके साधनरूप तीन मार्ग बतलाये हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और सनातन भक्तियोग ॥ ५९ ॥
भक्तिर्विभिद्यते मातस्त्रिविधा गुणभेदतः ।<br>स्वभावो यस्य यस्तेन तस्य भक्तिर्विभिद्यते ॥६०॥हे मातः ! (साधकके) गुणानुसार भक्तिके तीन भेद हैं। जिसका जैसा स्वभाव होता है उसकी भक्ति भी वैसे ही भेदवाली होती है ॥६०॥
यस्तु हिंसां समुद्दिश्य दम्भं मात्सर्यमेव वा ।<br>भेददृष्टिश्च संरम्भी भक्तो मे तामसः स्मृतः ॥६१॥जो पुरुष हिंसा, दम्भ या मात्सर्यके उद्देश्यसे भक्ति करता है, तथा जो भेददृष्टिवाला और क्रोधी होता है वह तामस भक्त कहा गया है ॥ ६१ ॥
फलाभिसन्धिर्भोगाथीं धनकामो यशस्तथा ।<br>अर्चादौ भेदबुद्ध्या मां पूजयेत्स तु राजसः॥६२॥जो फलकी इच्छावाला, भोग चाहनेवाला तथा धन और यशकी कामनावाला होता है और भेदबुद्धिसे प्रतिमा आदिमें मेरी पूजा करता है वह रजोगुणी होता है ॥ ६२ ॥
परस्मिन्नर्पितं यस्तु कर्मनिर्हरणाय वा ।<br>कर्तव्यमिति वा कुर्याद्भेदबुद्ध्या स सात्त्विकः । ६३।तथा जो पुरुष परमात्माको अर्पण किये हुए कर्म-सम्पादन करनेके लिये अथवा 'करना चाहिये' इसलिये भेदबुद्धिसे कर्म करता है वह सात्त्विक है ॥ ६३ ॥
मद्गुणाश्रयणादेव मय्यनन्तगुणालये ।<br>अविच्छिन्ना मनोवृत्तिर्यथा गङ्गाम्बुनोऽम्बुधौ ।<br>तदेव भक्तियोगस्य लक्षणं निर्गुणस्य हि ॥६४॥जिस प्रकार गङ्गाजीका जल समुद्रमें अविच्छिन्न-भावसे लीन रहता है उसी प्रकार मनोवृत्तिका मेरे गुणों-के आश्रयसे मुझ अनन्त-गुणधाममें निरन्तर लीन हो जाना ही मेरे निर्गुण-भक्तियोगका लक्षण है ॥ ६४ ॥
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिर्मयि जायते ।मेरे प्रति जो निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न होती है
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