अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ३७० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| सा मे सालोक्यसामीप्यसार्ष्ट्रिसायुज्यमेव वा ॥६५॥<br>ददात्यपि न गृह्णन्ति भक्ता मत्सेवनं विना ।<br>स एवात्यन्तको योगो भक्तिमार्गस्य भामिनि ६६<br>मद्भावं प्राप्नुयात्तेन अतिक्रम्य गुणत्रयम् ॥६७॥<br><br>महता कामहीनेन स्वधर्माचरणेन च ।<br>कर्मयोगेन शस्तेन वर्जितेन विहिंसनात् ।<br>मद्दर्शनस्तुतिमहापूजाभिः स्मृतिवन्दनैः ॥६८॥<br>भूतेषु मद्भावनया सङ्गेनासत्यवर्जनैः ।<br>बहुमानेन महतां दुःखिनाम नुकम्पया ॥६९॥<br>स्वसमानेषु मैत्र्या च यमादीनां निषेवया ।<br>वेदान्तवाक्यश्रवणान्मम नामानुकीर्तनात् ॥७०॥<br>सत्सङ्गेनाऽऽर्जवेनैव ह्यहमः परिवर्जनात् ।<br>काङ्क्षया मम धर्मस्य परिशुद्धान्तरो जनः ॥७१॥<br>मद्गुणश्रवणादेव याति मामञ्जसा जनः ॥७२॥<br>यथा वायुवशाद्गन्धः स्वाश्रयाद्घ्राणमाविशेत् ।<br>योगाभ्यासरतं चित्तमेवमात्मानमाविशेत् ।<br>सर्वेषु प्राणिजातेषु ह्यहमात्मा व्यवस्थितः ॥७३॥<br>तमज्ञात्वा विमूढात्मा कुरुते केवलं बहिः ।<br>क्रियोत्पन्नैरनेकभेदैर्द्रव्यैर्ने माम्ब तोषणम् ॥७४॥<br>भूतावमानिनाऽर्चाय्यामर्चितोऽहं न पूजितः॥७५॥<br>तावन्मामर्चयेद्देवं प्रतिमादौ स्वकर्मभिः ।<br>यावत्सर्वेषु भूतेषु स्थितं चात्मनि न स्मरेत् ॥७६॥<br>यस्तु भेदं प्रकुरुते स्वात्मनश्च परस्य च ।<br>भिन्नदृष्टेर्भयं मृत्युस्तस्य कुर्यान्न संशयः ॥७७॥ | वह साधकको सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सायुज्य* चार प्रकारकी मुक्ति देती है; किन्तु उसके देनेपर भी वे भक्तजन मेरी सेवाके अतिरिक्त और कुछ ग्रहण नहीं करते । हे मात: ! भक्तिमार्गका आत्यन्तिक योग यही है ॥ ६५-६६ ॥ इसके द्वारा भक्त तीनों गुणोंको पार कर मेरा ही रूप हो जाता है ॥ ६७ ॥<br><br>(अब इस निर्गुण भक्तिका साधन बतलाता हूँ-)<br>अपने धर्मका अत्यन्त निष्काम भावसे आचरण करनेसे, अत्युत्तम हिंसारहित कर्म-योगसे, मेरे दर्शन, स्तुति, महापूजा, स्मरण और वन्दनसे ॥६८॥ प्राणियोंमें मेरी भावना करनेसे, असत्यके त्याग और सत्सङ्गसे, महापुरुषोंका अत्यन्त मान करनेसे, दुःखियोंपर दया करनेसे ॥६९॥ अपने समान पुरुषोंसे मैत्री करनेसे यम-नियमादिका सेवन करनेसे, वेदान्तवाक्योंका श्रवण करनेसे, मेरा नाम-सङ्कीर्तन करनेसे ॥७०॥ सत्सङ्ग और कोमलतासे, अहङ्कारका त्याग करनेसे और मेरे भागवत-धर्मोंकी इच्छा करनेसे जिसका चित्त शुद्ध हो गया है, वह पुरुष मेरे गुणोंका श्रवण करनेसे ही अति सुगमतासे मुझे प्राप्त कर लेता है ॥७१-७२॥ जिस प्रकार वायुके द्वारा गन्ध अपने आश्रयको छोड़कर घ्राणेन्द्रियमें प्रविष्ट होता है उसी प्रकार योगाभ्यासमें लगा हुआ चित्त आत्मामें लीन हो जाता है । समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे मैं ही स्थित हूँ ॥७३॥ हे मात: ! उसे न जानकर मूढ-पुरुष बाह्य भावना करता है, किन्तु क्रियासे उत्पन्न हुए अनेक पदार्थोंसे भी मेरा सन्तोष नहीं होता ॥ ७४ ॥ अन्य जीवोंका तिरस्कार करनेवाले प्राणियोंसे प्रतिमामें पूजित होकर भी मैं वास्तवमें पूजित नहीं होता ॥७५॥ मुझ परमात्मदेवका अपने कर्मोंद्वारा प्रतिमा आदिमें तभीतक पूजन करना चाहिये जबतक कि समस्त प्राणियोंमें और अपने आपमें मुझे स्थित न जाने ॥७६॥ जो अपने आत्मा और परमात्मामें भेद-बुद्धि करता है उस भेददर्शीको मृत्यु अवश्य भय उत्पन्न करती है, इसमें सन्देह नहीं ॥७७॥ इस- |
* वैकुण्ठादि भगवान्के लोकोंको प्राप्त करना 'सालोक्य' मुक्ति है। हर समय भगवान्हीके निकट रहना 'सामीप्य' है, भगवान्के समान ऐश्वर्य लाभ करना 'सार्ष्टि' है और भगवान्में लीन हो जाना 'सायुज्य' है।