अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ७] — उत्तरकाण्ड — ३७१
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मामन्तः सर्वभूतेषु परिच्छिन्नेषु संस्थितम् ।<br>एकं ज्ञानेन मानेन मैत्र्या चार्चेदभिन्नधीः ॥७८॥ | लिये अभेददर्शी भक्त समस्त परिच्छिन्न प्राणियोंमें स्थित मुझ एकमात्र परमात्माका ज्ञान, मान और मैत्री आदिसे पूजन करे ॥७८॥ |
| चेतसैवानिशं सर्वभूतानि प्रणमेत्सुधीः ।<br>ज्ञात्वा मां चेतनं शुद्धं जीवरूपेण संस्थितम् ॥७९॥ | इस प्रकार मुझ शुद्ध चेतनको ही जीवरूपसे स्थित जानकर बुद्धिमान् पुरुष अहर्निश सब प्राणियोंको चित्तसे ही प्रणाम करे ॥७९॥ |
| तस्मात्कदाचिन्नैक्षेत भेदमीश्वरजीवयोः ।<br>भक्तियोगो ज्ञानयोगो मया मातरुदीरितः ॥८०॥<br>आलम्ब्यैकतरं वापि पुरुषः शुभमृच्छति । | इसलिये जीव और ईश्वरका भेद कभी न देखे । हे मातः ! मैंने तुमसे यह भक्तियोग और ज्ञानयोगका वर्णन किया ॥८०॥ इनमेंसे एकका भी अवलम्बन करनेसे पुरुष आत्यन्तिक शुभ प्राप्त कर लेता है । |
| ततो मां भक्तियोगेन मातः सर्वहृदि स्थितम् ।<br>पुत्ररूपेण वा नित्यं स्मृत्वा शान्तिमवाप्स्यसि ॥८१॥ | अतः हे मातः ! मुझे सब प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित जानते हुए अथवा पुत्ररूपसे भक्तियोगके द्वारा नित्यप्रति स्मरण करते रहनेसे तुम शान्ति प्राप्त करोगी” ॥८१॥ |
| श्रुत्वा रामस्य वचनं कौसल्याऽऽनन्दसंयुता ॥८२॥<br>रामं सदा हृदि ध्यात्वा छित्त्वा संसारबन्धनम् ।<br>अतिक्रम्य गतीस्तिस्रोऽप्यवाप परमां गतिम् ॥८३॥ | भगवान् रामके ये वचन सुनकर कौसल्याजी आनन्दसे भर गयीं ॥८२॥ और हृदयमें निरन्तर श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई संसार-बन्धनको काटकर (जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति) तीनों प्रकारकी अवस्थाओंको पारकर परम गतिको प्राप्त हुईं ॥८३॥ |
| कैकेयी चापि योगं रघुपतिगदितं पूर्वमेवाधिगम्य<br>श्रद्धाभक्तिप्रशान्ता हृदि रघुतिलकं भावयन्ती गतासुः ।<br>गत्वा स्वर्गं स्फुरन्ती दशरथसहिता मोदमानावतस्थे<br>माता श्रीलक्ष्मणस्याप्यतिविमलमतिः प्राप भर्तुः समीपम् ॥८४॥ | कैकेयीने भी रघुनाथजीद्वारा पहले (चित्रकूट पर्वतपर) कहे हुए योगको हृदयंगम कर श्रद्धा और भक्ति-भावसे शान्तिपूर्वक हृदयमें रघुकुलतिलक भगवान् रामका ध्यान करते हुए प्राणत्याग किया और स्वर्गलोकमें जाकर दशरथजीके साथ सुशोभित हो आनन्दपूर्वक रहने लगीं । इसी प्रकार श्रीलक्ष्मणजीकी माता अत्यन्त विमल बुद्धिवाली सुमित्राने भी अपने पतिका सामीप्य प्राप्त किया ॥ ८४ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥