भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३७२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८]


अष्टम सर्ग

कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन।


श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
अथ काले गते कस्मिन् भरतो भीमविक्रमः ।<br>युधाजिता मातुलेन ह्याहूतोऽगात्ससैनिकः ॥ १ ॥<br><br>रामाज्ञया गतस्तत्र हत्वा गन्धर्वनायकान् ।<br>तिस्रः कोटीः पुरे द्वे तु निवेश्य रघुनन्दनः ॥ २ ॥<br><br>पुष्करं पुष्करावत्यां तक्षं तक्षशिलाह्वये ।<br>अभिषिच्य सुतौ तत्र धनधान्यसुहृद्वृतौ ॥ ३ ॥<br><br>पुनरागत्य भरतो रामसेवापरोऽभवत् ।<br>ततः प्रीतो रघुश्रेष्ठो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥ ४ ॥<br><br>उभौ कुमारौ सौमित्रे गृहीत्वा पश्चिमां दिशम् ।<br>तत्र भिल्लान्विनिर्जित्य दुष्टान् सर्वापकारिणः ॥ ५ ॥<br><br>अङ्गदश्चित्रकेतुश्च महासत्त्वपराक्रमौ ।<br>द्वयोर्द्वे नगरे कृत्वा गजाश्वधनरत्नकैः ॥ ६ ॥<br><br>अभिषिच्य सुतौ तत्र शीघ्रमागच्छ मां पुनः ।<br>रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य गजाश्वबलवाहनः ॥ ७ ॥<br><br>गत्वा हत्वा रिपून् सर्वान् स्थापयित्वा कुमारकौ ।<br>सौमित्रिः पुनरागत्य रामसेवापरोऽभवत् ॥ ८ ॥हे पार्वति ! कुछ काल बीतनेपर उग्रपराक्रमी भरतजी अपने मामा युधाजित्-द्वारा बुलाये जानेपर भगवान् रामकी आज्ञा लेकर सेनासहित उनके यहाँ गये। वहाँ पहुँचकर रघुकुलनन्दन भरतजीने तीन करोड़ प्रमुख गन्धर्वोंको मार कर दो नगर बसाये ॥१-२॥ उन्होंने पुष्करावतीमें पुष्कर और तक्षशिलामें तक्ष नामक अपने दोनों पुत्रोंको अभिषिक्त कर और उन्हें धन-धान्य तथा मित्र-मण्डलसे सम्पन्न कर वे लौट आये और भगवान् रामकी सेवामें तत्पर हो गये। तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—॥३-४॥ "हे सुमित्रानन्दन ! तुम अपने दोनों कुमारोंको लेकर पश्चिम दिशामें जाओ और वहाँ सबका अपकार करनेवाले दुष्ट भिल्लोंको जीतकर दोनोंके लिये दो नगर बसाओ और उनमें महाबलवान् और पराक्रमी अङ्गद तथा चित्रकेतुका हाथी, घोड़े, धन और रत्नादि उपकरणोंसे राजतिलक कर फिर तुरन्त ही मेरे पास लौट आओ।" भगवान् रामकी इस आज्ञाको शिरोधार्य कर लक्ष्मणजी हाथी-घोड़े आदि दल-बलके सहित गये और समस्त शत्रुओंको मारकर दोनों कुमारोंको राजपदपर नियुक्त कर लौट आये तथा फिर रामसेवामें तत्पर हो गये ॥५-८॥
ततस्तु काले महति प्रयाते<br>रामं सदा धर्मपथे स्थितं हरिम् ।<br>द्रष्टुं समागादृषिवेषधारी<br>कालस्ततो लक्ष्मणमित्युवाच ॥ ९ ॥<br><br>निवेदयस्वातिबलस्य दूतं<br>मां द्रष्टुकामं पुरुषोत्तमाय ।<br>रामाय विज्ञापनमस्ति तस्य<br>महर्षिमुख्यस्य चिराय धीमन् ॥ १० ॥<br><br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरयान्वितः ।<br>आचचक्षेऽथ रामाय स सम्प्राप्तं तपोधनम् ॥ ११ ॥<br><br>एवं ब्रुवन्तं प्रोवाच लक्ष्मणं राघवो वचः ।<br>शीघ्रं प्रवेश्यतां तात मुनिः सत्कारपूर्वकम् ॥ १२ ॥तदनन्तर बहुत-सा काल व्यतीत होनेपर सर्वदा धर्ममार्गका अवलम्बन करनेवाले भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये ऋषिवेष धारण कर काल आया और लक्ष्मणजीसे यों बोला—॥९॥ "हे बुद्धिमान् ! तुम पुरुषोत्तम महाराज रामसे निवेदन करो कि महर्षि अतिबलका दूत आपके दर्शनकी इच्छासे आया है। मुझे उन्हें बहुत देरतक उन महर्षिश्रेष्ठका सन्देश सुनाना है" ॥१०॥ उसके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजीने तुरन्त ही श्रीरघुनाथजीसे कहा कि 'एक तपोधन आये हैं' ॥११॥ लक्ष्मणजीके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने उनसे कहा—"भैया, मुनिराजको तुरन्त ही बड़े सत्कारपूर्वक भीतर ले आओ" ॥१२॥