अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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तथा भोगवतं नागमनन्तमुदकेशयम् ॥२५॥
मायया जनयित्वा त्वं द्वौ ससत्त्वौ महाबलौ ।
मधुकैटभौ दैत्यौ हत्वा मेदोऽस्थिसञ्चयम् ॥२६॥
इमां पर्वतसम्बद्धां मेदिनीं पुरुषर्षभ ।
पद्मे दिव्यार्कसङ्काशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि ॥२७॥
क्षां विधाय प्रजाध्यक्षं मयि सर्वं न्यवेदयत् ।
सोऽहं संयुक्तसम्भारस्त्वामवोचं जगत्पते ॥२८॥
रक्षां विधत्स्व भूतेभ्यो ये मे वीर्यापहारिणः ।
ततस्त्वं कश्यपाज्जातो विष्णुर्वामनरूपधृक् ॥२९॥
हतवानसि भूभारं वधाद्रक्षोगणस्य च ।
सर्वांस्तूत्सार्यमाणासु प्रजासु धरणीधर ॥३०॥
रावणस्य वधाकाङ्क्षी मर्त्यलोकमुपागतः ।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥३१॥
कृत्वा वासस्य समयं त्रिदशेष्वात्मनः पुरा ।
स ते मनोरथः पूर्णः पूर्णे चायुषि ते नृषु ॥३२॥
कालस्तापसरूपेण त्वत्समीपमुपागमत् ।
ततो भूयश्च ते बुद्धिर्यदि राज्यमुपासितुम् ॥३३॥
तत्तथा भव भद्रं ते एवमाह पितामहः ।
यदि ते गमने बुद्धिर्देवलोकं जितेन्द्रिय ॥३४॥
सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ॥३५॥
चतुर्मुखस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा कालेन भाषितम् ।
हसन् रामस्तदा वाक्यं कृत्स्नस्यान्तकमब्रवीत् ।
श्रुतं तव वचो मेऽद्य ममापीष्टतरं तु तत् ॥३६॥
सन्तोषः परमो ज्ञेयस्त्वदागमनकारणात् ।
त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः॥३७॥
भद्रं तेऽस्त्वगमिष्यामि यत एवाहमागतः ।
पुत्र मुझको तथा जलमें शयन करनेवाले अनन्त नामक फणधारी शेषनागको रचा ॥२५॥ इस प्रकार मायासे हमें उत्पन्न कर आपने महाबली और बड़े शूरवीर दो मधुकैटभ नामक दैत्योंको मारा तथा उनके मेद और अस्थियोंके समूहरूप इस पर्वतादिसे युक्त पृथिवीको रचा। हे पुरुषश्रेष्ठ ! फिर अपनी नाभिसे प्रकट हुए दिव्य सूर्यके समान तेजस्वी कमलसे मुझे उत्पन्न कर और मुझे ही प्रजापति बनाकर सृष्टि-रचनाका सारा भार मुझे ही सौंप दिया । हे जगत्पते ! इस प्रकार भार ग्रहण करनेपर मैं आपसे बोला-॥२६-२८॥ “जो प्राणी मेरे वीर्य (प्रजा) का नाश करनेवाले हैं उनसे रक्षा कीजिये।” तब आप कश्यपजीके यहाँ वामनरूपधारी विष्णुभगवान् होकर प्रकट हुए ॥२९॥ और राक्षसोंका नाश करके आपने पृथिवीका भार उतारा । हे धरणीधर ! (इस समय भी) सारी प्रजा-को उच्छिन्न होते देख आप रावणका वध करनेके लिये मर्त्यलोकमें पधारे थे। यहाँ रहनेके लिये आपने पूर्वकालमें देवताओंमें ग्यारह सहस्र वर्षका समय निश्चित किया था, सो आपकी मानव-शरीरकी आयु पूर्ण होनेके साथ ही आपका वह मनोरथ पूर्ण हो चुका है ॥३०-३२॥ अब, तापसरूपसे काल आपके पास आया है। यदि अभी आपका विचार कुछ दिन और राज्य करनेका हो तो आपका शुभ हो, वैसा ही कीजिये'-ऐसा पितामह ब्रह्माजीने कहा है। हे जितेन्द्रिय ! यदि आपका विचार भी देवलोक चलनेका हो तो (आप) विष्णुभगवान्से सनाथ होकर देवगण निश्चिन्त हो जायें” ॥३३-३५॥
कालके मुखसे ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रामजी हँसे और सबका अन्त करनेवाले कालसे बोले- “मैंने तुम्हारी सब बातें सुन लीं । वे मुझे भी अत्यन्त इष्ट हैं ॥ ३६ ॥ तुम्हारे आनेके कारण मुझे बड़ा सन्तोष हुआ है। मेरा अवतार तीनों लोकोंका कार्य करनेके लिये ही हुआ करता है ॥३७॥ तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जहाँसे आया था वहीं फिर