अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
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सर्ग ८ ] | उत्तरकाण्ड | ३७५
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मनोरथस्तु सम्प्राप्तो न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥३८॥<br><br>मत्सेवकानां देवानां सर्वकार्येषु वै मया ।<br>स्थातव्यं मायया पुत्र यथा चाह प्रजापतिः ॥३९॥ | पहुँच आऊँगा; मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया, इसमें मुझे कुछ विचारना नहीं है ॥३८॥ हे पुत्र ! देवगण मेरे सेवक हैं; मुझे, जैसा कि ब्रह्माजीने कहा है, मायासे उनके सब कार्योंमें अवश्य तत्पर रहना चाहिये" ॥३९॥ |
| एवं तयोः कथयतोर्दुर्वासा मुनिरभ्यगात् ।<br>राजद्वारं राघवस्य दर्शनापेक्षया द्रुतम् ॥४०॥ | उनके इस प्रकार वार्तालाप करते समय मुनिवर दुर्वासाजी रघुनाथजीके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रताके साथ राजद्वारपर पहुँचे ॥४०॥ |
| मुनिर्लक्ष्मणमासाद्य दुर्वासा वाक्यमब्रवीत् ।<br>शीघ्रं दर्शय रामं मे कार्यं मेऽत्यन्तमाहितम् ॥४१॥ | वहाँ दुर्वासा मुनिने लक्ष्मणजीके पास आकर कहा—"मुझे तुरन्त ही महाराज रामसे मिलाओ, मेरा उनसे एक अत्यन्त आवश्यक कार्य आ पड़ा है" ॥४१॥ |
| तच्छ्रुत्वा प्राह सौमित्रिर्मुनिं ज्वलनतेजसम् ।<br>रामेण कार्यं किं तेऽद्य किं तेऽभीष्टं करोम्यहम् ॥४२॥ | यह सुन श्रीलक्ष्मणजीने उन अग्निके समान तेजस्वी मुनिसे कहा—"इस समय महाराज रामसे आपको क्या काम है ? आपकी क्या इच्छा है ? उसे मैं ही पूरा करूँगा ॥४२॥ |
| राजा कार्यान्तरे व्यग्रो मुहूर्तं सम्प्रतीक्ष्यताम् ।<br>तच्छ्रुत्वा क्रोधसन्तप्तो मुनिः सौमित्रिमब्रवीत् ॥४३॥ | इस समय महाराज एक और कार्यमें संलग्न हैं, कुछ देर ठहरिये।" यह सुनते ही मुनिने क्रोधसे व्याकुल होकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥४३॥ |
| अस्मिन् क्षणे तु सौमित्रे न दर्शयसि चेद्दिदृक्षुम् ।<br>रामं सविषयं वंशं भस्मीकुर्यां न संशयः ॥४४॥ | "लक्ष्मण ! यदि इसी क्षण तुमने मुझे भगवान् रामसे न मिलाया, तो इसमें सन्देह नहीं, मैं देशके सहित तुम्हारे वंशको अभी भस्म कर डालूँगा' ॥४४॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं घोरमृषेर्दुर्वाससो भृशम् ।<br>स्वरूपं तस्य वाक्यस्य चिन्तयित्वा स लक्ष्मणः ॥<br>सर्वनाशाद्वरं मेऽद्य नाशो ह्येकस्य कारणात् ।<br>निश्चित्यैवं ततो गत्वा रामाय प्राह लक्ष्मणः ॥४६॥ | दुर्वासा ऋषिका यह भयङ्कर वाक्य सुनकर लक्ष्मणजीने उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार किया और यह निश्चय कर कि एकके कारण सबके नाशसे तो (अकेले) मेरा नष्ट होना ही अच्छा है, उन्होंने रामचन्द्रजीके पास जाकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥४५-४६॥ |
| सौमित्रेर्वचनं श्रुत्वा रामः कालं व्यसर्जयत् ।<br>शीघ्रं निर्गम्य रामोऽपि ददर्शात्रेः सुतं मुनिम् ॥४७॥ | लक्ष्मणजीके वचन सुनकर रामचन्द्रजीने कालको विदा किया और शीघ्र ही बाहर आ अत्रिनन्दन दुर्वासाजीसे मिले ॥४७॥ |
| रामोऽभिवाद्य सम्प्रीतो मुनिं पप्रच्छ सादरम् ।<br>किं कार्यं ते करोमीति मुनिमाह रघूत्तमः ॥४८॥ | रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको प्रणाम कर चित्तमें प्रसन्न हो उनसे आदरपूर्वक पूछा । रामने मुनिसे कहा—"हे मुने ! मैं आपका क्या कार्य करूँ ?" ॥४८॥ |
| तच्छ्रुत्वा रामवचनं दुर्वासा राममब्रवीत् ।<br>अद्य वर्षसहस्राणामुपवाससमापनम् ॥४९॥<br><br>अतो भोजनमिच्छामि सिद्धं यत्ते रघूत्तम । | श्रीरामके ये वचन सुनकर दुर्वासाजीने कहा—"आज मेरा एक हजार वर्षका उपवास समाप्त हुआ है ॥४९॥ इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! आपके यहाँ जो भोजन तैयार हो मुझे उसीकी इच्छा है।" मुनिके ये वचन सुन |