भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३७६. अध्यात्मरामायण [ सर्ग ८


राम्रो मुनिवचः श्रुत्वा सन्तोषेण समन्वितः ॥५०॥
स सिद्धमन्नं मुनये यथावत्समुपाहरत् ।
मुनिर्भुक्त्वाऽन्नममृतं सन्तुष्टः पुनरभ्यगात् ॥५१॥
स्वमाश्रमं गते तस्मिन् रामः सस्मार भाषितम् ।
कालेन शोकदुःखार्तो विमनाश्चातिविह्वलः ॥५२॥
अवाङ्मुखो दीनमना न शशाकाभिभाषितुम् ।
मनसा लक्ष्मणं ज्ञात्वा हतप्रायं रघूद्वहः ॥५३॥
अवाङ्मुखो बभूवाथ तूष्णीमेवाखिलेश्वरः ।
ततो रामं विलोक्याह सौमित्रिर्दुःखसम्प्लुतम् ॥५४॥
तूष्णीम्भूतं चिन्तयन्तं गर्हन्तं स्नेहबन्धनम् ।
मत्कृते त्यज सन्तापं जहि मां रघुनन्दन ॥५५॥
गतिः कालस्य कलिता पूर्वमेवेदृशी प्रभो ।
त्वयि हीनप्रतिज्ञे तु नरको मे ध्रुवं भवेत् ॥५६॥
मयि प्रीतिर्यदि भवेद्यद्यनुग्राह्यता तव ।
त्यक्त्वा शङ्कां जहि प्राज्ञ मा मा धर्मं त्यज प्रभो ॥५७॥
सौमित्रिणोक्तं तच्छ्रुत्वा रामश्चलितमानसः ।
आहूय मन्त्रिणः सर्वान् वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥५८॥
मुनेरागमनं यत्तु कालस्यापि हि भाषितम् ।
प्रतिज्ञामात्मनश्चैव सर्वमावेदयत्प्रभुः ॥५९॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं मन्त्रिणः सपुरोहिताः ।
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राममक्लिष्टकारिणम् ॥६०॥
पूर्वमेव हि निर्दिष्टं तव भूभारहारिणः ।
लक्ष्मणेन वियोगस्ते ज्ञातो विज्ञानचक्षुषा ॥६१॥
त्यजाशु लक्ष्मणं राम मा प्रतिज्ञां त्यज प्रभो ।
प्रतिज्ञाते परित्यक्ते धर्मो भवति निष्फलः ॥६२॥


रामचन्द्रजीने सन्तुष्ट हो उन्हें विधिपूर्वक सिद्ध (पकाया हुआ) अन्न दिया और मुनि उस अमृततुल्य अन्नको खाकर तृप्त होकर चले गये ॥५०-५१॥

जब दुर्वासा मुनि अपने आश्रमको चले गये तो रघुनाथजीको कालके कहे हुए वचनोंका स्मरण हुआ। इससे वे शोक और दुःखसे आर्त्त तथा अति उदास और व्याकुल हो गये ॥५२॥ रघुकुल-भूषण रामने मन-ही-मन लक्ष्मणको मरा हुआ-सा मान लिया किन्तु वे दीन चित्तसे नीचेको मुख किये बैठे रहे, उनसे कुछ कह न सके ॥५३॥ सर्वेश्वर भगवान् राम नीचा मुख किये चुपचाप रह गये। तब रघुनाथजीको अत्यन्त दुःखातुर, मौन, चिन्तित और स्नेह-बन्धनकी निन्दा करते देख लक्ष्मणजीने कहा—"हे रघुनन्दन ! मेरे लिये सन्ताप न कीजिये, मुझे शीघ्र ही मार डालिये ॥५४-५५॥ प्रभो ! मैंने पहले ही निश्चय कर लिया था, कालकी गति ऐसी ही है। आपके प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे तो मुझे भी अवश्य नरक भोगना पड़ेगा ॥५६॥ अतः यदि आपकी मुझपर प्रीति है और यदि मैं अनुग्रह करनेयोग्य हूँ तो हे मतिमान् रामजी ! शङ्का छोड़कर मुझे मार डालिये। प्रभो ! धर्मका त्याग न कीजिये ॥५७॥

लक्ष्मणजीका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीका चित्त चञ्चल हो गया। उन्होंने सब मन्त्रियोंको बुलाकर यह सब वृत्तान्त वसिष्ठजीको सुनाया ॥५८॥ प्रभु रामने दुर्वासा मुनिका आगमन, कालका भाषण और अपनी प्रतिज्ञा ये सब बातें उनसे कह दीं ॥५९॥ रामचन्द्रजीका कथन सुन पुरोहित वसिष्ठजीके सहित समस्त मन्त्रियोंने सब कार्य लीलाहीसे करनेवाले भगवान् रामसे हाथ जोड़कर कहा—॥६०॥ "प्रभो! पृथिवीका भार उतारनेवाले आपका लक्ष्मणजीसे पहले ही वियोग होना निश्चित है—यह बात हमने ज्ञान-दृष्टिसे जान ली है ॥६१॥ अतः हे राम ! तुरन्त ही लक्ष्मणजीको त्याग दीजिये, प्रभो ! अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग न कीजिये क्योंकि प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेसे सारा धर्म निष्फल हो जाता है ॥६२॥ और हे राम ! सम्पूर्ण धर्मका