भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

कौसल्या शुशुभे देवी रामेण सह सीतया ।<br>देवमातेव पौलोम्या शच्या शक्रेण शोभना ॥५६॥<br>साकेते लोकनाथप्रथितगुणगणो-<br>लोकसङ्गीतकीर्तिः<br>श्रीरामो सीतयाऽऽस्तेऽखिलजननिकरा-<br>नन्दसन्दोहमूर्त्तिः ।<br>नित्यश्रीर्निर्विकारो निरवधिविभवो<br>नित्यमायानिरासो<br>मायाकार्यानुसारी मनुज इव सदा<br>भाति देवोऽखिलेशः ॥५७॥ | तदुपरांत देवी कौसल्या राम और सीताके सहित इस प्रकार सुशोभित हुईं जैसे पुलोम-पुत्री शची और इन्द्रके सहित देवमाता अदिति शोभायमान होती हैं ॥ ५६ ॥ जिनके गुणगण ब्रह्मा आदि सकल लोकपालोंमें प्रसिद्ध हैं, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण लोकोंमें गायी जाती है, जो सारे मनुष्योंके आनन्द-समूहकी मूर्ति हैं, जो नित्य, शोभाधाम, निर्विकार, अनन्त-वैभव, और सदा मायातीत होकर भी माया-कार्योंका अनुसरण करते हुए सदा मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं वे अखिलेश्वर भगवान् राम सीताजीके साथ साकेत (अयोध्या) धाममें विराजने लगे ॥ ५७ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


समाप्तमिदं बालकाण्डम्