अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ७] बालकाण्ड ३७
नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ।
नमः कारुणिकानन्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते॥४४॥
देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ।
तत्सर्वं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते ॥४५॥
ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः ।
प्रसन्नोऽस्मि तव ब्रह्मन् यत्ते मनसि वर्तते ॥ ४६॥
दास्ये तदखिलं कामं मा कुरुष्वात्र संशयम् ।
ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् ॥४७॥
यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ।
त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे दृढा भक्तिः सदास्तु मे॥४८॥
स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु भक्तिहीनोऽपि सर्वदा ।
त्वद्भक्तिस्तस्य विज्ञानं भूयादन्ते स्मृतिस्तव॥४९॥
तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।
पूजितस्तदनुज्ञातो महेन्द्राचलमन्वगात् ॥५०॥
राजा दशरथो हृष्टो रामं मृतमिवागतम् ।
आलिङ्ग्यालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यांजलमुत्सृजत्॥५१॥
ततः प्रीतेन मनसा स्वस्वचित्तः पुरं ययौ ।
रामलक्ष्मणशत्रुघ्नभरता देवसंमिताः ।
स्वां स्वां भार्यामुपादाय रेमिरे स्वस्वमन्दिरे ॥५२॥
मातापितृभ्यां संहृष्टो रामः सीतासमन्वितः ।
रेमे वैकुण्ठभवने श्रिया सह यथा हरिः ॥५३॥
युधाजिन्नाम कैकेयीभ्राता भरतमातुलः ।
भरतं नेतुमागाच्छत्स्वराज्यं प्रीतिसंयुतः ॥५४॥
प्रेषयामास भरतं राजा स्नेहसमन्वितः ।
शत्रुघ्नं चापि संपूज्य युधाजितमरिन्दमः ॥५५॥
कर देते हैं, फिर वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंको पवित्र कर देते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ॥४३॥ हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है । हे भक्तिभावन ! आपको नमस्कार है । हे करुणामय ! हे अनन्त ! आपको नमस्कार है । हे रामचन्द्र ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे देव ! मैंने पुण्यलोक-प्राप्तिके लिये जो कुछ पुण्य-कर्म किये हैं वे सब आपके इस बाणके लक्ष्य हों । हे राम आपको नमस्कार है" ॥४५॥ तब करुणामय भगवान् श्रीरामचन्द्रने प्रसन्न होकर कहा—"हे ब्रह्मन् ! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो-जो कामनाएँ हैं उन सभीको मैं पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह न करना ।” तब परशुरामजीने प्रसन्न-चित्त होकर रामसे कहा— ॥ ४६-४७ ॥ "हे मधुसूदन राम ! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे सदा आपके भक्तोंका संग रहे और आपके चरण-कमलोंमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो ॥ ४८ ॥ तथा कोई भक्तिहीन पुरुष भी यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो उसे सर्वदा आपकी भक्ति मिले और ज्ञान प्राप्त हो तथा अन्तमें आपकी स्मृति रहे" ॥ ४९ ॥
तदनन्तर रघुनाथजीके 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहनेपर परशुरामजीने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूजित हो उनकी आज्ञासे महेन्द्र-पर्वतपर चले गये ॥ ५० ॥ राजा दशरथने रामको मानों मृत्युसे लौटे हुए समझ अत्यन्त हर्षसे बारम्बार आलिंगन किया और नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओं-की वर्षा करने लगे ॥ ५१ ॥ तदनन्तर वे सब प्रसन्न-चित्तसे अपनी अयोध्यापुरीमें आये । वहाँ पहुँचकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ देवताओंके समान अपने अपने महलोंमें रमण करने लगे ॥ ५२ ॥ सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी अपने माता-पिताओंका आनन्द बढ़ाते हुए इस प्रकार रमण करने लगे जैसे वैकुण्ठ-लोकमें भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ विहार करते हैं ॥ ५३ ॥
इसी समय कैकेयीके भाई भरतजीके मामा युधाजित् भरतको प्रीतिपूर्वक अपने यहाँ ले जानेके लिये आये ॥ ५४ ॥ शत्रुदमन महाराज दशरथने भी युधाजित्का सत्कार कर उनके स्नेहवश भरत और शत्रुघ्नको उनके साथ भेज दिया ॥ ५५ ॥