भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७


यथा जले फेनजालं धूमो वह्नौ तथा त्वयि ।<br>त्वदाधारा त्वद्विषया माया कार्यं सृजत्यहो ॥३२॥अहो ! जलके फेन-समूह और अग्निके धूँएँके समान आपके आश्रित और आपहीको विषय करनेवाली माया नाना प्रकारके विचित्र कार्योंकी रचना करती है ॥ ३२ ॥
यावन्मायावृता लोकास्तावत्त्वां न विजानते ।<br>अविचारितसिद्धैषाऽविद्या विद्याविरोधिनी ॥३३॥मनुष्य जबतक मायासे आवृत्त रहते हैं तबतक आपको नहीं जान सकते । विद्याकी विरोधिनी यह अविद्या जबतक विचार नहीं किया जाता तभी-तक रहती है ॥ ३३ ॥
अविद्याकृतदेहादिसङ्घाते प्रतिबिम्बिता ।<br>चिच्छक्तिर्जीवलोकेऽस्मिन् जीव इत्यभिधीयते॥३४॥अविद्याजन्य देहादि संघातोंमें प्रतिबिम्बित हुई चित्-शक्ति ही इस जीव-लोकमें 'जीव' कहलाती है ॥ ३४ ॥
यावद्देहमनःप्राणबुद्ध्यादिष्वभिमानवान् ।<br>तावत्कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखादिभाग्भवेत् ॥३५॥यह जीव जबतक देह, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें अभिमान करता है तभीतक कर्तृत्व, भोक्तृत्व और सुख-दुःखादिको भोगता है ॥ ३५ ॥
आत्मनः संसृतिर्नास्ति बुद्धेर्ज्ञानं न जात्विति ।<br>अविवेकाद्द्वयं युङ्क्त्वा संसारीति प्रवर्तते ॥३६॥वास्तवमें आत्मामें जन्म-मरणादि संसार किसी भी अवस्थामें नहीं है और बुद्धिमें कभी ज्ञान-शक्ति नहीं है। अविवेकसे इन दोनोंको मिलाकर जीव 'संसारी हूँ' ऐसा मानकर कर्ममें प्रवृत्त हो जाता है ॥ ३६ ॥
जडस्य चित्समायोगाच्चित्त्वं भूयाच्चितेस्तथा ।<br>जडसङ्गाज्जडत्वं हि जलाग्न्योर्मेलनं यथा ॥३७॥जल और अग्निका मेल होनेसे जैसे जलमें उष्णता और अग्निमें शान्तता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जड (बुद्धि) का चेतन (आत्मा) से संयोग होनेसे उसमें चेतनता और चेतन आत्मा-का जड-बुद्धिसे संयोग होनेसे उसमें (कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि) जडता प्रकट हो जाती है ॥३७॥
यावत्त्वत्पादभक्तानां सङ्गसौख्यं न विन्दति ।<br>तावत्संसारदुःखौघान्न निवर्तेन्नरः सदा ॥३८॥हे राम ! जबतक मनुष्य आपके चरण-कमलोंके भक्तोंका संगसुख निरन्तर अनुभव नहीं करता तबतक संसारके दुःख-समूहसे पार नहीं होता ॥ ३८ ॥
तत्सङ्गलब्धया भक्त्या यदा त्वां समुपासते ।<br>तदा माया शनैर्याति तानवं प्रतिपद्यते ॥३९॥जब वह भक्तजनों-के सङ्गसे प्राप्त हुई भक्तिद्वारा आपकी उपासना करता है तब आपकी माया शनैः-शनैः चली जाती है और वह क्षीण होने लगती है ॥ ३९ ॥
ततस्त्वज्ज्ञानसम्पन्नः सद्गुरुस्तेन लभ्यते ।<br>वाक्यज्ञानं गुरोर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादाद्विमुच्यते ॥४०॥फिर उस साधकको आपके ज्ञानसे सम्पन्न सद्गुरुकी प्राप्ति होती है और उन सद्गुरुदेवसे महावाक्यका बोध पाकर वह आपकी कृपासे मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥
तस्मात्त्वद्भक्तिहीनानां कल्पकोटिशतैरपि ।<br>न मुक्तिशङ्का विज्ञानशङ्का नैव सुखं तथा ॥४१॥अतः आपकी भक्तिसे शून्य पुरुषोंको सौ करोड़ कल्पोंमें भी मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेकी सम्भावना नहीं है और इसीलिये उन्हें वास्तविक सुख मिलनेकी भी सम्भावना नहीं है ॥ ४१ ॥
अतस्त्वत्पादयुगले भक्तिर्मे जन्मजन्मनि ।<br>स्यात्त्वद्भक्तिमतां सङ्गोऽविद्या याभ्यां विनश्यति ॥अतः मैं यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तरमें आपके चरण-युगलमें मेरी भक्ति हो और मुझे आपके भक्तोंका सङ्ग मिले क्योंकि इन्हीं दोनों साधनोंसे अविद्याका नाश होता है ॥ ४२ ॥
लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वद्धर्मामृतवर्षिणः ।<br>पुनन्ति लोकमखिलं किं पुनः स्वकुलोद्भवान्॥४३॥संसारमें आपकी भक्तिमें तत्पर और भगवद्धर्म-रूप अमृत-की वर्षा करनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण लोकको पवित्र