भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७] बालकाण्ड ३५


संस्कृतहिन्दी
एवं त्वं हि प्रकर्तव्यं वद शीघ्रं ममाज्ञया ।अब तुम्हारे साथ मेरा जो कुछ कर्तव्य है वह तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही बताओ।”
एवं वदति श्रीरामे भार्गवो विकृताननः ॥ १९ ॥<br>संस्मरन्पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥ २० ॥रामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भृगु-नन्दन परशुराम-जीका मुख मलिन हो गया ॥ १९ ॥ फिर उन्होंने पूर्व-वृत्तान्तको स्मरण कर यह कहा—“हे राम ! हे राम ! हे महाबाहो ! मैंने आप परमेश्वरको जान लिया ॥ २० ॥
पुराणपुरुषं विष्णुं जगत्सर्गलयोद्भवम् ।<br>बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमञ्जसा ॥ २१ ॥आप साक्षात् संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण, पुराण-पुरुष भगवान् विष्णु हैं । मैं बाल्यावस्थामें विष्णुभगवान्‌की आराधना करनेके लिये अकस्मात्
चक्रतीर्थं शुभं गत्वा तपसा विष्णुमन्वहम् ।<br>अतोषयं महात्मानं नारायणमनन्यधीः ॥ २२ ॥परम पवित्र चक्रतीर्थमें पहुँचा और वहाँ प्रति-दिन अनन्यभावसे तपस्या करते हुए मैंने परमात्मा नारायण भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया ॥ २१-२२ ॥
ततः प्रसन्नो देवेशः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>उवाच मां रघुश्रेष्ठ प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥ २३ ॥हे रघुश्रेष्ठ ! उस समय शङ्ख-चक्र-गदाधारी प्रसन्नवदन देवेश्वर विष्णुने मुझसे प्रसन्न होकर कहा ॥ २३ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन्फलितं ते तपो महत् ।<br>मञ्चिदांशेन युक्तस्त्वं जहि हैहयपुङ्गवम् ॥ २४ ॥**श्रीभगवान् बोले—**हे ब्रह्मन् ! तपस्या छोड़कर खड़े हो, तुम्हारा महान् तप सफल हो गया । तुम मेरे चिदंशसे युक्त होकर, जिसके लिये यह
कार्तवीर्यं पितृहणं यदर्थं तपसः श्रमः ।<br>ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हत्वा क्षत्रियमण्डलम् ॥ २५ ॥तपस्या करनेका कष्ट उठाया है उस पितृघाती हैहय-श्रेष्ठ कार्तवीर्यका वध करो और फिर इक्कीस बार समस्त क्षत्रियोंको मारकर ॥ २४-२५ ॥
कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वा शान्तिमुपावह ।<br>त्रेतामुखे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥ २६ ॥सम्पूर्ण पृथिवी कश्यपजीको दे शान्ति लाभ करो । मैं अविनाशी परमात्मा त्रेतायुगमें दशरथके यहाँ 'राम' नामसे जन्म दूँगा ।
उत्पत्स्ये परया शक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां ततः ।<br>मत्तेजः पुनरादास्ये त्वयि दत्तं मया पुरा ॥ २७ ॥उस समय मेरी परमशक्ति (सीता) के सहित तुम मुझे देखोगे । तब (पहले) इस समय तुम्हें दिया हुआ अपना तेज मैं फिर ग्रहण कर लूँगा ॥ २६-२७ ॥
तदा तपश्चरंश्छार्कं तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम् ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तथा सर्वं कृतं मया ॥ २८ ॥तबसे तुम तपस्या करते हुए कल्पान्त-पर्यन्त पृथिवीमें रहोगे । ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; और मैंने जैसा उन्होंने कहा था वैसा ही किया ॥ २८ ॥
स एवं विष्णुस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मप्रार्थितः ।<br>मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनराहृतम् ॥ २९ ॥हे राम ! आप वही विष्णु हैं । ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपने जन्म लिया है । आपका जो तेज मुझमें स्थित था वह आज आपने फिर ले लिया ॥ २९ ॥
अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो ।<br>ब्रह्मादिभिरलभ्यस्त्वं प्रकृतेः पारगो मतः ॥ ३० ॥हे प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैंने आपको पहचान लिया क्योंकि आप तो ब्रह्मा आदिसे भी अप्राप्य और प्रकृतिसे भी परे माने गये हैं ॥ ३० ॥
त्वयि जन्मादिषड्भावा न सन्त्यज्ञानसंभवाः।<br>निर्विकारोऽसि पूर्णस्त्वं गमनादिविवर्जितः ॥ ३१ ॥आपमें अज्ञान-जन्य जन्मादि छः भाव-विकार नहीं हैं तथा आप गमनादिसे रहित निर्विकार और पूर्ण हैं ॥ ३१ ॥