अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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३४ अध्यात्मरामायण [सर्ग ७
| नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलमण्डितम् ।<br>धनुःपरशुपाणिं च साक्षात्कालमिवान्तकम् ॥७॥<br>कार्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्दनम् ।<br>प्राप्तं दशरथस्याग्रे कालमृत्युमिवापरम् ॥८॥ | सम्पन्न महाप्रतापी, तेजोराशि, नीलमेघकी-सी आभा-वाले, उन्नतकाय, जटा-जूटधारी हाथमें धनुष और परशु लिये, प्राणियोंका नाश करनेवाले, साक्षात् कालके समान परशुरामजीको आते देखा ॥ ६-७ ॥ उन्होंने देखा कि कार्तवीर्यका वध करनेवाले और गर्वीले क्षत्रियोंका मानमर्दन करनेवाले परशुरामजी जो दूसरे यमराजके समान हैं, महाराज दशरथके पास खड़े हैं ॥८॥ |
| तं दृष्ट्वा भयसन्त्रस्तो राजा दशरथस्तदा ।<br>अर्घ्यादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥९॥<br>दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणं प्रयच्छ मे । | उस समय महाराज दशरथ उन्हें देखते ही भयभीत हो गये और अर्ध्यादिसे उनकी पूजा करना भूलकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'—ऐसा कहकर पुकारने लगे ॥९॥ और दण्डवत् प्रणाम करके बोले—'मुझे पुत्रके प्राणोंका दान दीजिये।' |
| इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥१०॥<br>उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रचलितेन्द्रियः ।<br>त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ॥११॥<br>द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ।<br>पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥१२॥<br>अस्मिंस्तु वैष्णवे चाप आरोपयसि चेद् गुणम् ।<br>तदा युद्धं त्वया सार्धं करोमि रघुकुलध्वज ॥१३॥<br>नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरोह्यहम् ।<br>इति ब्रुवति वै तस्मिंश्चचाल वसुधा भृशम् ॥१४॥<br>अन्धकारो बभूवाथ सर्वेषामपि चक्षुषाम् । | इस प्रकार प्रार्थना करते हुए राजाकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर उन्होंने क्रोधसे व्याकुल हो कठोर वाणीसे रघूत्तम श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"अरे क्षत्रियाधम ! तू मेरे ही समान 'राम' नामसे विख्यात होकर पृथिवीमें विचरता है ॥१०-११॥ सो यदि तू वास्तवमें क्षत्रिय है तो मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध कर; एक पुराने जीर्ण-शीर्ण धनुषको तोड़कर व्यर्थ ही अपनी प्रशंसा कर रहा है ? ॥१२॥ अरे रघुकुलोत्पन्न ! यदि तू इस वैष्णव धनुषपर रोदा चढ़ा देगा तो मैं तेरे साथ युद्ध करूँगा ॥ १३ ॥ नहीं तो, मैं अभी सबको मार डालूँगा क्योंकि क्षत्रियोंका अन्त करना तो मेरा काम ही है।" परशुरामजीके ऐसा कहनेपर पृथिवी बारम्बार काँपने लगी ॥ १४ ॥ और सबके नेत्रोंके सामने अन्धकार छा गया। |
| रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥१५॥<br>धनुराच्छिद्य तद्धस्तादारोप्य गुणमञ्जसा ।<br>तूणीराद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥१६॥<br>उवाच भार्गवं रामं शृणु ब्रह्मन्वचो मम ।<br>लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो मम सायकः ॥१७॥<br>लोकान्पादयुगं वापि वद शीघ्रं ममाज्ञया ।<br>अयं लोकः परो वाथ त्वया गन्तुं न शक्यते ॥१८॥ | तब दशरथ-नन्दन वीरवर रामने परशुरामजीकी ओर रोषपूर्वक देखते हुए उनके हाथसे धनुष छीन लिया और उसपर अनायास ही रोदा चढ़ाकर अपने तरकशसे बाण निकालकर उसपर रक्खा और उसे खींचकर भृगुनन्दन परशुरामजीसे कहा—"ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनो, मेरा बाण अमोघ है—यह व्यर्थ नहीं जाता। इसके लिये शीघ्र ही लक्ष्य दिखाओ ॥ १५-१७ ॥ (अपने पुण्यसे जीते हुए) लोक अथवा अपने चरण—इन दोनोंमेंसे मेरी आज्ञासे शीघ्र ही किसी एकको बताओ। (उसीको इस बाणसे वेध डालूँगा) अब तुम इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं जा सकते ॥१८॥ |