भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७] बालकाण्ड ३३


दिव्याम्बराणि हारांश्च मुक्तारत्नमयोज्ज्वलान् ।
सीतायै जनकः प्रादात्प्रीत्या दुहितृवत्सलः ॥७८॥
वसिष्ठादीन्सुसंपूज्य भरतं लक्ष्मणं तथा ।
पूजयित्वा यथान्यायं तथा दशरथं नृपम् ॥७९॥
प्रस्थापयामास नृपो राजानं रघुसत्तमम् ।
सीतामालिङ्ग्य रुदतीं मातरः साश्रुलोचनाः॥८०॥
श्वश्रूशुश्रूषणपरा नित्यं राममनुव्रता ।
पातिव्रत्यमुपालम्ब्य तिष्ठ वत्से यथासुखम् ॥८१॥
प्रयाणकाले रघुनन्दनस्य
भेरीमृदङ्गानकतूर्यघोषः ।
खर्वासिभेरीघनतूर्यशब्दैः
संमूर्च्छितो भूतभयङ्करोऽभूत् ॥८२॥

तथा सीताजीको भी पुत्रीवत्सल जनकजीने अनेकों दिव्य वस्त्र तथा मोती और रत्न-जटित उज्ज्वल हार दिये ॥७८॥ तदनन्तर उन्होंने वसिष्ठादिकी पूजा की फिर भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और राजा दशरथका धन-दानादिसे यथोचित सत्कार कर रघुश्रेष्ठ महाराज दशरथको विदा किया। फिर माताओंने रोती हुई सीताको गले लगा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—॥७९-८०॥ “वत्से ! तुम सासुकी सेवा करती हुई सदा रामचन्द्रजीकी अनुगामिनी रह पातिव्रत-धर्मका अवलम्बन कर सुखपूर्वक रहना” ॥८१॥ तदनन्तर रघुकुलतिलक श्रीरघुनाथजीके कूच करते समय भेरी, मृदङ्ग, आनक और तूर्य आदि बाजोंका घोष आकाशमें देवताओंके बजाये हुए भेरी और तूर्य आदिके घनघोर शब्दसे मिलकर प्राणियोंको भय उपजानेवाला हुआ ॥८२॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥६॥


सप्तम सर्ग

परशुरामजीसे भेंट

सूत उवाच
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् ।
निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव ।
निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥२॥

वसिष्ठस्तमथ प्राह भयमागामि सूच्यते ।
पुनरप्यभयं तेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३॥
मृगाः प्रदक्षिणं यान्ति पश्य त्वां शुभसूचकाः ।
इत्येवं वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्दयन् ।
ततो व्रजन्ददर्शाग्रे तेजोराशिमुपस्थितम् ॥५॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् ।
तेजोराशिं ददर्शाथ जामदग्न्यं प्रतापवान् ॥६॥

सूतजी बोले— श्रीरामचन्द्रजीके मिथिलापुरीसे तीन योजन चले जानेपर नृपश्रेष्ठ दशरथजीने अत्यन्त घोर अपशकुन देखे ॥१॥ तब उन्होंने वसिष्ठजीको प्रणाम करके पूछा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या कारण है कि चारों ओर भयङ्कर अपशकुन दिखायी दे रहे हैं?” ॥२॥

वसिष्ठजीने कहा—“इन अपशकुनोंसे किसी आगामी भयकी सूचना होती है, किन्तु (साथ ही यह भी सूचित होता है कि) फिर शीघ्र ही अभय प्राप्त होगा ॥३॥ क्योंकि देखो तुम्हारी दायीं ओर शुभ-सूचक मृगगण जा रहे हैं।" वसिष्ठजीके ऐसा कहते ही बड़ा प्रचण्ड वायु चलने लगा ॥४॥ उसने धूलि बरसाकर सबके नेत्रोंको मूँद दिया। इसी अवस्थामें उन्होंने आगे बढ़कर देखा कि वहाँ मानों एक तेजःपुञ्ज उपस्थित हुआ है ॥५॥ फिर उन्होंने करोड़ों सूर्योंके समान तेजखी, विद्युत्-पुञ्जके समान प्रभा-