भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

३२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६

जातो राम इति ख्यातो मायामानुषवेषधृक्। आस्ते दाशरथिर्भूत्वा चतुर्धा परमेश्वरः ॥६४॥ योगमायाऽपि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि। अतस्त्वं राघवायैव देहि सीतां प्रयत्नतः ॥६५॥ नान्येभ्यः पूर्वभार्यैषा रामस्य परमात्मनः। इत्युक्त्वा प्रययौ देवगतिं देवमुनिस्तदा ॥६६॥ तदारभ्य मया सीता विष्णोर्लक्ष्मीर्विभाव्यते। कथं मया राघवाय दीयते जानकी शुभा ॥६७॥ इति चिन्तासमाविष्टः कार्यमेकमचिन्तयम्। मत्पितामहगेहे तु न्यासभूतमिदं धनुः ॥६८॥ ईश्वरेण पुरा क्षिप्तं पुरदाहादनन्तरम्। धनुरेतत्पणं कार्यमिति चिन्त्य कृतं तथा ॥६९॥ सीतापाणिग्रहार्थाय सर्वेषां माननाशनम्। त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ रामो राजीवलोचनः ॥७०॥ आगतोऽत्र धनुर्द्रष्टुं फलितो मे मनोरथः। अद्य मे सफलं जन्म राम त्वां सह सीतया ॥७१॥ एकासनस्थं पश्यामि भ्राजमानं रविं यथा। त्वत्पादाम्बुधरो ब्रह्मा सृष्टिचक्रप्रवर्तकः ॥७२॥ बलिस्त्वत्पादसलिलं धृत्वाऽभूद्दिविजाधिपः। त्वत्पादपांसुसंस्पर्शादहल्या भर्तृशापतः ॥७३॥ सद्य एव विनिर्मुक्ता कोऽन्यस्त्वत्तोऽधिरक्षिता॥७४॥ यत्पादपङ्कजपरागसुरागयोगि- वृन्दैर्जितं भवभयं जितकालचक्रैः। यन्नामकीर्तनपरा जितदुःखशोका देवास्तमेव शरणं सततं प्रपद्ये ॥७५॥ इति स्तुत्वा नृपः प्रादाद्राघवाय महात्मने। दीनाराणां कोटिशतं रथानामयुतं तदा ॥७६॥ अश्वानां नियुतं प्रादाद्गजानां षट्शतं तथा। पत्तीनां लक्षमेकं तु दासीनां त्रिशतं ददौ ॥७७॥


करनेके लिये माया-मानवरूपसे अवतीर्ण होकर 'राम' नामसे विख्यात हुए हैं। वे परमेश्वर अपने चार अंशोंसे दशरथके पुत्र होकर अयोध्यामें रहते हैं ॥६३-६४॥ और इधर योगमायाने तुम्हारे यहाँ सीताके रूपसे जन्म लिया है। अतः तुम प्रयत्नपूर्वक इस सीताका पाणिग्रहण रघुनाथजीके साथ ही करना और किसीसे नहीं—क्योंकि यह पहलेसे ही परमात्मा रामकी ही भार्या है।" ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी आकाश-मार्गसे चले गये ॥६५-६६॥ तबसे इस सीताको मैं विष्णु भगवान्‌की भार्या लक्ष्मी ही समझता हूँ। फिर यह सोचते हुए कि 'शुभलक्षणा जानकी- को किस प्रकार रघुनाथजीको दूँ' मैंने एक युक्ति विचारी। पूर्वकालमें श्रीमहादेवजीने त्रिपुरासुरको भस्म करनेके अनन्तर यह धनुष मेरे दादाके यहाँ धरोहरके रूपमें रक्खा था। मैंने यह सोचकर कि 'सीताके पाणि- ग्रहणके लिये सबके गर्वनाशक इस धनुषको ही पण (बाजी) बनाना चाहिये' वैसा ही किया। हे मुनिश्रेष्ठ आपकी कृपासे यहाँ कमलनयन रामजी धनुष देखने आ गये; इससे मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया। हे राम ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैं सूर्यके समान देदीप्यमान और सीताके साथ एक आसनपर विराजमान आपको देख रहा हूँ। प्रभो ! आपके चरणोदकको सिरपर धारण करके ही ब्रह्माजी सृष्टि-चक्रके प्रवर्तक हुए हैं ॥६७-७२॥ आपके चरणोदकके प्रतापसे बलिको इन्द्र-पद प्राप्त हुआ है और आपकी ही चरण-धूलिके स्पर्शसे अहल्या तुरन्त पतिके शापसे मुक्त हो गयी। आपसे बढ़कर हमारा रक्षक और कौन है ? ॥७३-७४॥ जिनके चरण-कमल-परागके रसिक, काल-चक्रको जीतनेवाले योगीजनोंने संसार-भयको भी जीत लिया है तथा जिनके नाम-कीर्तनमें लगे रहकर देवगण दुःख और शोकको जीत लेते हैं, उन आपकी मैं निरन्तर शरण ग्रहण करता हूँ" ॥७५॥

महात्मा रघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुतिकर महाराज जनकने उन्हें दहेजमें सौ करोड़ दीनार (सुवर्णमुद्रा), दश हजार रथ, दश हजार घोड़े, छः सौ हाथी, एक लाख पदाति और तीन सौ दासियाँ दीं ॥७६-७७॥