भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] बालकाण्ड ३१


स्थापयित्वा स तत्राग्निं ज्वालयित्वा यथाविधि।
सीतामानीय शोभाढ्यां नानारत्नविभूषिताम् ॥५०॥
सभार्यो जनकः प्रायाद्रामं राजीवलोचनम् ।
पादौ प्रक्षाल्य विधिवत्तदपो मूर्द्धन्यधारयत् ॥५१॥
या धृता मूर्ध्नि शर्वेण ब्रह्मणा मुनिभिः सदा ।
ततः सीतां करे धृत्वा साक्षतोदकपूर्वकम् ॥५२॥
रामाय प्रददौ प्रीत्या पाणिग्रहविधानतः ।
सीता कमलपत्राक्षी स्वर्णमुक्तादिभूषिता ॥५३॥
दीयते मे सुता तुभ्यं प्रीतो भव रघूत्तम ।
इति प्रीतेन मनसा सीतां रामकरेऽर्पयन् ॥५४॥
मुमोद जनको लक्ष्मीं क्षीराब्धिरिव विष्णवे ।
ऊर्मिलां चौरसीं कन्यां लक्ष्मणाय ददौ मुदा ॥५५॥
तथैव श्रुतकीर्तिं च माण्डवीं भ्रातृकन्यके ।
भरताय ददावेकां शत्रुघ्नायापरां ददौ ॥५६॥
चत्वारो दारसम्पन्ना भ्रातरः शुभलक्षणाः ।
विरेजुः प्रभया सर्वे लोकपाला इवापरे ॥५७॥

ततोऽब्रवीद्वसिष्ठाय विश्वामित्राय मैथिलः ।
जनकः स्वसुतोदन्तं नारदेनाभिभाषितम् ॥५८॥
यज्ञभूमिविशुद्धयर्थं कर्षतो लाङ्गलेन मे ।
सीतामुखात्समुत्पन्ना कन्यका शुभलक्षणा ॥५९॥
तामद्राक्षमहं प्रीत्या पुत्रिकाभावभाविताम् ।
अर्पिता प्रियभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥६०॥
एकदा नारदोऽभ्यागाद्विविक्ते मयि संस्थिते।
रणयन्महतीं वीणां गायन्नारायणं विभुम् ॥६१॥
पूजितः सुखमासीनो मामुवाच सुखान्वितः ।
शृणुष्व वचनं गुह्यं तवाभ्युदयकारणम् ॥६२॥
परमात्मा हृषीकेशो भक्तानुग्रहकाम्यया ।
देवकार्यार्थसिद्धयर्थं रावणस्य वधाय च ॥६३॥


बैठा दिया। फिर वहाँ विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित की गयी तथा नाना-रत्न-विभूषिता सीताको साथ लेकर महारानीसहित महाराज जनकजी कमलनयन रामजीके पास आये और विधि-पूर्वक उनके चरण धोकर अपने शिरपर चरणोदक रक्खा ॥४९-५१॥ जिसे शिव, ब्रह्मा और अन्यान्य मुनिजन भी सदा अपने मस्तकपर धारण करते हैं। फिर सीताजीका हाथ पकड़कर उसे जल और चावल-सहित पाणिग्रहणकी विधिसे प्रीतिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें दे दिया और कहा—"हे रघूश्रेष्ठ! मैं सुवर्ण और मुक्ता आदिसे विभूषिता अपनी पुत्री कमल-लोचना सीता आपको सौंपता हूँ, आप प्रसन्न होइये।" इस प्रकार सीताजीको प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें सौंपकर जनकजी ऐसे आनन्दमग्न हो गये जैसे क्षीरसागर श्रीविष्णु भगवान्‌के करकमलोंमें लक्ष्मीको सौंपकर हुआ था। फिर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी औरसी कन्या उर्मिला लक्ष्मणजीको विवाह दी ॥५२–५५॥ तथा अपने भाईकी पुत्रियाँ माण्डवी और श्रुतकीर्ति क्रमशः भरत और शत्रुघ्नको दीं ॥५६॥ इस प्रकार सुलक्षणसम्पन्न चारों भाई पत्नियोंके सहित साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अपने प्रकाशसे सुशोभित हुए ॥५७॥

तदनन्तर, मिथिलापति महाराज जनकने, पुत्री जानकीके विषयमें देवर्षि नारदने जो कुछ कहा था वह सब वृत्तान्त वसिष्ठ और विश्वामित्रजीको सुनाया ॥५८॥ वे बोले—"एक बार मैं यज्ञभूमिकी शुद्धिके लिये हल जोत रहा था, उसी समय मेरे हलके सीता (अग्रभाग) से यह शुभलक्षणा कन्या प्रकट हुई ॥५९॥ उस समय मैंने इसे देखा और इसमें मुझे पुत्रीवत् प्रीति हुई, इसलिये मैंने इस चन्द्रमुखीको अपनी प्रिय-पत्नीको सौंप दिया ॥६०॥ एक दिन जब मैं एकान्तमें बैठा हुआ था मेरे पास महर्षि नारदजी अपनी महती नामकी वीणा बजाते और सर्वव्यापक श्रीहरिका गुण गाते हुए आये ॥६१॥ मेरे पूजा-सत्कारादि कर चुकनेपर वे सुखपूर्वक बैठकर मुझसे बोले, 'राजन् ! अपने कल्याणका कारणरूप यह परम गुह्य वचन सुनो—॥६२॥ 'परमात्मा हृषीकेश भक्तोंपर कृपा, देवताओंकी कार्य-सिद्धि और रावणका वध