अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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मिथिलागमनार्थाय त्वरयामास मन्त्रिणः।
गच्छन्तु मिथिलां सर्वे गजाश्वरथपत्तयः ॥३६॥
रथमानय मे शीघ्रं गच्छाम्यद्यैव मा चिरम्।
वसिष्ठस्त्वग्रतो यातु सदारः सहितोऽग्निभिः॥३७॥
राममातृः समादाय मुनिर्मे भगवान् गुरुः।
एवं प्रस्थाप्य सकलं राजर्षिर्विपुलं रथम् ॥३८॥
महत्या सेनया सार्धमारुह्य त्वरितो ययौ।
आगतं राघवं श्रुत्वा राजा हर्षसमाकुलः ॥३९॥
प्रत्युज्जगाम जनकः शतानन्दपुरोधसा।
यथोक्तपूजया पूज्यं पूजयामास सत्कृतम् ॥४०॥
रामस्तु लक्ष्मणेनाशु ववन्दे चरणौ पितुः।
ततो हृष्टो दशरथो रामं वचनमब्रवीत् ॥४१॥
दिष्ट्या पश्यामि ते राम मुखं फुल्लाम्बुजोपमम्।
मुनेरनुग्रहात्सर्वं सम्पन्नं मम शोभनम् ॥४२॥
इत्युक्त्वाऽऽघ्राय मूर्धानमालिङ्ग्य च पुनः पुनः।
हर्षेण महताऽऽविष्टो ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥४३॥
ततो जनकराजेन मन्दिरे सन्निवेशितः।
शोभने सर्वभोगाढ्ये सदारः ससुतः सुखी ॥४४॥
ततः शुभे दिने लग्ने सुमुहूर्ते रघूत्तमम्।
आनयामास धर्मज्ञो रामं सभ्रातृकं तदा ॥४५॥
रत्नस्तम्भसुविस्तारे सुविताने सुतोरणे।
मण्डपे सर्वशोभाढ्ये मुक्तापुष्पफलान्विते ॥४६॥
वेदविद्भिः सुसम्बाधे ब्राह्मणैः स्वर्णभूषितैः।
सुवासनीभिः परितो निष्ककण्ठीभिरावृते ॥४७॥
भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतनृत्यैः समाकुले।
दिव्यरत्नान्विते स्वर्णपीठे रामं न्यवेशयत् ॥४८॥
वसिष्ठं कौशिकं चैव शतानन्दः पुरोहितः।
यथाक्रमं पूजयित्वा रामस्योभयपार्श्वयोः ॥४९॥
फिर अपने मिथिलापुरीको चलनेके लिये शीघ्रता करते हुए मन्त्रियोंसे कहा—"हाथी, घोड़े, रथ और पदातियोंके सहित सब लोग मिथिलापुरीको चलो ॥३६॥ मेरा रथ भी तुरन्त ले आओ, देरी न करो, मैं भी आज ही चलूँगा। अग्नियोंके सहित मेरे गुरु मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी रामकी माताओंको लेकर सबसे आगे चलें।" इस प्रकार सबका कूच करा एक विशाल रथपर आरूढ़ हो राजर्षि दशरथजी बड़े दल-बलके सहित शीघ्रतापूर्वक मिथिलापुरीको चले। रघुकुल-तिलक दशरथजीको आये हुए सुन महाराज जनक हर्ष-पूर्वक पुरोहित शतानन्दजीको ले उन्हें लेने गये और उन पूजनीय राजाका यथोचित रीतिसे सत्कार कर पूजन किया ॥३७—४०॥ तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया; तब राजा दशरथने प्रसन्न होकर रामसे कहा—॥४१॥ "राम आज बड़े भाग्यसे मैं तुम्हारा विकसित कमलके समान मुख देख रहा हूँ; मुनिवरके अनुग्रहसे सब प्रकार मेरा कल्याण ही हुआ" ॥४२॥ ऐसा कह वे उन्हें पुनः पुनः हृदयसे लगा और उनका मस्तक सूँघ अत्यन्त हर्षसे मानों ब्रह्मानन्दमें डूब गये ॥४३॥ तदनन्तर महाराज जनकने उन्हें रानियों और राजकुमारोंके सहित समस्त भोग-सामग्रियोंसे पूर्ण एक परम सुन्दर महलमें सुख-पूर्वक ठहराया ॥४४॥
फिर शुभ दिनमें शुभ मुहूर्त और लग्नके समय धर्मज्ञ जनकजीने भाइयोंसहित रामको बुलाया ॥४५॥ और एक सर्वशोभासम्पन्न विस्तीर्ण मण्डपमें जिसमें रत्नजटित स्तम्भ, सुन्दर वितान, मनोहर मोतियोंकी झालर तथा मोतियोंके पुष्प और फल लगे हुए थे, तथा जो सुवर्ण-भूषण-भूषित वेदपाठी ब्राह्मणोंसे खचाखच भरा हुआ था और सुन्दर वस्त्र धारण किये निष्ककण्ठी (सुहागिन) नारियोंसे समाकुल था, श्रीरामचन्द्रजीको एक दिव्य-रत्न-जटित सुवर्ण-सिंहासनपर बैठाया। उस समय भेरी और दुन्दुभि आदि बाजों तथा नृत्य और गान आदिका बड़ा तुमुल कोलाहल हो रहा था ॥४६—४८॥ तब पुरोहित शतानन्दने श्रीवसिष्ठ और विश्वामित्रजीका क्रमशः पूजनकर उनको रामचन्द्रजीके दोनों ओर