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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
३०अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

मिथिलागमनार्थाय त्वरयामास मन्त्रिणः।
गच्छन्तु मिथिलां सर्वे गजाश्वरथपत्तयः ॥३६॥
रथमानय मे शीघ्रं गच्छाम्यद्यैव मा चिरम्।
वसिष्ठस्त्वग्रतो यातु सदारः सहितोऽग्निभिः॥३७॥
राममातृः समादाय मुनिर्मे भगवान् गुरुः।
एवं प्रस्थाप्य सकलं राजर्षिर्विपुलं रथम् ॥३८॥
महत्या सेनया सार्धमारुह्य त्वरितो ययौ।
आगतं राघवं श्रुत्वा राजा हर्षसमाकुलः ॥३९॥
प्रत्युज्जगाम जनकः शतानन्दपुरोधसा।
यथोक्तपूजया पूज्यं पूजयामास सत्कृतम् ॥४०॥
रामस्तु लक्ष्मणेनाशु ववन्दे चरणौ पितुः।
ततो हृष्टो दशरथो रामं वचनमब्रवीत् ॥४१॥
दिष्ट्या पश्यामि ते राम मुखं फुल्लाम्बुजोपमम्।
मुनेरनुग्रहात्सर्वं सम्पन्नं मम शोभनम् ॥४२॥
इत्युक्त्वाऽऽघ्राय मूर्धानमालिङ्ग्य च पुनः पुनः।
हर्षेण महताऽऽविष्टो ब्रह्मानन्दं गतो यथा ॥४३॥
ततो जनकराजेन मन्दिरे सन्निवेशितः।
शोभने सर्वभोगाढ्ये सदारः ससुतः सुखी ॥४४॥

ततः शुभे दिने लग्ने सुमुहूर्ते रघूत्तमम्।
आनयामास धर्मज्ञो रामं सभ्रातृकं तदा ॥४५॥
रत्नस्तम्भसुविस्तारे सुविताने सुतोरणे।
मण्डपे सर्वशोभाढ्ये मुक्तापुष्पफलान्विते ॥४६॥
वेदविद्भिः सुसम्बाधे ब्राह्मणैः स्वर्णभूषितैः।
सुवासनीभिः परितो निष्ककण्ठीभिरावृते ॥४७॥
भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतनृत्यैः समाकुले।
दिव्यरत्नान्विते स्वर्णपीठे रामं न्यवेशयत् ॥४८॥
वसिष्ठं कौशिकं चैव शतानन्दः पुरोहितः।
यथाक्रमं पूजयित्वा रामस्योभयपार्श्वयोः ॥४९॥


फिर अपने मिथिलापुरीको चलनेके लिये शीघ्रता करते हुए मन्त्रियोंसे कहा—"हाथी, घोड़े, रथ और पदातियोंके सहित सब लोग मिथिलापुरीको चलो ॥३६॥ मेरा रथ भी तुरन्त ले आओ, देरी न करो, मैं भी आज ही चलूँगा। अग्नियोंके सहित मेरे गुरु मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठजी रामकी माताओंको लेकर सबसे आगे चलें।" इस प्रकार सबका कूच करा एक विशाल रथपर आरूढ़ हो राजर्षि दशरथजी बड़े दल-बलके सहित शीघ्रतापूर्वक मिथिलापुरीको चले। रघुकुल-तिलक दशरथजीको आये हुए सुन महाराज जनक हर्ष-पूर्वक पुरोहित शतानन्दजीको ले उन्हें लेने गये और उन पूजनीय राजाका यथोचित रीतिसे सत्कार कर पूजन किया ॥३७—४०॥ तदनन्तर लक्ष्मणके सहित रामजीने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया; तब राजा दशरथने प्रसन्न होकर रामसे कहा—॥४१॥ "राम आज बड़े भाग्यसे मैं तुम्हारा विकसित कमलके समान मुख देख रहा हूँ; मुनिवरके अनुग्रहसे सब प्रकार मेरा कल्याण ही हुआ" ॥४२॥ ऐसा कह वे उन्हें पुनः पुनः हृदयसे लगा और उनका मस्तक सूँघ अत्यन्त हर्षसे मानों ब्रह्मानन्दमें डूब गये ॥४३॥ तदनन्तर महाराज जनकने उन्हें रानियों और राजकुमारोंके सहित समस्त भोग-सामग्रियोंसे पूर्ण एक परम सुन्दर महलमें सुख-पूर्वक ठहराया ॥४४॥

फिर शुभ दिनमें शुभ मुहूर्त और लग्नके समय धर्मज्ञ जनकजीने भाइयोंसहित रामको बुलाया ॥४५॥ और एक सर्वशोभासम्पन्न विस्तीर्ण मण्डपमें जिसमें रत्नजटित स्तम्भ, सुन्दर वितान, मनोहर मोतियोंकी झालर तथा मोतियोंके पुष्प और फल लगे हुए थे, तथा जो सुवर्ण-भूषण-भूषित वेदपाठी ब्राह्मणोंसे खचाखच भरा हुआ था और सुन्दर वस्त्र धारण किये निष्ककण्ठी (सुहागिन) नारियोंसे समाकुल था, श्रीरामचन्द्रजीको एक दिव्य-रत्न-जटित सुवर्ण-सिंहासनपर बैठाया। उस समय भेरी और दुन्दुभि आदि बाजों तथा नृत्य और गान आदिका बड़ा तुमुल कोलाहल हो रहा था ॥४६—४८॥ तब पुरोहित शतानन्दने श्रीवसिष्ठ और विश्वामित्रजीका क्रमशः पूजनकर उनको रामचन्द्रजीके दोनों ओर

सर्ग ६ ] बालकाण्ड ३१


स्थापयित्वा स तत्राग्निं ज्वालयित्वा यथाविधि।
सीतामानीय शोभाढ्यां नानारत्नविभूषिताम् ॥५०॥
सभार्यो जनकः प्रायाद्रामं राजीवलोचनम् ।
पादौ प्रक्षाल्य विधिवत्तदपो मूर्द्धन्यधारयत् ॥५१॥
या धृता मूर्ध्नि शर्वेण ब्रह्मणा मुनिभिः सदा ।
ततः सीतां करे धृत्वा साक्षतोदकपूर्वकम् ॥५२॥
रामाय प्रददौ प्रीत्या पाणिग्रहविधानतः ।
सीता कमलपत्राक्षी स्वर्णमुक्तादिभूषिता ॥५३॥
दीयते मे सुता तुभ्यं प्रीतो भव रघूत्तम ।
इति प्रीतेन मनसा सीतां रामकरेऽर्पयन् ॥५४॥
मुमोद जनको लक्ष्मीं क्षीराब्धिरिव विष्णवे ।
ऊर्मिलां चौरसीं कन्यां लक्ष्मणाय ददौ मुदा ॥५५॥
तथैव श्रुतकीर्तिं च माण्डवीं भ्रातृकन्यके ।
भरताय ददावेकां शत्रुघ्नायापरां ददौ ॥५६॥
चत्वारो दारसम्पन्ना भ्रातरः शुभलक्षणाः ।
विरेजुः प्रभया सर्वे लोकपाला इवापरे ॥५७॥

ततोऽब्रवीद्वसिष्ठाय विश्वामित्राय मैथिलः ।
जनकः स्वसुतोदन्तं नारदेनाभिभाषितम् ॥५८॥
यज्ञभूमिविशुद्धयर्थं कर्षतो लाङ्गलेन मे ।
सीतामुखात्समुत्पन्ना कन्यका शुभलक्षणा ॥५९॥
तामद्राक्षमहं प्रीत्या पुत्रिकाभावभाविताम् ।
अर्पिता प्रियभार्यायै शरच्चन्द्रनिभानना ॥६०॥
एकदा नारदोऽभ्यागाद्विविक्ते मयि संस्थिते।
रणयन्महतीं वीणां गायन्नारायणं विभुम् ॥६१॥
पूजितः सुखमासीनो मामुवाच सुखान्वितः ।
शृणुष्व वचनं गुह्यं तवाभ्युदयकारणम् ॥६२॥
परमात्मा हृषीकेशो भक्तानुग्रहकाम्यया ।
देवकार्यार्थसिद्धयर्थं रावणस्य वधाय च ॥६३॥


बैठा दिया। फिर वहाँ विधिपूर्वक अग्नि प्रज्वलित की गयी तथा नाना-रत्न-विभूषिता सीताको साथ लेकर महारानीसहित महाराज जनकजी कमलनयन रामजीके पास आये और विधि-पूर्वक उनके चरण धोकर अपने शिरपर चरणोदक रक्खा ॥४९-५१॥ जिसे शिव, ब्रह्मा और अन्यान्य मुनिजन भी सदा अपने मस्तकपर धारण करते हैं। फिर सीताजीका हाथ पकड़कर उसे जल और चावल-सहित पाणिग्रहणकी विधिसे प्रीतिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें दे दिया और कहा—"हे रघूश्रेष्ठ! मैं सुवर्ण और मुक्ता आदिसे विभूषिता अपनी पुत्री कमल-लोचना सीता आपको सौंपता हूँ, आप प्रसन्न होइये।" इस प्रकार सीताजीको प्रसन्नतापूर्वक श्रीरामचन्द्रजीके कर-कमलोंमें सौंपकर जनकजी ऐसे आनन्दमग्न हो गये जैसे क्षीरसागर श्रीविष्णु भगवान्‌के करकमलोंमें लक्ष्मीको सौंपकर हुआ था। फिर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी औरसी कन्या उर्मिला लक्ष्मणजीको विवाह दी ॥५२–५५॥ तथा अपने भाईकी पुत्रियाँ माण्डवी और श्रुतकीर्ति क्रमशः भरत और शत्रुघ्नको दीं ॥५६॥ इस प्रकार सुलक्षणसम्पन्न चारों भाई पत्नियोंके सहित साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अपने प्रकाशसे सुशोभित हुए ॥५७॥

तदनन्तर, मिथिलापति महाराज जनकने, पुत्री जानकीके विषयमें देवर्षि नारदने जो कुछ कहा था वह सब वृत्तान्त वसिष्ठ और विश्वामित्रजीको सुनाया ॥५८॥ वे बोले—"एक बार मैं यज्ञभूमिकी शुद्धिके लिये हल जोत रहा था, उसी समय मेरे हलके सीता (अग्रभाग) से यह शुभलक्षणा कन्या प्रकट हुई ॥५९॥ उस समय मैंने इसे देखा और इसमें मुझे पुत्रीवत् प्रीति हुई, इसलिये मैंने इस चन्द्रमुखीको अपनी प्रिय-पत्नीको सौंप दिया ॥६०॥ एक दिन जब मैं एकान्तमें बैठा हुआ था मेरे पास महर्षि नारदजी अपनी महती नामकी वीणा बजाते और सर्वव्यापक श्रीहरिका गुण गाते हुए आये ॥६१॥ मेरे पूजा-सत्कारादि कर चुकनेपर वे सुखपूर्वक बैठकर मुझसे बोले, 'राजन् ! अपने कल्याणका कारणरूप यह परम गुह्य वचन सुनो—॥६२॥ 'परमात्मा हृषीकेश भक्तोंपर कृपा, देवताओंकी कार्य-सिद्धि और रावणका वध

३२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६

जातो राम इति ख्यातो मायामानुषवेषधृक्। आस्ते दाशरथिर्भूत्वा चतुर्धा परमेश्वरः ॥६४॥ योगमायाऽपि सीतेति जाता वै तव वेश्मनि। अतस्त्वं राघवायैव देहि सीतां प्रयत्नतः ॥६५॥ नान्येभ्यः पूर्वभार्यैषा रामस्य परमात्मनः। इत्युक्त्वा प्रययौ देवगतिं देवमुनिस्तदा ॥६६॥ तदारभ्य मया सीता विष्णोर्लक्ष्मीर्विभाव्यते। कथं मया राघवाय दीयते जानकी शुभा ॥६७॥ इति चिन्तासमाविष्टः कार्यमेकमचिन्तयम्। मत्पितामहगेहे तु न्यासभूतमिदं धनुः ॥६८॥ ईश्वरेण पुरा क्षिप्तं पुरदाहादनन्तरम्। धनुरेतत्पणं कार्यमिति चिन्त्य कृतं तथा ॥६९॥ सीतापाणिग्रहार्थाय सर्वेषां माननाशनम्। त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ रामो राजीवलोचनः ॥७०॥ आगतोऽत्र धनुर्द्रष्टुं फलितो मे मनोरथः। अद्य मे सफलं जन्म राम त्वां सह सीतया ॥७१॥ एकासनस्थं पश्यामि भ्राजमानं रविं यथा। त्वत्पादाम्बुधरो ब्रह्मा सृष्टिचक्रप्रवर्तकः ॥७२॥ बलिस्त्वत्पादसलिलं धृत्वाऽभूद्दिविजाधिपः। त्वत्पादपांसुसंस्पर्शादहल्या भर्तृशापतः ॥७३॥ सद्य एव विनिर्मुक्ता कोऽन्यस्त्वत्तोऽधिरक्षिता॥७४॥ यत्पादपङ्कजपरागसुरागयोगि- वृन्दैर्जितं भवभयं जितकालचक्रैः। यन्नामकीर्तनपरा जितदुःखशोका देवास्तमेव शरणं सततं प्रपद्ये ॥७५॥ इति स्तुत्वा नृपः प्रादाद्राघवाय महात्मने। दीनाराणां कोटिशतं रथानामयुतं तदा ॥७६॥ अश्वानां नियुतं प्रादाद्गजानां षट्शतं तथा। पत्तीनां लक्षमेकं तु दासीनां त्रिशतं ददौ ॥७७॥


करनेके लिये माया-मानवरूपसे अवतीर्ण होकर 'राम' नामसे विख्यात हुए हैं। वे परमेश्वर अपने चार अंशोंसे दशरथके पुत्र होकर अयोध्यामें रहते हैं ॥६३-६४॥ और इधर योगमायाने तुम्हारे यहाँ सीताके रूपसे जन्म लिया है। अतः तुम प्रयत्नपूर्वक इस सीताका पाणिग्रहण रघुनाथजीके साथ ही करना और किसीसे नहीं—क्योंकि यह पहलेसे ही परमात्मा रामकी ही भार्या है।" ऐसा कहकर देवर्षि नारदजी आकाश-मार्गसे चले गये ॥६५-६६॥ तबसे इस सीताको मैं विष्णु भगवान्‌की भार्या लक्ष्मी ही समझता हूँ। फिर यह सोचते हुए कि 'शुभलक्षणा जानकी- को किस प्रकार रघुनाथजीको दूँ' मैंने एक युक्ति विचारी। पूर्वकालमें श्रीमहादेवजीने त्रिपुरासुरको भस्म करनेके अनन्तर यह धनुष मेरे दादाके यहाँ धरोहरके रूपमें रक्खा था। मैंने यह सोचकर कि 'सीताके पाणि- ग्रहणके लिये सबके गर्वनाशक इस धनुषको ही पण (बाजी) बनाना चाहिये' वैसा ही किया। हे मुनिश्रेष्ठ आपकी कृपासे यहाँ कमलनयन रामजी धनुष देखने आ गये; इससे मेरा मनोरथ सिद्ध हो गया। हे राम ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैं सूर्यके समान देदीप्यमान और सीताके साथ एक आसनपर विराजमान आपको देख रहा हूँ। प्रभो ! आपके चरणोदकको सिरपर धारण करके ही ब्रह्माजी सृष्टि-चक्रके प्रवर्तक हुए हैं ॥६७-७२॥ आपके चरणोदकके प्रतापसे बलिको इन्द्र-पद प्राप्त हुआ है और आपकी ही चरण-धूलिके स्पर्शसे अहल्या तुरन्त पतिके शापसे मुक्त हो गयी। आपसे बढ़कर हमारा रक्षक और कौन है ? ॥७३-७४॥ जिनके चरण-कमल-परागके रसिक, काल-चक्रको जीतनेवाले योगीजनोंने संसार-भयको भी जीत लिया है तथा जिनके नाम-कीर्तनमें लगे रहकर देवगण दुःख और शोकको जीत लेते हैं, उन आपकी मैं निरन्तर शरण ग्रहण करता हूँ" ॥७५॥

महात्मा रघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुतिकर महाराज जनकने उन्हें दहेजमें सौ करोड़ दीनार (सुवर्णमुद्रा), दश हजार रथ, दश हजार घोड़े, छः सौ हाथी, एक लाख पदाति और तीन सौ दासियाँ दीं ॥७६-७७॥

बालकाण्ड - सर्ग ७: परशुरामजीसे भेंट

सर्ग ७] बालकाण्ड ३३


दिव्याम्बराणि हारांश्च मुक्तारत्नमयोज्ज्वलान् ।
सीतायै जनकः प्रादात्प्रीत्या दुहितृवत्सलः ॥७८॥
वसिष्ठादीन्सुसंपूज्य भरतं लक्ष्मणं तथा ।
पूजयित्वा यथान्यायं तथा दशरथं नृपम् ॥७९॥
प्रस्थापयामास नृपो राजानं रघुसत्तमम् ।
सीतामालिङ्ग्य रुदतीं मातरः साश्रुलोचनाः॥८०॥
श्वश्रूशुश्रूषणपरा नित्यं राममनुव्रता ।
पातिव्रत्यमुपालम्ब्य तिष्ठ वत्से यथासुखम् ॥८१॥
प्रयाणकाले रघुनन्दनस्य
भेरीमृदङ्गानकतूर्यघोषः ।
खर्वासिभेरीघनतूर्यशब्दैः
संमूर्च्छितो भूतभयङ्करोऽभूत् ॥८२॥

तथा सीताजीको भी पुत्रीवत्सल जनकजीने अनेकों दिव्य वस्त्र तथा मोती और रत्न-जटित उज्ज्वल हार दिये ॥७८॥ तदनन्तर उन्होंने वसिष्ठादिकी पूजा की फिर भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और राजा दशरथका धन-दानादिसे यथोचित सत्कार कर रघुश्रेष्ठ महाराज दशरथको विदा किया। फिर माताओंने रोती हुई सीताको गले लगा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—॥७९-८०॥ “वत्से ! तुम सासुकी सेवा करती हुई सदा रामचन्द्रजीकी अनुगामिनी रह पातिव्रत-धर्मका अवलम्बन कर सुखपूर्वक रहना” ॥८१॥ तदनन्तर रघुकुलतिलक श्रीरघुनाथजीके कूच करते समय भेरी, मृदङ्ग, आनक और तूर्य आदि बाजोंका घोष आकाशमें देवताओंके बजाये हुए भेरी और तूर्य आदिके घनघोर शब्दसे मिलकर प्राणियोंको भय उपजानेवाला हुआ ॥८२॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥६॥


सप्तम सर्ग

परशुरामजीसे भेंट

सूत उवाच
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् ।
निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव ।
निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥२॥

वसिष्ठस्तमथ प्राह भयमागामि सूच्यते ।
पुनरप्यभयं तेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३॥
मृगाः प्रदक्षिणं यान्ति पश्य त्वां शुभसूचकाः ।
इत्येवं वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्दयन् ।
ततो व्रजन्ददर्शाग्रे तेजोराशिमुपस्थितम् ॥५॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् ।
तेजोराशिं ददर्शाथ जामदग्न्यं प्रतापवान् ॥६॥

सूतजी बोले— श्रीरामचन्द्रजीके मिथिलापुरीसे तीन योजन चले जानेपर नृपश्रेष्ठ दशरथजीने अत्यन्त घोर अपशकुन देखे ॥१॥ तब उन्होंने वसिष्ठजीको प्रणाम करके पूछा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या कारण है कि चारों ओर भयङ्कर अपशकुन दिखायी दे रहे हैं?” ॥२॥

वसिष्ठजीने कहा—“इन अपशकुनोंसे किसी आगामी भयकी सूचना होती है, किन्तु (साथ ही यह भी सूचित होता है कि) फिर शीघ्र ही अभय प्राप्त होगा ॥३॥ क्योंकि देखो तुम्हारी दायीं ओर शुभ-सूचक मृगगण जा रहे हैं।" वसिष्ठजीके ऐसा कहते ही बड़ा प्रचण्ड वायु चलने लगा ॥४॥ उसने धूलि बरसाकर सबके नेत्रोंको मूँद दिया। इसी अवस्थामें उन्होंने आगे बढ़कर देखा कि वहाँ मानों एक तेजःपुञ्ज उपस्थित हुआ है ॥५॥ फिर उन्होंने करोड़ों सूर्योंके समान तेजखी, विद्युत्-पुञ्जके समान प्रभा-

३४ अध्यात्मरामायण [सर्ग ७


नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलमण्डितम् ।<br>धनुःपरशुपाणिं च साक्षात्कालमिवान्तकम् ॥७॥<br>कार्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्दनम् ।<br>प्राप्तं दशरथस्याग्रे कालमृत्युमिवापरम् ॥८॥सम्पन्न महाप्रतापी, तेजोराशि, नीलमेघकी-सी आभा-वाले, उन्नतकाय, जटा-जूटधारी हाथमें धनुष और परशु लिये, प्राणियोंका नाश करनेवाले, साक्षात् कालके समान परशुरामजीको आते देखा ॥ ६-७ ॥ उन्होंने देखा कि कार्तवीर्यका वध करनेवाले और गर्वीले क्षत्रियोंका मानमर्दन करनेवाले परशुरामजी जो दूसरे यमराजके समान हैं, महाराज दशरथके पास खड़े हैं ॥८॥
तं दृष्ट्वा भयसन्त्रस्तो राजा दशरथस्तदा ।<br>अर्घ्यादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥९॥<br>दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणं प्रयच्छ मे ।उस समय महाराज दशरथ उन्हें देखते ही भयभीत हो गये और अर्ध्यादिसे उनकी पूजा करना भूलकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'—ऐसा कहकर पुकारने लगे ॥९॥ और दण्डवत् प्रणाम करके बोले—'मुझे पुत्रके प्राणोंका दान दीजिये।'
इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥१०॥<br>उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रचलितेन्द्रियः ।<br>त्वं राम इति नाम्ना मे चरसि क्षत्रियाधम ॥११॥<br>द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि वै ।<br>पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥१२॥<br>अस्मिंस्तु वैष्णवे चाप आरोपयसि चेद् गुणम् ।<br>तदा युद्धं त्वया सार्धं करोमि रघुकुलध्वज ॥१३॥<br>नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरोह्यहम् ।<br>इति ब्रुवति वै तस्मिंश्चचाल वसुधा भृशम् ॥१४॥<br>अन्धकारो बभूवाथ सर्वेषामपि चक्षुषाम् ।इस प्रकार प्रार्थना करते हुए राजाकी ओर कुछ भी ध्यान न देकर उन्होंने क्रोधसे व्याकुल हो कठोर वाणीसे रघूत्तम श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"अरे क्षत्रियाधम ! तू मेरे ही समान 'राम' नामसे विख्यात होकर पृथिवीमें विचरता है ॥१०-११॥ सो यदि तू वास्तवमें क्षत्रिय है तो मेरे साथ द्वन्द्वयुद्ध कर; एक पुराने जीर्ण-शीर्ण धनुषको तोड़कर व्यर्थ ही अपनी प्रशंसा कर रहा है ? ॥१२॥ अरे रघुकुलोत्पन्न ! यदि तू इस वैष्णव धनुषपर रोदा चढ़ा देगा तो मैं तेरे साथ युद्ध करूँगा ॥ १३ ॥ नहीं तो, मैं अभी सबको मार डालूँगा क्योंकि क्षत्रियोंका अन्त करना तो मेरा काम ही है।" परशुरामजीके ऐसा कहनेपर पृथिवी बारम्बार काँपने लगी ॥ १४ ॥ और सबके नेत्रोंके सामने अन्धकार छा गया।
रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥१५॥<br>धनुराच्छिद्य तद्धस्तादारोप्य गुणमञ्जसा ।<br>तूणीराद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥१६॥<br>उवाच भार्गवं रामं शृणु ब्रह्मन्वचो मम ।<br>लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो मम सायकः ॥१७॥<br>लोकान्पादयुगं वापि वद शीघ्रं ममाज्ञया ।<br>अयं लोकः परो वाथ त्वया गन्तुं न शक्यते ॥१८॥तब दशरथ-नन्दन वीरवर रामने परशुरामजीकी ओर रोषपूर्वक देखते हुए उनके हाथसे धनुष छीन लिया और उसपर अनायास ही रोदा चढ़ाकर अपने तरकशसे बाण निकालकर उसपर रक्खा और उसे खींचकर भृगुनन्दन परशुरामजीसे कहा—"ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनो, मेरा बाण अमोघ है—यह व्यर्थ नहीं जाता। इसके लिये शीघ्र ही लक्ष्य दिखाओ ॥ १५-१७ ॥ (अपने पुण्यसे जीते हुए) लोक अथवा अपने चरण—इन दोनोंमेंसे मेरी आज्ञासे शीघ्र ही किसी एकको बताओ। (उसीको इस बाणसे वेध डालूँगा) अब तुम इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं जा सकते ॥१८॥

सर्ग ७] बालकाण्ड ३५


संस्कृतहिन्दी
एवं त्वं हि प्रकर्तव्यं वद शीघ्रं ममाज्ञया ।अब तुम्हारे साथ मेरा जो कुछ कर्तव्य है वह तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही बताओ।”
एवं वदति श्रीरामे भार्गवो विकृताननः ॥ १९ ॥<br>संस्मरन्पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥ २० ॥रामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भृगु-नन्दन परशुराम-जीका मुख मलिन हो गया ॥ १९ ॥ फिर उन्होंने पूर्व-वृत्तान्तको स्मरण कर यह कहा—“हे राम ! हे राम ! हे महाबाहो ! मैंने आप परमेश्वरको जान लिया ॥ २० ॥
पुराणपुरुषं विष्णुं जगत्सर्गलयोद्भवम् ।<br>बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमञ्जसा ॥ २१ ॥आप साक्षात् संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण, पुराण-पुरुष भगवान् विष्णु हैं । मैं बाल्यावस्थामें विष्णुभगवान्‌की आराधना करनेके लिये अकस्मात्
चक्रतीर्थं शुभं गत्वा तपसा विष्णुमन्वहम् ।<br>अतोषयं महात्मानं नारायणमनन्यधीः ॥ २२ ॥परम पवित्र चक्रतीर्थमें पहुँचा और वहाँ प्रति-दिन अनन्यभावसे तपस्या करते हुए मैंने परमात्मा नारायण भगवान् विष्णुको प्रसन्न किया ॥ २१-२२ ॥
ततः प्रसन्नो देवेशः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>उवाच मां रघुश्रेष्ठ प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥ २३ ॥हे रघुश्रेष्ठ ! उस समय शङ्ख-चक्र-गदाधारी प्रसन्नवदन देवेश्वर विष्णुने मुझसे प्रसन्न होकर कहा ॥ २३ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन्फलितं ते तपो महत् ।<br>मञ्चिदांशेन युक्तस्त्वं जहि हैहयपुङ्गवम् ॥ २४ ॥**श्रीभगवान् बोले—**हे ब्रह्मन् ! तपस्या छोड़कर खड़े हो, तुम्हारा महान् तप सफल हो गया । तुम मेरे चिदंशसे युक्त होकर, जिसके लिये यह
कार्तवीर्यं पितृहणं यदर्थं तपसः श्रमः ।<br>ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हत्वा क्षत्रियमण्डलम् ॥ २५ ॥तपस्या करनेका कष्ट उठाया है उस पितृघाती हैहय-श्रेष्ठ कार्तवीर्यका वध करो और फिर इक्कीस बार समस्त क्षत्रियोंको मारकर ॥ २४-२५ ॥
कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वा शान्तिमुपावह ।<br>त्रेतामुखे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥ २६ ॥सम्पूर्ण पृथिवी कश्यपजीको दे शान्ति लाभ करो । मैं अविनाशी परमात्मा त्रेतायुगमें दशरथके यहाँ 'राम' नामसे जन्म दूँगा ।
उत्पत्स्ये परया शक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां ततः ।<br>मत्तेजः पुनरादास्ये त्वयि दत्तं मया पुरा ॥ २७ ॥उस समय मेरी परमशक्ति (सीता) के सहित तुम मुझे देखोगे । तब (पहले) इस समय तुम्हें दिया हुआ अपना तेज मैं फिर ग्रहण कर लूँगा ॥ २६-२७ ॥
तदा तपश्चरंश्छार्कं तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम् ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवस्तथा सर्वं कृतं मया ॥ २८ ॥तबसे तुम तपस्या करते हुए कल्पान्त-पर्यन्त पृथिवीमें रहोगे । ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; और मैंने जैसा उन्होंने कहा था वैसा ही किया ॥ २८ ॥
स एवं विष्णुस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मप्रार्थितः ।<br>मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनराहृतम् ॥ २९ ॥हे राम ! आप वही विष्णु हैं । ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपने जन्म लिया है । आपका जो तेज मुझमें स्थित था वह आज आपने फिर ले लिया ॥ २९ ॥
अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो ।<br>ब्रह्मादिभिरलभ्यस्त्वं प्रकृतेः पारगो मतः ॥ ३० ॥हे प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया जो मैंने आपको पहचान लिया क्योंकि आप तो ब्रह्मा आदिसे भी अप्राप्य और प्रकृतिसे भी परे माने गये हैं ॥ ३० ॥
त्वयि जन्मादिषड्भावा न सन्त्यज्ञानसंभवाः।<br>निर्विकारोऽसि पूर्णस्त्वं गमनादिविवर्जितः ॥ ३१ ॥आपमें अज्ञान-जन्य जन्मादि छः भाव-विकार नहीं हैं तथा आप गमनादिसे रहित निर्विकार और पूर्ण हैं ॥ ३१ ॥

३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७


यथा जले फेनजालं धूमो वह्नौ तथा त्वयि ।<br>त्वदाधारा त्वद्विषया माया कार्यं सृजत्यहो ॥३२॥अहो ! जलके फेन-समूह और अग्निके धूँएँके समान आपके आश्रित और आपहीको विषय करनेवाली माया नाना प्रकारके विचित्र कार्योंकी रचना करती है ॥ ३२ ॥
यावन्मायावृता लोकास्तावत्त्वां न विजानते ।<br>अविचारितसिद्धैषाऽविद्या विद्याविरोधिनी ॥३३॥मनुष्य जबतक मायासे आवृत्त रहते हैं तबतक आपको नहीं जान सकते । विद्याकी विरोधिनी यह अविद्या जबतक विचार नहीं किया जाता तभी-तक रहती है ॥ ३३ ॥
अविद्याकृतदेहादिसङ्घाते प्रतिबिम्बिता ।<br>चिच्छक्तिर्जीवलोकेऽस्मिन् जीव इत्यभिधीयते॥३४॥अविद्याजन्य देहादि संघातोंमें प्रतिबिम्बित हुई चित्-शक्ति ही इस जीव-लोकमें 'जीव' कहलाती है ॥ ३४ ॥
यावद्देहमनःप्राणबुद्ध्यादिष्वभिमानवान् ।<br>तावत्कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखदुःखादिभाग्भवेत् ॥३५॥यह जीव जबतक देह, मन, प्राण और बुद्धि आदिमें अभिमान करता है तभीतक कर्तृत्व, भोक्तृत्व और सुख-दुःखादिको भोगता है ॥ ३५ ॥
आत्मनः संसृतिर्नास्ति बुद्धेर्ज्ञानं न जात्विति ।<br>अविवेकाद्द्वयं युङ्क्त्वा संसारीति प्रवर्तते ॥३६॥वास्तवमें आत्मामें जन्म-मरणादि संसार किसी भी अवस्थामें नहीं है और बुद्धिमें कभी ज्ञान-शक्ति नहीं है। अविवेकसे इन दोनोंको मिलाकर जीव 'संसारी हूँ' ऐसा मानकर कर्ममें प्रवृत्त हो जाता है ॥ ३६ ॥
जडस्य चित्समायोगाच्चित्त्वं भूयाच्चितेस्तथा ।<br>जडसङ्गाज्जडत्वं हि जलाग्न्योर्मेलनं यथा ॥३७॥जल और अग्निका मेल होनेसे जैसे जलमें उष्णता और अग्निमें शान्तता उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जड (बुद्धि) का चेतन (आत्मा) से संयोग होनेसे उसमें चेतनता और चेतन आत्मा-का जड-बुद्धिसे संयोग होनेसे उसमें (कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि) जडता प्रकट हो जाती है ॥३७॥
यावत्त्वत्पादभक्तानां सङ्गसौख्यं न विन्दति ।<br>तावत्संसारदुःखौघान्न निवर्तेन्नरः सदा ॥३८॥हे राम ! जबतक मनुष्य आपके चरण-कमलोंके भक्तोंका संगसुख निरन्तर अनुभव नहीं करता तबतक संसारके दुःख-समूहसे पार नहीं होता ॥ ३८ ॥
तत्सङ्गलब्धया भक्त्या यदा त्वां समुपासते ।<br>तदा माया शनैर्याति तानवं प्रतिपद्यते ॥३९॥जब वह भक्तजनों-के सङ्गसे प्राप्त हुई भक्तिद्वारा आपकी उपासना करता है तब आपकी माया शनैः-शनैः चली जाती है और वह क्षीण होने लगती है ॥ ३९ ॥
ततस्त्वज्ज्ञानसम्पन्नः सद्गुरुस्तेन लभ्यते ।<br>वाक्यज्ञानं गुरोर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादाद्विमुच्यते ॥४०॥फिर उस साधकको आपके ज्ञानसे सम्पन्न सद्गुरुकी प्राप्ति होती है और उन सद्गुरुदेवसे महावाक्यका बोध पाकर वह आपकी कृपासे मुक्त हो जाता है ॥ ४० ॥
तस्मात्त्वद्भक्तिहीनानां कल्पकोटिशतैरपि ।<br>न मुक्तिशङ्का विज्ञानशङ्का नैव सुखं तथा ॥४१॥अतः आपकी भक्तिसे शून्य पुरुषोंको सौ करोड़ कल्पोंमें भी मुक्ति अथवा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेकी सम्भावना नहीं है और इसीलिये उन्हें वास्तविक सुख मिलनेकी भी सम्भावना नहीं है ॥ ४१ ॥
अतस्त्वत्पादयुगले भक्तिर्मे जन्मजन्मनि ।<br>स्यात्त्वद्भक्तिमतां सङ्गोऽविद्या याभ्यां विनश्यति ॥अतः मैं यही चाहता हूँ कि जन्म-जन्मान्तरमें आपके चरण-युगलमें मेरी भक्ति हो और मुझे आपके भक्तोंका सङ्ग मिले क्योंकि इन्हीं दोनों साधनोंसे अविद्याका नाश होता है ॥ ४२ ॥
लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वद्धर्मामृतवर्षिणः ।<br>पुनन्ति लोकमखिलं किं पुनः स्वकुलोद्भवान्॥४३॥संसारमें आपकी भक्तिमें तत्पर और भगवद्धर्म-रूप अमृत-की वर्षा करनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण लोकको पवित्र

सर्ग ७] बालकाण्ड ३७


नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ।
नमः कारुणिकानन्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते॥४४॥

देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ।
तत्सर्वं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते ॥४५॥

ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः ।
प्रसन्नोऽस्मि तव ब्रह्मन् यत्ते मनसि वर्तते ॥ ४६॥

दास्ये तदखिलं कामं मा कुरुष्वात्र संशयम् ।
ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् ॥४७॥

यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ।
त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे दृढा भक्तिः सदास्तु मे॥४८॥

स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु भक्तिहीनोऽपि सर्वदा ।
त्वद्भक्तिस्तस्य विज्ञानं भूयादन्ते स्मृतिस्तव॥४९॥

तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ।
पूजितस्तदनुज्ञातो महेन्द्राचलमन्वगात् ॥५०॥

राजा दशरथो हृष्टो रामं मृतमिवागतम् ।
आलिङ्ग्यालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यांजलमुत्सृजत्॥५१॥

ततः प्रीतेन मनसा स्वस्वचित्तः पुरं ययौ ।
रामलक्ष्मणशत्रुघ्नभरता देवसंमिताः ।
स्वां स्वां भार्यामुपादाय रेमिरे स्वस्वमन्दिरे ॥५२॥

मातापितृभ्यां संहृष्टो रामः सीतासमन्वितः ।
रेमे वैकुण्ठभवने श्रिया सह यथा हरिः ॥५३॥

युधाजिन्नाम कैकेयीभ्राता भरतमातुलः ।
भरतं नेतुमागाच्छत्स्वराज्यं प्रीतिसंयुतः ॥५४॥

प्रेषयामास भरतं राजा स्नेहसमन्वितः ।
शत्रुघ्नं चापि संपूज्य युधाजितमरिन्दमः ॥५५॥


कर देते हैं, फिर वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंको पवित्र कर देते हैं, इसमें तो कहना ही क्या है? ॥४३॥ हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है । हे भक्तिभावन ! आपको नमस्कार है । हे करुणामय ! हे अनन्त ! आपको नमस्कार है । हे रामचन्द्र ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे देव ! मैंने पुण्यलोक-प्राप्तिके लिये जो कुछ पुण्य-कर्म किये हैं वे सब आपके इस बाणके लक्ष्य हों । हे राम आपको नमस्कार है" ॥४५॥ तब करुणामय भगवान् श्रीरामचन्द्रने प्रसन्न होकर कहा—"हे ब्रह्मन् ! मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो-जो कामनाएँ हैं उन सभीको मैं पूर्ण करूँगा, इसमें सन्देह न करना ।” तब परशुरामजीने प्रसन्न-चित्त होकर रामसे कहा— ॥ ४६-४७ ॥ "हे मधुसूदन राम ! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो मुझे सदा आपके भक्तोंका संग रहे और आपके चरण-कमलोंमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो ॥ ४८ ॥ तथा कोई भक्तिहीन पुरुष भी यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो उसे सर्वदा आपकी भक्ति मिले और ज्ञान प्राप्त हो तथा अन्तमें आपकी स्मृति रहे" ॥ ४९ ॥

तदनन्तर रघुनाथजीके 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहनेपर परशुरामजीने उनकी परिक्रमा कर उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूजित हो उनकी आज्ञासे महेन्द्र-पर्वतपर चले गये ॥ ५० ॥ राजा दशरथने रामको मानों मृत्युसे लौटे हुए समझ अत्यन्त हर्षसे बारम्बार आलिंगन किया और नेत्रोंसे आनन्दाश्रुओं-की वर्षा करने लगे ॥ ५१ ॥ तदनन्तर वे सब प्रसन्न-चित्तसे अपनी अयोध्यापुरीमें आये । वहाँ पहुँचकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ देवताओंके समान अपने अपने महलोंमें रमण करने लगे ॥ ५२ ॥ सीताके सहित श्रीरामचन्द्रजी अपने माता-पिताओंका आनन्द बढ़ाते हुए इस प्रकार रमण करने लगे जैसे वैकुण्ठ-लोकमें भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ विहार करते हैं ॥ ५३ ॥

इसी समय कैकेयीके भाई भरतजीके मामा युधाजित् भरतको प्रीतिपूर्वक अपने यहाँ ले जानेके लिये आये ॥ ५४ ॥ शत्रुदमन महाराज दशरथने भी युधाजित्‌का सत्कार कर उनके स्नेहवश भरत और शत्रुघ्नको उनके साथ भेज दिया ॥ ५५ ॥

३८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

कौसल्या शुशुभे देवी रामेण सह सीतया ।<br>देवमातेव पौलोम्या शच्या शक्रेण शोभना ॥५६॥<br>साकेते लोकनाथप्रथितगुणगणो-<br>लोकसङ्गीतकीर्तिः<br>श्रीरामो सीतयाऽऽस्तेऽखिलजननिकरा-<br>नन्दसन्दोहमूर्त्तिः ।<br>नित्यश्रीर्निर्विकारो निरवधिविभवो<br>नित्यमायानिरासो<br>मायाकार्यानुसारी मनुज इव सदा<br>भाति देवोऽखिलेशः ॥५७॥ | तदुपरांत देवी कौसल्या राम और सीताके सहित इस प्रकार सुशोभित हुईं जैसे पुलोम-पुत्री शची और इन्द्रके सहित देवमाता अदिति शोभायमान होती हैं ॥ ५६ ॥ जिनके गुणगण ब्रह्मा आदि सकल लोकपालोंमें प्रसिद्ध हैं, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण लोकोंमें गायी जाती है, जो सारे मनुष्योंके आनन्द-समूहकी मूर्ति हैं, जो नित्य, शोभाधाम, निर्विकार, अनन्त-वैभव, और सदा मायातीत होकर भी माया-कार्योंका अनुसरण करते हुए सदा मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं वे अखिलेश्वर भगवान् राम सीताजीके साथ साकेत (अयोध्या) धाममें विराजने लगे ॥ ५७ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


समाप्तमिदं बालकाण्डम्

अयोध्याकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

अयोध्याकाण्ड

श्रुत्वैव यो भूपतिमात्तवाचं वनं गतस्तेन न नोदितोऽपि ।
तं लीलयाऽऽह्लादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

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श्रीसीताराम

कथं मामिच्छसे त्यक्तुं धर्मपत्नीं पतिव्रताम् ॥ ( अ० रा० अयो० ४ । ७१ )

अयोध्याकाण्ड - सर्ग १: भगवान् रामके पास नारदजीका आना

अध्यात्मरामायण

अयोध्याकाण्ड


प्रथम सर्ग

भगवान् रामके पास नारदजीका आना ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले-
एकदा सुखमासीनं रामं स्वान्तःपुराजिरे ।<br>सर्वाभरणसंपन्नं रत्नसिंहासने स्थितम् ॥ १ ॥हे पार्वति ! एक दिन जब सर्वाङ्कारविभूषित श्रीरामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके आँगनमें एक रत्नसिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥ १ ॥
नीलोत्पलदलश्यामं कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।<br>सीतया रत्नदण्डेन चामरेणाथ वीजितम् ॥ २ ॥तथा जिस समय नीलोत्पलदलश्याम कौस्तुभ-मणिमण्डित उन रघुनाथजीपर श्रीसीताजी रत्नदण्ड-युक्त चँवर डुला रही थीं ॥ २ ॥
विनोदयन्तं ताम्बूलचर्वणादिभिरादरात् ।<br>नारदोऽवतरद्द्रष्टुमम्बराद्यत्र राघवः ॥ ३ ॥और वे आदरपूर्वक दिये हुए ताम्बूल-चर्वणादिसे आनन्दित हो रहे थे उसी समय उन्हें देखनेके लिये देवर्षि नारदजी आकाशसे उतरे ॥ ३ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशः शरच्चन्द्र इवामलः ।<br>अतर्कितमुपायातो नारदो दिव्यदर्शनः ॥ ४ ॥<br>तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय रामः प्रीत्या कृताञ्जलिः।<br>ननाम शिरसा भूमौ सीतया सह भक्तिमान् ॥ ५ ॥शुद्ध स्फटिक मणिके समान स्वच्छ और शरच्चन्द्रके समान निर्मल दिव्यमूर्ति श्रीनारदजीको इस प्रकार अचानक आते देख शक्तिशाली भगवान् राम सहसा उठ खड़े हुए और सीताजीके सहित प्रेम और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥
उवाच नारदं रामः प्रीत्या परमया युतः ।<br>संसारिणां मुनिश्रेष्ठ दुर्लभं तव दर्शनम् ।<br>अस्माकं विषयासक्तचेतसां नितरां मुने ॥ ६ ॥<br>अवाप्तं मे पूर्वजन्मकृतपुण्यमहोदयैः ।<br>संसारिणापि हि मुने लभ्यते सत्समागमः ॥ ७ ॥फिर भगवान् रामने परम प्रीतिपूर्वक नारदजीसे कहा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! हम-जैसे विषयासक्त संसारी मनुष्योंके लिये आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है । हे मुने ! आज अपने पूर्वजन्म-कृत पुण्य-पुञ्जके उदय होनेसे ही मुझे आपका दर्शन हुआ है, क्योंकि हे मुने ! पुण्योदय होनेपर संसारी पुरुषको भी सत्संग प्राप्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥
अतस्त्वद्दर्शनादेव कृतार्थोऽस्मि मुनीश्वर ।<br>किं कार्यं ते मया कार्यं ब्रूहि तत्करवाणि भोः॥ ८ ॥अतः हे मुनीश्वर ! आज आपके दर्शनसे ही मैं कृतार्थ हो गया, अब मुझे आपका क्या कार्य करना होगा सो कहिये, उसे मैं (इस समय) पूर्ण करूँ” ॥ ८ ॥

४२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १]


मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अथ तं नारदोऽप्याह राघवं भक्तवत्सलम् ।<br>किं मोहयसि मां राम वाक्यैर्लोकानुसारिभिः ॥९॥<br>संसार्यहमिति प्रोक्तं सत्यमेतत्वया विभो ।<br>जगतामादिभूता या सा माया गृहिणी तव ॥१०॥<br>त्वत्सन्निकर्षाज्जायन्ते तस्यां ब्रह्मादयः प्रजाः ।<br>त्वदाज्ञया सदा भाति माया या त्रिगुणात्मिका ॥११॥<br>सूतेऽजस्रं शुक्लकृष्णलोहिताः सर्वदा प्रजाः ।<br>लोकत्रयमहागेहे गृहस्थस्त्वमुदाहृतः ॥१२॥<br>त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा ।<br>ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥१३॥<br>भवान् शशाङ्कः सीता तु रोहिणी शुभलक्षणा ।<br>शक्रस्त्वमेव पौलोमी सीता स्वाहाऽनलो भवान् ॥<br>यमस्त्वं कालरूपश्च सीता संयमिनी प्रभो ।<br>निर्ऋतिस्त्वं जगन्नाथ तामसी जानकी शुभा ॥१५॥<br>राम त्वमेव वरुणो भार्गवी जानकी शुभा ।<br>वायुस्त्वं राम सीता तु सदागतिरितीरिता ॥१६॥<br>कुबेरस्त्वं राम सीता सर्वसंपत्प्रकीर्तिता ।<br>रुद्राणी जानकी प्रोक्ता रुद्रस्त्वं लोकनाशकृत् ॥१७॥<br>लोके स्त्रीवाचकं यावत्तत्सर्वं जानकी शुभा ।<br>पुन्नामवाचकं यावत्तत्सर्वं त्वं हि राघव ॥१८॥<br>तस्माल्लोकत्रये देव युवाभ्यां नास्ति किञ्चन ॥१९॥<br>त्वदाभासोदिताज्ञानमव्याकृतमितीर्यते ।<br>तस्मान्महांस्ततः सूत्रं लिङ्गं सर्वात्मकं ततः ॥२०॥<br>अहङ्कारश्च बुद्धिश्च पञ्चप्राणेन्द्रियाणि च ।<br>लिङ्गमित्युच्यते प्राज्ञैर्जन्ममृत्युसुखादिमत् ॥२१॥<br>स एव जीवसंज्ञश्च लोके भाति जगन्मयः ।<br>अवाच्यानाद्यविद्यैव कारणोपाधिरुच्यते ॥२२॥तब नारदजीने भक्तवत्सल भगवान् रामसे कहा—"हे राम ! आप सामान्य मनुष्योंके-से इन वाक्योंसे मुझे क्यों मोहित कर रहे हैं ॥९॥ हे विभो ! आपने जो यह कहा कि 'मैं संसारी हूँ' सो ठीक ही है, क्योंकि सम्पूर्ण संसारकी जो आदि-कारण है वह माया आपकी गृहिणी है ॥१०॥ हे प्रभो ! आपकी सन्निधिमात्रसे ही उस मायासे ब्रह्मा आदि सब प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं, वह सत्त्व-रज-तमोमयी त्रिगुणात्मिका माया सदा आपके आश्रित होकर ही भानमान होती है तथा स्वगुणानुरूप शुक्ल, लोहित और कृष्णवर्ण प्रजा उत्पन्न करती है। इस त्रिलोकी-रूप महागृहके आप गृहस्थ कहे गये हैं ॥११-१२॥ आप भगवान् विष्णु हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं; आप शिव हैं और जानकीजी पार्वती हैं; आप ब्रह्मा हैं और जानकीजी सरस्वती हैं तथा आप सूर्यदेव हैं और जानकीजी प्रभा हैं ॥१३॥ आप चन्द्रमा हैं, शुभलक्षणा सीताजी रोहिणी हैं; आप इन्द्र हैं और सीता पुलोम-कन्या शची हैं तथा आप अग्नि हैं और सीताजी स्वाहा हैं ॥१४॥ हे प्रभो ! आप सबके कालरूप यम हैं और सीता संयमिनी हैं, हे जगन्नाथ ! आप निरृति हैं और जानकीजी तामसी हैं ॥१५॥ हे राम ! आप वरुण हैं और शुभलक्षणा जानकी भृगु-कन्या वारुणी हैं, आप वायु हैं तथा सीताजी सदागति हैं ॥१६॥ हे राम ! आप कुबेर हैं और सीताजी उनकी सब सम्पत्ति हैं तथा आप लोकसंहारकारी रुद्र हैं और सीताजी रुद्राणी कहलाती हैं ॥१७॥ हे राघव ! निःसन्देह संसारमें जो कुछ पुरुषवाचक है वह सब आप हैं और स्त्रीवाचक सब श्रीजानकीजी हैं; अतः हे देव ! त्रिलोकीमें आप दोनोंसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥१८-१९॥ आपहीके आभाससे प्रकट हुआ अज्ञान अव्याकृत कहलाता है, उससे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे सूत्रात्मा (हिरण्यगर्भ) और सूत्रात्मासे सर्वात्मक लिंगदेह उत्पन्न होता है ॥२०॥ अहंकार बुद्धि, पञ्चप्राण और दश इन्द्रियाँ—इनके समूहको ही प्राज्ञजन जन्म, मृत्यु और सुख-दुःखादि धर्मों-वाला लिङ्गदेह बताते हैं ॥२१॥ वह (लिंग-देहाभिमानी चेतनाभास) ही जगत्में तन्मय हुआ जीव नामसे विख्यात है। अनिर्वचनीय और अनादि

सर्ग १ ] अयोध्याकाण्ड ४३


स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमुपाधित्रितयं चितेः ।
एतैर्विशिष्टो जीवः स्याद्वियुक्तः परमेश्वरः ॥ २३॥

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या संसृतिर्या प्रवर्तते ।
तस्या विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रस्त्वं रघूत्तम ॥ २४॥

त्वत्त एव जगज्जातं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
त्वय्येव लीयते कृत्स्नं तस्मात्त्वं सर्वकारणम् ॥ २५॥

रज्जावहिमिवात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं भवेत् ।
परात्माहमिति ज्ञात्वा भयदुःखैर्विमुच्यते ॥ २६॥

चिन्मात्रज्योतिषा सर्वाः सर्वदेहेषु बुद्धयः ।
त्वया यस्मात्प्रकाशन्ते सर्वस्यात्मा ततो भवान् ॥

अज्ञानानन्यस्यते सर्वं त्वयि रज्जौ भुजङ्गवत् ।
त्वज्ज्ञानाल्लीयंते सर्वं तस्माज्ज्ञानं सदाम्यसेत् ॥ २८॥

त्वत्पादभक्तियुक्तानां विज्ञानं भवति क्रमात् ।
तस्मात्त्वद्भक्तियुक्ता ये मुक्तिभाजस्त एव हि ॥ २९॥

अहं त्वद्भक्तभक्तानां तद्भक्तानां च किङ्करः ।
अतो मामनुगृह्णीष्व मोहयस्व न मां प्रभो ॥ ३०॥

त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा मे जनकः प्रभो ।
अतस्तवाहं पौत्रोऽस्मि भक्तं मां पाहि राघव ॥ ३१॥

इत्युक्त्वा बहुशो नत्वा स्वानन्दाश्रुपरिप्लुतः ।
उवाच वचनं राम ब्रह्मणा नोदितोऽस्म्यहम् ॥ ३२॥

रावणस्य वधार्थाय जातोऽसि रघूसत्तम ।
इदानीं राज्यरक्षार्थं पिता त्वामभिषेक्ष्यति ॥ ३३।

यदि राज्याभिसंसक्तो रावणं न हनिष्यसि ।
प्रतिज्ञा ते कृता राम भूभारहरणाय वै ॥ ३४॥

तत्सत्यं कुरु राजेन्द्र सत्यसंधस्त्वमेव हि ।

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अविद्या ही (इस जीवकी) कारणउपाधि कही जाती है ॥ २२ ॥ शुद्ध चेतनकी स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन उपाधियाँ हैं । इन उपाधियोंसे युक्त होनेसे वह जीव कहलाता है और इससे रहित होनेसे परमेश्वर कहा जाता है ॥ २३ ॥ हे रघूश्रेष्ठ ! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-ऐसी जो तीन प्रकारकी सृष्टि है उससे आप विलक्षण हैं और उसके चेतनमात्र साक्षी हैं ॥ २४॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है, आपहीमें स्थित है और आपहीमें लीन होता है । इसलिये आप ही सबके कारण हैं ॥ २५ ॥ रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान अपनेको जीव माननेसे मनुष्यको भय होता है पर वही जब यह समझ लेता है कि 'मैं परमात्मा हूँ' तो सम्पूर्ण भय और दुःखोंसे छूट जाता है ॥ २६ ॥ क्योंकि चिन्मात्र ज्योतिस्वरूप आप ही सबके शरीरोंमें स्थित होकर उनकी बुद्धियोंको प्रकाशित कर रहे हैं इसलिये आप ही सबके आत्मा हैं ॥२७॥ रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान अज्ञानसे ही आपमें सम्पूर्ण जगत्की कल्पना की जाती है सो आपका ज्ञान होनेसे वह सब लीन हो जाती है । सुतरां मनुष्यको सदा ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये ॥२८॥ आपके चरणकमलोंकी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही क्रमशः ज्ञानकी प्राप्ति होती है, अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे युक्त हैं वे ही वास्तवमें मुक्तिके पात्र हैं ॥ २९॥ हे प्रभो ! मैं आपके भक्तोंके भक्त और उनके भी भक्तोंका दास हूँ; अतः आप मुझे मोहित न कर मुझपर अनुग्रह कीजिये ॥३०॥ हे प्रभो ! आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजी मेरे पिता हैं, अतः मैं आपका पौत्र हूँ ! हे राघव ! आप मुझ भक्तकी रक्षा कीजिये' ॥३१॥

इस प्रकार कहकर और बारम्बार प्रणाम कर श्रीनारदजीने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरकर कहा—"हे रघूश्रेष्ठ ! मुझे ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है; आपका अवतार रावणका वध करनेके लिये हुआ है, किन्तु अब पिता दशरथ आपको राज्यशासनके लिये अभिषिक्त करनेवाले हैं ॥ ३२-३३॥ हे राम ! यदि राज्याभिषिक्त हो जानेपर आप रावणको न मारेंगे तो पृथिवीका भार उतारनेके लिये जो आपने प्रतिज्ञा की थी उसका क्या होगा ? ॥३४॥ अतः हे राजेन्द्र ! आप उसे सत्य कीजिये क्योंकि आप सत्य-प्रतिज्ञ ही हैं।"

अयोध्याकाण्ड - सर्ग २: राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद

४४ अध्यात्मरामायण [ सर्गः २


श्रुत्वैतद्गदितं रामो नारदं प्राह सस्मितम् ॥३५॥<br>शृणु नारद मे किञ्चिद्विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।<br>प्रतिज्ञातं च यत्पूर्वं करिष्ये तन्न संशयः ॥३६॥<br>किन्तु कालानुरोधेन तत्तत्प्रारब्धसंक्षयात् ।<br>हरिष्ये सर्वभूभारं क्रमेणासुरमण्डलम् ॥३७॥<br>रावणस्य विनाशार्थं श्वो गन्ता दण्डकाननम् ।<br>चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ॥३८॥<br>सीतामिषेण तं दुष्टं सकुलं नाशयाम्यहम् ।<br>एवं रामे प्रतिज्ञाते नारदः प्रमुमोद ह ॥३९॥<br>प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दण्डवत्प्रणिपत्य तम् ।<br>अनुज्ञातश्च रामेण ययौ देवगतिं मुनिः ॥४०॥<br>संवादं पठति शृणोति संस्मरेद्वा<br>यो नित्यं मुनिवररामयोः स भक्त्या ।<br>सम्प्राप्नोत्यमरसुदुर्लभं विमोक्षं<br>कैवल्यं विरतिपुरःसरं क्रमेण ॥४१॥नारदजीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसका-<br>कर कहा ॥३५॥ “नारदजी ! सुनिये, क्या कोई<br>ऐसी बात भी है जिसे मैं न जानता होऊँ ? मैंने<br>पहले जो कुछ प्रतिज्ञा की है वह मैं निस्सन्देह पूर्ण<br>करूँगा ॥३६॥ किन्तु कालक्रमसे जिन-जिनका प्रारब्ध<br>क्षीण होता जायगा उन-उन दैत्योंको ही मारकर मैं क्रमशः<br>पृथिवीका भार उतारूँगा ॥३७॥ रावणका वध करने<br>के लिये मैं कल दण्डकारण्यको जाऊँगा और वहाँ<br>चौदह वर्ष मुनिवेष धारण कर रहूँगा ॥ ३८ ॥ उस<br>दुष्टको सीता-हरणके मिषसे मैं कुटुम्बके सहित नष्ट<br>कर दूँगा।”<br>रामचन्द्रजीके इस प्रकार प्रतिज्ञा करनेपर नारदजी<br>अति प्रसन्न हुए ॥३९॥ तदनन्तर उन्होंने रामजीकी<br>तीन परिक्रमाएँ कीं और उन्हें दण्डवत्-प्रणाम कर उनकी<br>आज्ञा ले आकाश-मार्गसे देवलोकको चले गये ॥४०॥<br>जो मनुष्य नारद और रामचन्द्रजीके इस संवादको<br>नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है<br>वह वैराग्यपूर्वक क्रमशः देवताओंको दुर्लभ कैवल्य<br>मोक्षपद प्राप्त कर लेता है ॥४१॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद।

श्रीमद्महादेव उवाच
अथ राजा दशरथः कदाचिद्रहसि स्थितः ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमाहूयेदमभाषत ॥ १ ॥<br>भगवन् राममखिलाः प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।<br>पौराश्च निगमा वृद्धा मन्त्रिणश्च विशेषतः ॥ २ ॥<br>ततः सर्वगुणोपेतं रामं राजीवलोचनम् ।<br>ज्येष्ठं राज्येऽभिषेक्ष्यामि वृद्धोऽहं मुनिपुङ्गव ॥ ३ ॥<br>भरतो मातुलं द्रष्टुं गतः शत्रुघ्नसंयुतः ।<br>अभिषेक्ष्ये श्व एवाशु भवांस्तच्चानुमोदताम् ॥ ४ ॥<br>सम्भारः सम्भ्रियन्तां च गच्छ मन्त्रय राघवम् ।<br>उच्छ्रीयन्तां पताकाश्च नानावर्णाः समन्ततः ॥५॥श्रीमहादेवजी बोले-एक दिन एकान्तमें बैठे हुए<br>राजा दशरथने अपने कुल-पुरोहित वसिष्ठजीको<br>बुलाकर कहा ॥१॥ “भगवन् ! सभी पुरवासी; शास्त्रज्ञ,<br>बड़े-बूढ़े और मन्त्रिजन रामकी विशेषतया बारम्बार<br>प्रशंसा किया करते हैं ॥२॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरा<br>विचार है कि मैं अपने सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ पुत्र कमल-<br>नयन रामको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दूँ क्योंकि मैं<br>अब वृद्ध हो गया हूँ ॥३॥ इस समय भरत शत्रुघ्नके<br>साथ अपने मामाके यहाँ मिलने गया है, तथापि मैं<br>कल शीघ्र ही रामका राज्याभिषेक करना चाहता हूँ ।<br>इस विषयमें आप भी अपनी सम्मति दे दीजिये ॥४॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ ! आप अभिषेककी सामग्री एकत्रित<br>कराइये और रघुनाथजीके पास जाकर उनको यथोचित<br>सम्मति दीजिये । इस समय नगरमें सब ओर रंग-बिरंगी

सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४५


तोरणानि विचित्राणि स्वर्णमुक्तामयानि वै ।
आहूय मन्त्रिणं राजा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम् ॥ ६ ॥
आज्ञापयति यद्यत्त्वां मुनिस्तत्तत्समाजय ।
यौवराज्येऽभिषेक्ष्यामि श्वोभूते रघुनन्दनम् ॥ ७ ॥

तथेति हर्षात्स मुनिं किं करोमीत्यभाषत ।
तमुवाच महातेजा वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ॥ ८ ॥
श्वः प्रभाते मध्यकक्षे कन्यकाः स्वर्णभूषिताः ।
तिष्ठन्तु षोडश गजः स्वर्णरत्नादिभूषितः ॥ ९ ॥
चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः ।
नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्रशः ॥ १० ॥
स्थाप्यन्तां नव चेयाघ्रचर्माणि त्रीणि चानय ।
श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ ११ ॥
दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्यान्‍याभरणानि च ।
मुनयः सत्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ १२ ॥
नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वेणुकास्तथा ।
नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपाङ्गणे ॥ १३ ॥
हस्त्यश्वरथपादाता वहिस्तिष्ठन्तु सायुधाः ।
नगरे यानि तिष्ठन्ति देवतायतनानि च ॥ १४ ॥
तेषु प्रवर्ततां पूजा नानाबलिभिरावृता ।
राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ १५ ॥

इत्यादिश्य मुनिः श्रीमान् सुमन्त्रं नृपमन्त्रिणम् ।
स्वयं जगाम भवनं राघवस्यातिशोभनम् ॥ १६ ॥
रथमारुह्य भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः ।
त्रीणि कक्ष्याण्यतिक्रम्य रथात्क्षितिमवातरत् ॥ १७ ॥
अन्तः प्रविश्य भवनं स्वाचार्यत्वादवारितः ।
गुरुमागतमाज्ञाय रामस्तूर्णं कृताञ्जलिः ॥ १८ ॥
प्रत्युद्गम्य नमस्कृत्य दण्डवद्भक्तिसंयुतः ।
स्वर्णपात्रेण पानीयमानिनायाशु जानकी ॥ १९ ॥


झण्डियाँ लगायी जानी चाहिये ॥ ५ ॥ तथा चित्र-विचित्र सुवर्ण और मोतियोंके तोरण (झालर) बाँधे जाने चाहिये।" उसी समय राजाने मन्त्रिश्रेष्ठ सुमन्त्रको बुलाकर आज्ञा दी कि मैं कल रघुनाथजीको युवराज-पदपर अभिषिक्त करूँगा, उसके लिये मुनिवर वसिष्ठजी जो-जो सामग्री बताएँ वह सब एकत्रित करो ॥ ६-७ ॥

राजा दशरथसे 'बहुत अच्छा' कह सुमन्त्रने हर्ष-पूर्वक मुनिवरसे कहा कि 'मैं क्या करूँ?' तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठजीने उससे कहा—॥ ८ ॥ "कल प्रातःकाल मध्यद्वारपर सुवर्ण-भूषण-भूषित सोलहँ कन्याएँ खड़ी रहनी चाहिये; तथा सुवर्ण और रत्न आदिसे विभूषित ऐरावतके कुलमें उत्पन्न एक चार दाँतोंवाला हाथी रहना चाहिये, नाना तीर्थोंके जलसे पूर्ण हजारों सुवर्ण-कलश मँगवाये जायें ॥ ९-१० ॥ तीन नवीन व्याघ्र-चर्म लाकर रक्खो और मुक्ता-मणि-सुशोभित रत्नदण्डयुक्त एक श्वेत छत्र लाओ ॥ ११ ॥ अनेकों दिव्य मालाएँ, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषण लाकर रखे जाने चाहिये तथा अभिषेक-स्थानपर भली प्रकार सम्मान किये हुए अनेकों मुनिजन हाथमें कुशा लिये हुए उपस्थित रहें ॥ १२ ॥ अनेकों नर्तकियाँ, मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ, गायक, वेणुवादक तथा कुशल बाजे बजानेवाले महाराज दशरथके आँगनमें गाना-बजाना करें ॥ १३ ॥ अभिषेक-स्थानके बाहर हाथी, घोड़े, रथ और पदाति यह चतुरंगिणी सेना अस्त्र-शस्त्र-से सुसज्जित होकर खड़ी रहे। नगरमें जितने देवालय हैं उन सबमें नाना प्रकारकी बलि-सामग्रीसे देवोंकी पूजा की जाय तथा राजालोग शीघ्र ही नाना प्रकारकी भेंटें लेकर आवें" ॥ १४-१५ ॥

राजमन्त्री सुमन्त्रको इस प्रकार आज्ञा दे श्रीमान् वसिष्ठजी स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम सुन्दर महलमें गये ॥ १६ ॥ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने रथपर चढ़कर रघुनाथजीके महलकी तीन पौरियाँ पार कीं और फिर पृथिवीपर उतर पड़े ॥ १७ ॥ तदनन्तर आचार्य होनेके कारण बिना रोक-टोकके वे भीतर चले गये। उस समय गुरुजीको आये देख रामचन्द्रजी तुरन्त हाथ जोड़कर खड़े हो गये और भक्तिपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया। उसी समय सीताजी सुवर्णके पात्रमें जल ले आयीं ॥ १८-१९ ॥

४६अध्यात्मरामायण[सर्ग २

| रत्नासने समावेश्य पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः । | तब रघुनाथजीने गुरुजीको रत्नसिंहासनपर बैठा- | | तदपः शिरसा धृत्वा सीतया सह राघवः ॥२०॥ | कर उनके चरण धोये और सीताजीके सहित उस | | धन्योऽस्मीत्यब्रवीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात् । | चरणोदकको भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कहा- | | श्रीरामेणैवमुक्तस्तु प्रहसनमुनिरब्रवीत् ॥२१॥ | "हे मुने ! आपके चरणोदकको धारण कर आज मैं | | त्वत्पादसलिलं धृत्वा धन्योऽभूद्गिरिजापतिः । | कृतकृत्य हो गया।" भगवान् रामके इस प्रकार कहने- | | ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादतीर्थहताशुभः ॥२२॥ | पर मुनिवर वसिष्ठने हँसकर कहा ॥ २०-२१ ॥ "हे | | इदानीं भाषसे यत्त्वं लोकानामुपदेशकूत् । | राम ! आपके पादोदकको मस्तकपर धारण कर पार्वती- | | जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमीश्वरम् २३ | वल्लभ भगवान् शंकर धन्य-धन्य हो गये तथा मेरे | | देवकार्यार्थसिद्धयर्थं भक्तानां भक्तिसिद्धये । | पिता ब्रह्माजी भी आपके पादतीर्थका सेवन करनेसे ही | | रावणस्य वधार्थाय जातं जानामि राघव ॥२४॥ | निष्पाप हो गये हैं ॥ २२ ॥ इस समय केवल संसारको | | तथापि देवकार्यार्थं गुह्यं नोद्घाटयाम्यहम् । | यह उपदेश करनेके लिये ही कि 'गुरुके साथ किस | | यथा त्वं मायया सर्वं करोषि रघुनन्दन ॥२५॥ | प्रकार व्यवहार करना चाहिये' आप इस प्रकार | | तथैवानुविधास्येऽहं शिष्यस्त्वं गुरुरप्यहम् । | सम्भाषण कर रहे हैं। मैं भली प्रकार जानता हूँ | | गुरुर्गुरूणां त्वं देव पितॄणां त्वं पितामहः ॥२६॥ | आप लक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात् परमात्मा विष्णु | | अन्तर्यामी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | हैं॥ २३ ॥ हे राघव ! मैं जानता हूँ आपने देवताओंका | | शुद्धसत्त्वमयं देहं धृत्वा स्वाधीनसम्भवम् ॥२७॥ | कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेके | | मनुष्य इव लोकेऽस्मिन् भासि त्वं योगमायया । | लिये और रावणका वध करनेके लिये ही अवतार लिया | | पौरोहित्यमहं जाने विगर्ह्यं दूष्यजीवनम् ॥२८॥ | है ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंके कार्य-सिद्धिके लिये | | इक्ष्वाकूणां कुले रामः परमात्मा जनिष्यते । | मैं इस गुप्त रहस्यको प्रकट नहीं करता। हे रघुनन्दन ! | | इति ज्ञातं मया पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ॥२९॥ | जिस प्रकार मायाके आश्रयसे आप सब कार्य करेंगे | | ततोऽहमाशया राम तव सम्बन्धकाङ्क्षया । | उसी प्रकार मैं भी 'तुम शिष्य हो और मैं गुरु हूँ' इस | | अकार्षं गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ | सम्बन्धके अनुकूल व्यवहार करूँगा । किन्तु हे देव ! | | ततो मनोरथो मेऽद्य फलितो रघुनन्दन । | वास्तवमें तो आप ही गुरुओंके गुरु और पितृगणोंके | | त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१॥ | भी पितामह हैं ॥ २५-२६ ॥ आप अन्तर्यामी, | | मां यथा मोहयेन्नैव तथा कुरु रघूद्वह । | जगद्व्यवहारके प्रवर्त्तक और मन-वाणीके अविषय हैं; | | गुरुनिष्कृतिकामस्त्वं यदि देह्येतदेव मे ॥३२॥ | और स्वेच्छासे यह शुद्ध सत्त्वमय शरीर धारण कर इस | | | लोकमें अपनी योगमायासे मनुष्यके समान प्रतीत होते | | | हैं। मैं यह जानता हूँ कि पुरोहिताई अति निन्दनीय | | | और दूषित जीविका है ॥ २७-२८ ॥ तो भी जब | | | पूर्वकालमें ब्रह्माजीके कहनेसे मुझे यह मालूम हुआ कि | | | इक्ष्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे ॥ २९ ॥ तब | | | हे राम ! आपसे सम्बन्ध जोड़नेकी इच्छासे आपका | | | आचार्य बननेके लिये इस निन्दनीय पदको भी मैंने | | | स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी | | | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋणसे | | | उऋण होना चाहते हैं तो मुझे यही दीजिये कि | | | आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वलोकविमोहिनी | | | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ३१-३२ ॥ हे |

सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४७


प्रसङ्गात्सर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया ।<br>राज्ञा दशरथेनाहं प्रेषितोऽस्मि रघूद्वह ॥३३॥<br>त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिषेक्ष्यति राघव।<br>अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि ॥३४॥<br>कृत्वा शुचिर्भूमिरायी भव राम जितेन्द्रियः ।<br>गच्छामि राजसान्निध्यं त्वं तु प्रातर्गमिष्यसि ॥३५॥रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मैं ऐसा और कहीं भी न कहूँगा । हे राघव ! महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कल वे आपको राजपद्पर अभिषिक्त करेंगे—मुझे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, आप कल प्रातःकाल वहाँ पधारें"॥ ३३–३५॥
इत्युक्त्वा रथमारुह्य ययौ राजगुरुर्द्रुतम् ।<br>रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥३६॥<br>सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिषेको भविष्यति ।<br>निमित्तमात्रमेवाहं कर्ता भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥<br>मम त्वं हि बहिःप्राणो नात्र कार्या विचारणा ।<br>ततो वसिष्ठेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत् ॥३८॥ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ ३६॥ "हे सुमित्रानन्दन ! कल मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो मैं तो केवल निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्त्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यप्राण तो तुम्हीं हो—इसमें कोई विशेष सोच-विचारकी आवश्यकता नहीं है।" तदनन्तर वसिष्ठजी जैसा कह गये थे रघुनाथजीने वैसा ही किया ॥३८॥
वसिष्ठोऽपि नृपं गत्वा कृतं सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वसिष्ठस्य पुरो राज्ञा ह्युक्तं रामाभिषेचनम् ॥३९॥<br>यदा तदैव नगरे श्रुत्वा कश्चित्पुमान् जगौ ।<br>कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सब सुना दिया । जिस समय महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके विषयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना दे दी ॥ ३९–४० ॥
श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुर्हारमुत्तमम् ।<br>तस्मै ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥<br>लक्ष्मीं पर्यचरद्देवीं रामस्यार्थप्रसिद्धये ।<br>सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम् ॥४२॥<br>कैकेयीवशगः किन्तु कामुकः किं करिष्यति ।<br>इति व्याकुलचित्ता सा दुर्गां देवीमपूजयत् ॥४३॥उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष-पूर्ण हो उसे एक अत्युत्तम हार दिया । तदुपरान्त पुत्रवत्सला कौसल्याने रामचन्द्रजीकी इष्ट-सिद्धिके लिये लक्ष्मीदेवीका पूजन किया 'राजा दशरथ सत्य-वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२ ॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीभूत हैं; ऐसी अवस्था में क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे ?' इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गादेवीका पूजन करने लगीं ॥ ४३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे देवा देवीं वाणीमचोदयन् ।<br>गच्छ देवि भुवो लोकमयोध्यायां प्रयत्नतः ॥४४॥<br>रामाभिषेकविघ्नार्थं यतस्व ब्रह्मवाक्यतः ।इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेवीसे आग्रह किया कि "हे देवि ! तुम युक्तिपूर्वक भूलोकमें अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्रह्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित