अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| [ सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५७ |
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| आश्वासयामास नृपं शनैः स नयकोविदः ।<br>किमत्र दुःखेन विभो राज्यं शासतु मेऽनुजः ॥७३॥<br><br>अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य पुनर्यास्यामि ते पुरम् ।<br>राज्यात्कोटिगुणं सौख्यं मम राजन्वने सतः ॥७४॥<br><br>त्वत्सत्यपालनं देवकार्यं चापि भविष्यति ।<br>कैकेय्याश्च प्रियो राजन्वनवासो महागुणः ॥७५॥<br><br>इदानीं गन्तुमिच्छामि व्येतु मातुश्च हृज्ज्वरः ।<br>सम्भाराश्चोपहीयन्तामभिषेकार्थमाहृताः ॥७६॥<br><br>मातरं च समाश्वास्य अनुनीय च जानकीम् ।<br>आगत्य पादौ वन्दित्वा तव यास्ये सुखं वनम्॥७७॥<br><br>इत्युक्त्वा तु परिक्रम्य मातरं द्रष्टुमाययौ ।<br>कौसल्याऽपि हरेः पूजां कुरुते रामकारणात् ॥७८॥<br><br>होमं च कारयामास ब्राह्मणेभ्यो ददौ धनम् ।<br>ध्यायते विष्णुमेकाग्रमनसा मौनमास्थिता ॥७९॥<br><br>अन्तःस्थमेकं घनचित्प्रकाशं<br>निरस्तसर्वातिशयस्वरूपम् ।<br>विष्णुं सदानन्दमयं हृदब्जे<br>सा भावयन्ती न ददर्श रामम् ॥८०॥ | पिताके आँसू पोंछे ॥ ७२ ॥ और नीतिकुशल रामजीने धीरे-धीरे उन्हें ढाढस बँधाया। वे कहने लगे—"प्रभो ! यदि मेरे छोटे भाई भरत राज्यशासन करें तो इसमें दुःखकी क्या बात है ? ॥ ७३ ॥ मैं भी इस प्रतिज्ञाका पालन कर फिर आपके पास अयोध्या लौट ही आऊँगा । और हे राजन् ! वनमें रहनेसे तो मुझे राज्यसे भी करोड़ गुना सुख होगा ॥ ७४ ॥ इसमें आपके सत्यकी रक्षा होगी, देवताओंका कार्य सिद्ध होगा और कैकेयीका भी हित होगा; अतः हे राजन् ! वनवासमें सब प्रकार महान् गुण है ॥ ७५ ॥ अब मैं शीघ्र ही जाना चाहता हूँ; माता कैकेयीकी हार्दिक व्यथा शान्त हो । अभिषेकके लिये एकत्रित की हुई यह सामग्री अलग रख दी जाय ॥ ७६ ॥ माता कौसल्याको सान्त्वना देकर और जानकीको समझा-बुझाकर मैं अभी आता हूँ और आपके चरणोंकी वन्दना-कर आनन्दपूर्वक वनको. जाता हूँ" ॥ ७७ ॥<br><br>ऐसा कह उन्होंने पिताकी परिक्रमा की और मातासे मिलनेके लिये आये । इस समय माता कौसल्या रामके मंगलके लिये श्रीविष्णुभगवान्की पूजा कर रही थीं ॥ ७८ ॥ उन्होंने कुछ पहले हवन कराके ब्राह्मणों-को बहुत-सा धन दिया था और इस समय वह मौन धारणकर एकाग्रचित्तसे श्रीविष्णुभगवान्का ध्यान कर रही थीं ॥ ७९ ॥ अपने हृदयमें अन्तर्यामी, चिद्घन-स्वरूप, तेजोमय, निरतिशयस्वरूप, सदानन्दमय भगवान् विष्णुका ध्यान करती रहनेके कारण उन्होंने श्रीरामचन्द्र-जीको नहीं देख पाया ॥ ८० ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥