भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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५८अध्यात्मरामायण[सर्ग ४

चतुर्थ सर्ग

भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा सीता और लक्ष्मणके सहित वनगमनकी तैयारी करना।

श्रीमहादेव उवाच

ततः सुमित्रा दृष्ट्वैनं रामं राज्ञीं ससम्भ्रमा ।
कौसल्यां बोधयामास रामोऽयं समुपस्थितः ॥ १ ॥

श्रुत्वैव रामनामैषा बहिर्दृष्टिप्रवाहिता ।
रामं दृष्ट्वा विशालाक्षमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥ २ ॥

मूर्ध्ववघ्राय पस्पर्श गात्रं नीलोत्पलच्छवि ।
भुङ्क्ष्व पुत्रेति च प्राह मिष्टमन्नं क्षुधार्दितः ॥ ३ ॥

रामः प्राह न मे मातर्भोजनावसरः कुतः ।
दण्डकागमने शीघ्रं मम कालोऽद्य निश्चितः ॥ ४ ॥

कैकेयीवरदानेन सत्यसन्धः पिता मम ।
भरताय ददौ राज्यं ममाप्यारण्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥

चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ।
आगमिष्ये पुनः शीघ्रं न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ ६ ॥

तच्छ्रुत्वा सहसोद्विग्ना मूर्च्छिता पुनरुत्थिता ।
आह रामं सुदुःखार्ता दुःखसागरसम्प्लुता ॥ ७ ॥

यदि राम वनं सत्यं यासि चेन्नय मामपि ।
त्वद्विहीना क्षणार्द्धं वा जीवितं धारये कथम् ॥ ८ ॥

यथा गौर्बालकं वत्सं त्यक्त्वा तिष्ठेन्न कुत्रचित् ।
तथैव त्वां न शक्नोमि त्यक्तुं प्राणात्प्रियं सुतम् ॥ ९ ॥

भरताय प्रसन्नश्चेद्राज्यं राजा प्रयच्छतु ।
किमर्थं वनवासाय त्वामाज्ञापयति प्रियम् ॥ १० ॥

कैकेय्या वरदो राजा सर्वस्वं वा प्रयच्छतु ।
त्वया किमपराद्धं हि कैकेय्या वा नृपस्य वा ॥ ११ ॥

पिता गुरुर्यथा राम तवाहमाधिका ततः ।
पित्राज्ञप्तो वनं गन्तुं वारयेयमहं सुतम् ॥ १२ ॥


श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वती ! तब महारानी सुमित्राने रामको देखकर सम्भ्रमपूर्वक महारानी कौसल्याको चेत कराकर बताया कि राम खड़े हुए हैं ॥ १ ॥ रामका नाम सुनते ही उनकी बहिर्दृष्टि हुई और उन्होंने विशालनयन रामको देख गले लगाकर गोदमें बैठा लिया ॥ २ ॥ तथा उनका शिर सूँघकर उनके नील-कमल-सदृश श्याम शरीरपर हाथ फेरा और कहा—"बेटा, भूख लगी होगी कुछ मिष्टान्न खा लो" ॥ ३ ॥

रामजी बोले—"माता ! मुझे भोजन करनेका समय नहीं है क्योंकि आज मेरे लिये यह समय शीघ्र ही दण्डकारण्य जानेके लिये निश्चित किया गया है ॥ ४ ॥ मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिताजीने माता कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे अति उत्तम वनवास दिया है ॥ ५ ॥ वहाँ मुनिवेषसे चौदह वर्ष रहकर मैं शीघ्र ही लौट आऊँगा; आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें" ॥ ६ ॥

अचानक ऐसी बात सुनकर माता कौसल्या दुःखसे अचेत हो गयीं और फिर चेत होनेपर दुःखसागरमें उछलती-डूबती दुःखातुर होकर रामसे कहने लगीं ॥ ७ ॥ "राम ! यदि सचमुच ही तुम वनको जाते हो तो मुझे भी साथ ले चलो; तुम्हारे बिना मैं आधे क्षण भी कैसे जीवित रह सकती हूँ ? ॥ ८ ॥ जिस प्रकार गौ अपने अल्पवयस्क बछड़ेको छोड़कर अन्यत्र नहीं रह सकती उसी प्रकार मैं भी तुझ अपने प्राणप्रिय पुत्रको नहीं छोड़ सकती ॥ ९ ॥ यदि राजा भरतसे प्रसन्न हैं तो उन्हें राज्य भले ही दें परन्तु तुझ प्रियपुत्रको वनवासकी आज्ञा क्यों देते हैं ? ॥ १० ॥ कैकेयीको वर देकर चाहे महाराज अपना सर्वस्व दे डालें, (इसमें कोई आपत्ति नहीं) किन्तु तुमने राजा अथवा कैकेयीका क्या बिगाड़ा है ? ॥ ११ ॥ हे राम ! जिस प्रकार पिता तुम्हारे गुरु हैं उसी प्रकार मैं भी तो उनसे अधिक तुम्हारी गुरु हूँ ! यदि पिताने तुमसे वन जानेको कहा है तो मैं तुम्हें रोकती हूँ ॥ १२ ॥ यदि मेरे वाक्यका