अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| सर्ग ४ ] | अयोध्याकाण्ड | ५९ |
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| यदि गच्छसि मद्वाक्यमुल्लङ्घ्य नृपवाक्यतः ।<br>तदा प्राणान्परित्यज्य गच्छामि यमसादनम् ॥१३॥ | उल्लङ्घन कर तुम राजाकी आज्ञासे वनको चले जाओगे तो मैं अपना प्राण छोड़कर यमपुरको चली जाऊँगी” ॥ १३ ॥ |
| लक्ष्मणोऽपि ततः श्रुत्वा कौसल्यावचनं रुषा ।<br>उवाच राघवं वीक्ष्य दहन्निव जगत्त्रयम् ॥१४॥ | तब लक्ष्मणने भी कौसल्याके वचन सुनकर रामजीकी ओर देखकर रोषसे त्रिलोकीको दग्ध करते हुए-से कहा ॥ १४ ॥ “मैं उन्मत्त, भ्रान्तचित्त और कैकेयीके |
| उन्मत्तं भ्रान्तमनसं कैकेयीवशवर्तिनम् ।<br>बद्ध्वा निहन्मि भरतं तद्वन्धून्मातुलानपि ॥१५॥ | वशवर्ती राजा दशरथको बाँधकर भरतको उनके सहायक मामा आदिके सहित मार डालूँगा ॥ १५ ॥ आज |
| अद्य पश्यन्तु मे शौर्यं लोकान्प्रदहतः पुरा ।<br>राम त्वमभिषेकाय कुरु यत्नमरिन्दम ॥१६॥<br>धनुष्पाणिरहं तत्र निहन्यां विघ्नकारिणः । | सम्पूर्ण लोकोंको दग्ध करनेवाले कालानलके समान मेरे पौरुषको पहले वे सब लोग देख लें । हे शत्रुदमन राम ! आप अभिषेककी तैयारी कीजिये ॥१६॥ उसमें विघ्न उपस्थित करनेवालोंको मैं हाथमें धनुष-बाण लेकर मार डालूँगा ।” |
| इति ब्रुवन्तं सौमित्रिमालिङ्ग्य रघुनन्दनः ॥१७॥<br>शूरोऽसि रघुशार्दूल ममात्यन्तहिते रतः ।<br>जानामि सर्वं ते सत्यं किन्तु तत्समयो नहि॥१८॥ | लक्ष्मणजीके इस प्रकार कहनेपर रघुनाथजीने उन्हें गले लगाकर कहा ॥ १७ ॥ “हे रघुश्रेष्ठ ! तुम बड़े शूरवीर और मेरे परम हितकारी हो । तुम जो कुछ कहते हो वह मैं सब सत्य मानता हूँ, किन्तु यह उसका समय नहीं है ॥ १८ ॥ यह जो कुछ राज्य और देह |
| यदिदं दृश्यते सर्वं राज्यं देहादिकं च यत् ।<br>यदि सत्यं भवेत्तत्र आयासः सफलश्च ते ॥१९॥ | आदि दिखायी देता है वह सब यदि सत्य होता तो अवश्य तुम्हारा परिश्रम सफल होता ॥ १९ ॥ किन्तु |
| भोगा मेघवितानस्थविद्युल्लेखेव चञ्चलाः ।<br>आयुरप्यग्निसन्तप्तलोहस्थजलविन्दुवत् ॥२०॥ | ये भोग तो मेघरूपी वितानमें चमकती हुई बिजलीके समान चञ्चल हैं और आयु अग्निमें तपाये हुए लोहेपर पड़ी हुई जलकी बूँदके समान क्षणिक है॥ २० ॥ |
| यथा व्यालगलस्थोऽपि भेको दंशानपेक्षते ।<br>तथा कालाहिना ग्रस्तो लोको भोगानशाश्वतान् २१ | जिस प्रकार सर्पके मुँहमें पड़ा हुआ भी मेंढक मच्छरोंको ताकता रहता है उसी प्रकार लोग कालरूप सर्पसे ग्रस्त हुए भी अनित्य भोगोंको चाहते रहते हैं ॥२१॥ कैसा |
| करोति दुःखेन हि कर्मतन्त्रं<br>शरीरभोगार्थमहर्निशं नरः ।<br>देहस्तु भिन्नः पुरुषात्समीक्ष्यते<br>को वात्र भोगः पुरुषेण भुज्यते ॥२२॥ | आश्चर्य है कि शरीरके भोगोंके लिये ही मनुष्य रात-दिन अति कष्ट सहकर नाना प्रकारकी क्रियाएँ करता रहता है । यदि यह समझ ले कि शरीर आत्मासे भिन्न है तो फिर भला पुरुष कैसे किसी भोगको भोग सकता है ? ॥ २२ ॥ पिता, माता, पुत्र, भाई, स्त्री और बन्धु- |
| पितृमातृसुतभ्रातृदारबन्ध्वादिसङ्गमः ।<br>प्रपायामिव जन्तूनां नद्यां काष्ठौघवच्चलः ॥२३॥ | बान्धवोंका संयोग प्याऊपर एकत्रित हुए जीवों अथवा नदी-प्रवाहसे इकट्ठी हुई लकड़ियोंके समान चञ्चल है ॥ २३ ॥ यह निस्सन्देह दिखायी पड़ता है कि |
| छायेव लक्ष्मीश्चपला प्रतीता<br>तारुण्यमम्बूर्विवदध्रुवं च।<br>स्वप्नोपमं स्त्रीसुखमायुरल्पं<br>तथापि जन्तोरभिमान एषः ॥२४॥ | लक्ष्मी छायाके समान चञ्चल, यौवन जल-तरंगके समान अनित्य है, स्त्री-सुख स्वप्नके समान मिथ्या और आयु अत्यन्त अल्प है तथापि प्राणियोंका इनमें कितना अभिमान है ? ॥२४॥ यह संसार सदा रोगादि-संकुल |