भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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६०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
संसृतिः स्वप्नसदृशी सदा रोगादिसङ्कुला ।<br>गन्धर्वनगरप्रख्या मूढस्तामनुवर्तते ॥२५॥तथा स्वप्न और गन्धर्व-नगरके समान मिथ्या है, मूढ़-जन ही इसको सत्य मानकर इसका अनुकरण करते हैं ॥२५॥
आयुष्यं क्षीयते यस्मादादित्यस्य गतागतैः ।<br>दृष्ट्वाऽन्येषां जरामृत्यू कथञ्चिन्नैव बुध्यते ॥२६॥नित्य सूर्यके उदय और अस्त होनेसे आयु क्षीण हो रही है तथा नित्य ही दूसरोंकी वृद्धावस्था और मृत्यु होती देखी जाती है तो भी मूढ़ पुरुषको किसी प्रकार चेत नहीं होता ॥२६॥
स एव दिवसः सैव रात्रिरित्येव मूढधीः ।<br>भोगाननुपतत्येव कालवेगं न पश्यति ॥२७॥नित्यप्रति उसी प्रकार दिन और रात होते हैं किन्तु मूढ़मति पुरुष भोगोंके पीछे ही दौड़ता है, कालकी गतिको नहीं देखता ॥२७॥
प्रतिक्षणं क्षरत्येतदायुरामघटाम्बुवत् ।<br>सपत्ना इव रोगौघाः शरीरं प्रहरन्त्यहो ॥२८॥कच्चे घड़ेमें भरे हुए जलके समान आयु प्रतिक्षण क्षीण हो रही है और रोग-समूह शत्रुओंके समान शरीरको सुकाये डालते हैं ॥२८॥
जरा व्याघ्रीव पुरतस्तर्जयन्त्यवतिष्ठते ।<br>मृत्युः सहैव यात्येष समयं सम्प्रतीक्षते ॥२९॥वृद्धावस्था सिंहिनीके समान डराती हुई सामने खड़ी है और यह मृत्यु भी उसके साथ ही चलती हुई (अन्त) समयकी प्रतीक्षा कर रही है ॥२९॥
देहेऽहंभावमापन्नो राजाऽहं लोकविश्रुतः ।<br>इत्यस्मिन्मनुते जन्तुः कृमिविड्भस्मसंज्ञिते ॥३०॥किन्तु देहमें अहं-भावना करनेवाला जीव इस कृमि, विष्ठा और भस्मरूप शरीरको ही 'मैं लोक-प्रसिद्ध राजा हूँ' ऐसा मानता है ॥३०॥
त्वगस्थिमांसविण्मूत्ररेतोरक्तादिसंयुतः ।<br>विकारी परिणामी च देह आत्मा कथं वद ॥३१॥हे लक्ष्मण ! तुम कुछ सोचकर बताओ कि जिसके आश्रयसे तुम संसारको दग्ध करना चाहते हो वह त्वचा, अस्थि, मांस, विष्ठा, मूत्र, शुक्र और रुधिर आदिसे बना हुआ विकारी और परिणामी देह आत्मा किस प्रकार हो सकता है !
यमास्थाय भवाँल्लोकं दग्धुमिच्छति लक्ष्मण ।<br>देहाभिमानिनः सर्वे दोषाः प्रादुर्भवन्ति हि ॥३२॥हे भाई ! इस देहाभिमानसे युक्त पुरुषोंमें ही सम्पूर्ण दोष प्रकट हुआ करते हैं ॥३१-३२॥
देहोऽहमिति या बुद्धिरविद्या सा प्रकीर्तिता ।<br>नाहं देहश्चिदात्मेति बुद्धिर्विद्येति भण्यते ॥३३॥'मैं देह हूँ' इस बुद्धिका नाम ही अविद्या है और 'मैं देह नहीं, चेतन-आत्मा हूँ' इसको विद्या कहते हैं ॥३३॥
अविद्या संसृतेर्हेतुर्विद्या तस्या निवर्तिका ।<br>तस्माद्यत्नः सदा कार्यो विद्याभ्यासे मुमुक्षुभिः ।<br>कामक्रोधादयस्तत्र शत्रवः शत्रुसूदन ॥३४॥अविद्या जन्म-मरणरूप संसारकी कारण है और विद्या उसको निवृत्त करनेवाली है; अतः मोक्ष-कामियोंको सदा विद्योपार्जनका प्रयत्न करना चाहिये । हे शत्रुदमन ! काम-क्रोध आदि इस साधनमें विघ्न करनेवाले शत्रु हैं ॥३४॥
तत्रापि क्रोध एवालं मोक्षविघ्नाय सर्वदा ।<br>येनाविष्टः पुमान्हन्ति पितृभ्रातृसुहृत्सखीन् ॥३५॥उनमें भी मोक्षमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तो एकमात्र क्रोध ही पर्याप्त है, जिसका आवेश होनेसे पुरुष पिता, माता, सुहृद् और बन्धुओंका भी वध कर डालता है ॥३५॥
क्रोधमूलो मनस्तापः क्रोधः संसारबन्धनम् ।<br>धर्मक्षयकरः क्रोधस्तस्मात्क्रोधं परित्यज ॥३६॥मनके सन्तापका मूल क्रोध ही है और क्रोध ही संसारका बन्धन तथा धर्मका क्षय करनेवाला है । इसलिये तुम क्रोधको छोड़ दो ॥३६॥
क्रोध एष महान् शत्रुस्तृष्णा वैतरणी नदी ।<br>सन्तोषो नन्दनवनं शान्तिरेव हि कामधुक् ॥३७॥यह क्रोध महान् शत्रु है, तृष्णा वैतरणी नदी है, सन्तोष नन्दनवन है और शान्ति ही कामधेनु है ॥३७॥
तस्मात्क्षान्तिं भजस्वाद्य शत्रुरेवं भवेन्न ते ।इसलिये तुम शान्ति धारण करो, इससे (क्रोधरूपी) शत्रु का तुमपर प्रभाव न होगा ।
देहेन्द्रियमनःप्राणबुद्ध्यादिभ्यो विलक्षणः ॥३८॥आत्मा