भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ] अयोध्याकाण्ड ६१


आत्मा शुद्धः स्वयंज्योतिरविकारी निराकृतिः ।<br>यावद्देहेन्द्रियप्राणैर्भिन्नत्वं नात्मनो विदुः ॥३९॥<br>तावत्संसारदुःखौघैः पीड्यन्ते मृत्युसंयुताः ।<br>तस्मात्त्वं सर्वदा भिन्नमात्मानं हृदि भावय ॥४०॥<br>बुद्ध्यादिभ्यो बहिः सर्वमनुवर्तस्व मा खिदः ।<br>भुञ्जन्प्रारब्धमखिलं सुखं वा दुःखमेव वा ॥४१॥<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्नपि न लिप्यसे ।<br>बाह्ये सर्वत्र कर्तृत्वमावहन्नपि राघव ॥४२॥<br>अन्तःशुद्धस्वभावस्त्वं लिप्यसे न च कर्मभिः ।<br>एतन्मयोदितं कृत्स्नं हृदि भावय सर्वदा ॥४३॥<br>संसारदुःखैरखिलैर्बाध्यसे न कदाचन ।<br>त्वमप्यम्ब मयादिष्टं हृदि भावय नित्यदा ॥४४॥<br>समागमं प्रतीक्षस्व न दुःखैः पीड्यसे चिरम् ।<br>न सदैकत्र संवासः कर्ममार्गानुवर्तिनाम् ॥४५॥<br>यथा प्रवाहपतितप्लवानां सरितां तथा ।<br>चतुर्दशसमा सङ्ख्या क्षणार्द्धमिव जायते ॥४६॥<br>अनुमन्यस्व मामम्ब दुःखं सन्त्यज्य दूरतः ।<br>एवं चेत्सुखसंवासो भविष्यति वने मम ॥४७॥देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और बुद्धि आदिसे पृथक् तथा शुद्ध स्वयंप्रकाश, अविकारी और निराकार है । जबतक मनुष्य देह, इन्द्रिय और प्राण आदिसे आत्माकी भिन्नता नहीं जानते तबतक वे मृत्युपाशमें बँधकर सांसारिक दुःखसमूहसे पीडित होते रहते हैं । इसलिये तुम सर्वदा अपने हृदयमें बुद्धि आदिसे आत्माको भिन्न अनुभव करो, इस सम्पूर्ण बाह्य व्यवहारका अनुवर्तन करो; और सुख अथवा दुःखरूप जैसा प्रारब्ध हो उसीको भोगते हुए चित्तमें खेद न मानो ॥ ३८-४१ ॥ हे रघुपूत्र ! बाहरसे ( इन्द्रिय आदिद्वारा ) कर्तृत्व प्रकट करते हुए जो कार्य प्रारब्धवश उपस्थित हो उसे करते रहनेसे भी तुम बन्धनमें नहीं पड़ोगे ॥४२॥ भीतरसे राग-द्वेषरहित और शुद्धस्वभाव रहनेके कारण तुम कर्मोंसे लिप्त न होगे। मेरे इस सम्पूर्ण कथनपर तुम सर्वदा अपने हृदयमें विचार करो ॥ ४३ ॥ ऐसा करनेसे तुम सम्पूर्ण सांसारिक दुःखोंसे कभी बाधित न होगे । हे मात: ! तुम भी मेरे इस कथनपर नित्य विचार करना ॥ ४४ ॥ और मेरे फिर मिलनेकी प्रतीक्षा करती रहना । तुम्हें अधिक काल दुःख न होगा। कर्मबन्धनमें बँधे हुए जीवोंका सदा एक ही साथ रहना-सहना नहीं हुआ करता ॥ ४५ ॥ जैसे नदीके प्रवाहमें पड़कर बहती हुई डोंगियाँ सदा साथ-साथ ही नहीं चलतीं । माता ! यह चौदह वर्षकी अवधि आधे क्षणके समान बीत जायगी, आप अब दुःखको दूर करके हमें वन जानेकी अनुमति दीजिये । आपके ऐसा करनेसे मैं वनमें सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ ४६-४७ ॥
इत्युक्त्वा दण्डवन्मातुः पादयोरपतच्चिरम् ।<br>उत्थाप्याङ्के समावेश्य आशीर्भिरभ्यनन्दयत्॥४८॥ऐसा कह श्रीरामचन्द्रजी बहुत देरतक दण्डके समान माताके चरणोंमें पड़े रहे । तदनन्तर माताने उन्हें उठाकर गोदमें बैठा लिया और आशीर्वाद देकर उनकी प्रशंसा की ॥ ४८ ॥ वे बोलीं-“तुम्हारे
सर्वे देवाः सगन्धर्वा ब्रह्मविष्णुशिवादयः ।<br>रक्षन्तु त्वां सदा यान्तं तिष्ठन्तं निद्रया युतम्॥४९॥चलते, बैठते अथवा सोते समय गन्धर्वों-सहित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिक सम्पूर्ण देवगण तुम्हारी सर्वदा रक्षा करें" ॥ ४९ ॥
इति प्रस्थापयामास समालिङ्ग्य पुनः पुनः ।<br>लक्ष्मणोऽपि तदा रामं नत्वा हर्षाश्रुगद्गदः ॥५०॥<br>आह राम ममान्तस्थः संशयोऽयं त्वया हृतः ।इस प्रकार बारम्बार हृदयसे लगाकर माताने रामको विदा किया । तब लक्ष्मणजीने भी रामजीसे आँखोंमें आनन्दाश्रु भरकर गद्गद वाणीसे कहा-“हे राम ! आपने मेरा आन्तरिक सन्देह दूर कर दिया, अब मैं
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