भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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.६२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

यास्यामि पृष्ठतो राम सेवां कर्तुं तदादिश ॥५१॥
अनुगृह्णीष्व मां राम नोचेत्प्राणांस्त्यजाम्यहम् ।
तथेति राघवोऽप्याह लक्ष्मणं याहि माचिरम्॥५२॥

प्रतस्थे तां समाधातुं गतः सीतापतिर्विभुः ।
आगतं पतिमालोक्य सीता सुस्मितभाषिणी ॥५३॥
स्वर्णपात्रस्थसलिलैः पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।
पप्रच्छ पतिमालोक्य देव किं सेनया विना ॥५४॥
आगतोऽसि गतः कुत्र श्वेतच्छत्रं च ते कुतः ।
वादित्राणि न वाद्यन्ते किरीटादि विवर्जितः ॥५५॥
सामन्तराजसहितः सम्भ्रमान्नागतोऽसि किम् ।

इति स सीतया पृष्टो रामः सस्मितमब्रवीत् ॥५६॥
राज्ञा मे दण्डकारण्ये राज्यं दत्तं शुभेऽखिलम् ।
अतस्तत्पालनाथार्थाय शीघ्रं यास्यामि भामिनि ।५७।
अद्यैव यास्यामि वनं त्वं तु श्वश्रूसमीपगा ।
शुश्रूषां कुरु मे मातुर्न मिथ्यावादिनो वयम् ॥५८॥

इति ब्रुवन्तं श्रीरामं सीता भीताऽब्रवीद्वचः ।
किमर्थं वनराज्यं ते पित्रा दत्तं महात्मना ॥५९॥

तामाह रामः कैकेय्यै राजा प्रीतो वरं ददौ ।
भरताय ददौ राज्यं वनवासं समानघे ॥६०॥
चतुर्दश समास्तत्र वासो मे किल याचितः ।
तया देव्या ददौ राजा सत्यवादी दयापरः ॥६१॥
अतः शीघ्रं गमिष्यामि मा विघ्नं कुरु भामिनि।

श्रुत्वा तद्रामवचनं जानकी प्रीतिसंयुता ॥६२॥
अहमग्रे गमिष्यामि वनं पश्चात्त्वमेष्यसि ।
इत्याह मां विना गन्तुं तव राघव नोचितम् ॥६३॥


हिन्दी अनुवाद

आपकी सेवा करनेके लिये आपके पीछे-पीछे चलूँगा, आप इसके लिये आज्ञा दीजिये ॥ ५०-५१ ॥ हे प्रभो ! आप मुझपर कृपा कीजिये, नहीं तो मैं प्राण छोड़ दूँगा।” तब रघुनाथजीने भी लक्ष्मणसे कहा—'बहुत अच्छा, चलो देरी न करो' ॥ ५२ ॥

तदनन्तर सीतापति भगवान् राम सीताजीको समझानेके लिये चले और अपने महलमें पहुँचे तब मन्द-मुसकानपूर्वक बोलनेवाली श्रीसीताजीने पतिदेवको आते देख एक सुवर्ण-पात्रमें जल लेकर भक्तिपूर्वक उनके चरण धोये और स्वामीकी ओर देखते हुए पूछा—"देव ! इस समय सेनाके बिना ही आप कैसे आये हैं ? आप प्रातःकाल कहाँ गये थे ? आपका श्वेत छत्र कहाँ है ? बाजोंका बजना क्यों बन्द हो गया है और आप किरीटादि राजोचित आभूषणोंसे रहित क्यों हैं ? ॥ ५३-५५ ॥ आप मन्त्री और राजाओंके सहित बड़े ठाट-बाटसे क्यों नहीं आये ?”

सीताजीके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा ॥ ५६ ॥ "हे शुभे ! पिताजीने मुझे दण्डकारण्यका सम्पूर्ण राज्य दिया है, अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही उसका प्रबन्ध करनेके लिये वहाँ जाऊँगा ॥ ५७ ॥ मैं आज ही वनको जा रहा हूँ; तुम अपनी सासुके पास जाकर उनकी सेवा-शुश्रूषामें रहो । मैं झूठ नहीं बोलता" ॥ ५८ ॥

रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर सीताजीने भयभीत होकर कहा—"आपके महात्मा पिताजीने आपको वनका राज्य क्यों दिया है ?” ॥ ५९ ॥

तब रामचन्द्रजीने उनसे कहा—"हे अनघे ! महाराजने प्रसन्नतापूर्वक कैकेयीको वर देकर भरतको राज्य और मुझे वनवास दिया है ॥ ६० ॥ देवी कैकेयीने मेरे लिये चौदह वर्षतक वनमें रहना माँगा था, सो सत्यवादी दयालु महाराजने देना स्वीकार कर लिया है ॥ ६१ ॥ अतः हे भामिनि ! मैं शीघ्र ही वहाँ जाऊँगा, तुम इसमें किसी प्रकारका विघ्न खड़ा न करना।” रामचन्द्रजीके ऐसे वचन सुनकर सीताजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—"पहले मैं वनको जाऊँगी उसके पीछे आप आना । हे राघव ! मुझे छोड़कर आपको वनमें जाना उचित नहीं है” ॥ ६२-६३ ॥