भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ]अयोध्याकाण्ड६३

तामाह राघवः प्रीतः स्वप्रियां प्रियवादिनीम् ।<br>कथं वनं त्वां नेष्येऽहं बहुव्याघ्रमृगाकुलम् ॥६४॥<br>राक्षसा घोररूपाश्च सन्ति मानुषभोजिनः ।<br>सिंहव्याघ्रवराहाश्च सञ्चरन्ति समन्ततः ॥६५॥<br>कद्वम्लफलमूलानि भोजनार्थं सुमध्यमे ।<br>अपूपानि व्यञ्जनानि विद्यन्ते न कदाचन ॥६६॥<br>काले काले फलं वाऽपि विद्यते कुत्र सुन्दरि ।<br>मार्गो न दृश्यते क्वापि शर्कराकण्टकान्वितः ॥६७॥<br>गुहागह्वरसम्बाधं झिल्लीदंशादिभिर्युतम् ।<br>एवं बहुविधं दोषं वनं दण्डकसंज्ञितम् ॥६८॥<br>पादचारेण गन्तव्यं शीतवातातपादिमत् ।<br>राक्षसादीन्वने दृष्ट्वा जीवितं हास्यसेऽचिरात् ॥६९॥<br>तस्माद्भद्रे गृहे तिष्ठ शीघ्रं द्रक्ष्यसि मां पुनः ।<br>रामस्य वचनं श्रुत्वा सीता दुःखसमन्विता ॥७०॥<br>प्रत्युवाच स्फुरद्वक्त्रा किञ्चित्कोपसमन्विता ।<br>कथं मामिच्छसे त्यक्तुं धर्मपत्नीं पतिव्रताम् ॥७१॥<br>त्वदनन्यामदोषां मां धर्मज्ञोऽसि दयापरः ।<br>त्वत्समीपे स्थितां राम को वा मां धर्षयेद्वने ॥७२॥<br>फलमूलादिकं यद्यत्तव भुक्तावशेषितम् ।<br>तदेवामृततुल्यं मे तेन तुष्टा रमाम्यहम् ॥७३॥<br>त्वया सह चरन्त्या मे कुशाः काशाश्च कण्टकाः ।<br>पुष्पास्तरणतुल्या मे भविष्यन्ति न संशयः ॥७४॥<br>अहं त्वां क्लेशये नैव भवेयं कार्यसाधिनी ।<br>बाल्ये मां वीक्ष्य कश्चिद्वै ज्योतिःशास्त्रविशारदः ॥<br>प्राह ते विपिने वासः पत्या सह भविष्यति ।<br>सत्यवादी द्विजो भूयाद्गमिष्यामि त्वया सह ॥७६॥ | तब रघुनाथजीने प्रसन्न होकर अपनी प्रिया प्रियवादिनी जानकीसे कहा—"मैं तुम्हें अनेकों व्याघ्रादि वन्य-पशुओंसे पूर्ण वनमें कैसे साथ ले चलूँ ॥ ६४ ॥ वहाँ मनुष्योंको खानेवाले भयंकर राक्षस रहते हैं और सब ओर सिंह, व्याघ्र तथा शूकर आदि हिंस्र-जीव फिरते हैं ॥ ६५ ॥ हे सुन्दर कमरवाली ! वहाँ भोजनके लिये कडुए और खट्टे फल-मूलादि ही मिलते हैं; किसी प्रकारके पूए आदि व्यञ्जन वहाँ कभी नहीं मिलते ॥ ६६ ॥ हे सुन्दरि ! वे फल भी सदा नहीं मिलते, किसी-किसी समय कहीं मिलते हैं । उस वनमें कहीं-कहीं तो धूलि और काँटोंसे ढके रहनेके कारण मार्ग भी दिखायी नहीं देता ॥ ६७ ॥ वह दण्डकारण्य ऐसे ही अनेकों दोषोंसे भरा हुआ है । उसमें अनेकों गुफाएँ और गडढे हैं तथा वह झिल्ली और डाँसोंसे भरा हुआ है ॥ ६८ ॥ ऐसे वनमें शीत, वायु और घाम आदिके समय भी पैदल ही चलना पड़ता है । मुझे सन्देह है कि तुम वनमें राक्षसादिको भयंकर मूर्त्ति देखकर तुरन्त ही प्राणत्याग कर बैठोगी ॥ ६९ ॥ इसलिये हे भद्रे ! तुम घर ही रहो, मुझे शीघ्र ही फिर देख पाओगी ।"<br>रामके ये वचन सुनकर सीताने दुःखातुर होकर कुछ क्रोधसे ओंठ काँपते हुए कहा—"मुझ पतिव्रता धर्मपत्नीको आप घर क्यों छोड़ना चाहते हैं ? ॥ ७०-७१ ॥ आप धर्मज्ञ और दयालु हैं फिर अपनी अनन्यभक्ता और दोषहीना मुझ पत्नीको क्यों छोड़ते हैं ? हे राम ! वनमें भी आपके पास रहते हुए मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है ? ॥ ७२ ॥ जो भी फल-मूलादि आपके खानेसे बचेंगे वे ही मेरे लिये अमृतके समान होंगे । उनसे सन्तुष्ट होकर मैं आनन्दपूर्वक रहूँगी ॥ ७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके साथ विचरते हुए मेरे लिये कुश-कास और कण्टकादि भी फूलोंके समान होंगे ॥ ७४ ॥ मैं आपको किसी प्रकारका कष्ट न दूँगी, बल्कि आपके कार्यमें सहायिका होऊँगी । बाल्यावस्थामें एक ज्योतिषशास्त्र-विशारद महात्माने मुझे देखकर कहा था कि तू अपने पतिके साथ वनमें रहेगी । उन ब्राह्मण महोदयका वाक्य सत्य हो, मैं अवश्य आपके साथ वनमें चलूँगी ॥ ७५-७६ ॥ एक बात और कहती हूँ, उसे सुनकर आप मुझे वनको ले चलिये । आपने बहुत-से |