अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
|---|
अन्यत्किञ्चित्प्रवक्ष्यामि श्रुत्वा मां नय काननम्।
रामायणानि बहुशः श्रुतानि बहुभिर्द्विजैः ॥७७॥
सीतां विना वनं रामो गतः किं कुत्राचिद्वद ।
अतस्त्वया गमिष्यामि सर्वथा त्वत्सहायिनी ॥७८॥
यदि गच्छसि मां त्यक्त्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः
इति तं निश्चयं ज्ञात्वा सीताया रघुनन्दनः ॥७९॥
अब्रवीद्देवि गच्छ त्वं वनं शीघ्रं मया सह ।
अरुन्धत्यै प्रयच्छाशु हारानाभरणानि च ॥८०॥
ब्राह्मणेभ्यो धनं सर्वं दत्त्वा गच्छामहे वनम् ।
इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाशु द्विजानाहूय भक्तितः ॥८१॥
ददौ गवां वृन्दशतं धनानि
वस्त्राणि दिव्यानि विभूषणानि ।
कुटुम्बवद्भ्यः श्रुतशीलवद्भ्यो
मुदा द्विजेभ्यो रघुवंशकेतुः ॥८२॥
अरुन्धत्यै ददौ सीता मुख्यान्याभरणानि च ।
रामो मातुः सेवकेभ्यो ददौ धनमनेकधा ॥८३॥
स्वक्रान्तःपुरवासिभ्यः सेवकेभ्यस्तथैव च ।
पौरजानपदेभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ॥८४॥
लक्ष्मणोऽपि सुमित्रां तु कौसल्यायै समर्पयत् ।
धनुष्पाणिः समागत्य रामस्याग्रे व्यवस्थितः ॥८५॥
रामः सीता लक्ष्मणश्च जग्मुः सर्वे नृपालयम् ॥८६॥
श्रीरामः सह सीतया नृपपथे गच्छन् शनैः सानुजः
पौरान् जानपदान्कुतूहलदृशः सानन्दमुद्वीक्षयन् ।
श्यामः कामसहस्रसुन्दरवपुः कान्त्या दिशो भासयन् ।
पादन्यासपवित्रिताऽखिलजगत् प्रापालयं तत्पितुः ॥८७॥
हिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणोंके मुखसे बहुत-सी रामायणें सुनी होंगी ॥७७॥ बताइये, इनमेंसे किसीमें भी क्या सीताके बिना रामजी वनको गये हैं ? अतः मैं आपकी पूर्णतया सहायिका होकर अवश्य आपके साथ चलूँगी ॥७८॥ यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अभी आपके सामने ही अपने प्राण छोड़ दूँगी।"
तब रघुनाथजीने सीताका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर कहा—"देवि ! तुम शीघ्र ही मेरे साथ वनको चलो; ये हार आदि सम्पूर्ण आभूषण वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीको दे दो ॥७९-८०॥ हम अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर वनको चलेंगे।"
ऐसा कह भगवान् रामने लक्ष्मणजीद्वारा भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको बुलवाया ॥८१॥ और उन रघुकुलकेतु भगवान् रामने प्रसन्नतापूर्वक सैकड़ों गौओंके झुण्ड, बहुत-सा धन, दिव्य वस्त्र और आभूषण कुटुम्बी तथा विद्वान् और शीलसम्पन्न ब्राह्मणोंको दिये ॥८२॥
सीताजीने अपने मुख्य-मुख्य आभूषण अरुन्धतीजीको दे दिये तथा अपनी माताके सेवकोंको भी रामने बहुत-सा धन दिया ॥८३॥ इसी प्रकार अपने अन्तःपुरवासी सेवकों, पुरवासियों, देशवासियों तथा ब्राह्मणोंको भी उन्होंने बहुत-सा धन दिया ॥८४॥
इधर श्रीलक्ष्मणजीने भी अपनी माता सुमित्राको कौसल्याजीको सौंप दिया और आप हाथमें धनुष लेकर रामके सामने आकर खड़े हो गये । तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता सब महाराज दशरथके पास चले ॥८५-८६॥
सहस्रों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम शरीरवाले भगवान् राम सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित अपनी कान्तिसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए धीरे-धीरे राजमार्गसे चले । उस समय जो पुरवासी और जनपदवासी लोग कुतूहलवश आनन्दमयी दृष्टिसे उनकी ओर देख रहे थे उनके देखते हुए और अपने चरण-स्पर्शसे सम्पूर्ण संसारको पवित्र करते हुए वे अपने पिताके घर पहुँचे ॥८७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
चतुर्थः सर्गः ॥४॥