भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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[ सर्ग ५ ] | अयोध्याकाण्ड | ६५

पञ्चम सर्ग

भगवान्‌का वनगमन

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—जानकी और लक्ष्मणके सहित
आयान्तं नागरा दृष्ट्वा मार्गे रामं सजानकिम् ।<br>लक्ष्मणेन समं वीक्ष्य ऊचुः सर्वे परस्परम् ॥ १ ॥<br>कैकेय्या वरदानादि श्रुत्वा दुःखसमावृताः ।<br>बत राजा दशरथः सत्यसन्धं प्रियं सुतम् ॥ २ ॥<br>स्त्रीहेतोरत्यजत्कामी तस्य सत्यवता कुतः ।<br>कैकेयी वा कथं दुष्टा रामं सत्यं प्रियङ्करम् ॥ ३ ॥<br>विवासयामास कथं क्रूरकर्माऽतिमूढधीः ।<br>हे जना नात्र वस्तव्यं गच्छामोऽद्यैव काननम् ॥ ४॥<br>यत्र रामः सभार्यश्च सानुजो गन्तुमिच्छति ।<br>पश्यन्तु जानकीं सर्वे पादचारेण गच्छतीम् ॥ ५ ॥<br>पुंभिः कदाचिद्दृष्टा वा जानकी लोकसुन्दरी ।<br>साऽपि पादेन गच्छन्ती जनसङ्घेष्वनावृता ॥ ६ ॥<br>रामोऽपि पादचारेण गजाश्वादि विवर्जितः ।<br>गच्छति द्रक्ष्यथ विभुं सर्वलोकैकसुन्दरम् ॥ ७॥<br>राक्षसी कैकेयीनाम्नी जाता सर्वविनाशिनी ।<br>रामस्यापि भवेद्दुःखं सीतायाः पादयानतः ॥ ८ ॥<br>बलवान्विधिरेवात्र पुंप्रयत्नो हि दुर्बलः ।श्रीरामचन्द्रजीको मार्गमें आते देख और कैकेयीके वरदानादिका समाचार सुन समस्त नगरवासी दुःखार्तुर होकर आपसमें कहने लगे—“हाय ! कामवश राजा दशरथने अपने सत्यपरायण प्रिय पुत्रको स्त्रीके कहनेसे क्यों छोड़ दिया ? उसकी सत्यता कहाँ चली गयी ? और दुष्टा कैकेयीने भी सत्यवादी और प्रियकारी रामको क्यों वनवास दिया ? वह ऐसी क्रूरकर्मा और हतबुद्धि क्यों हो गयी ? भाइयो ! अब हमें यहाँ न रहना चाहिये; हम भी आज ही वनको चलेंगे, जहाँ स्त्री और छोटे भाईके सहित श्रीराम जाना चाहते हैं। देखो तो, आज जानकीजी पैदल चल रही हैं ॥ १-५ ॥ हाय ! जिस त्रिलोकसुन्दरी जानकीको पहले कभी किसी पुरुषने शायद ही देखा हो, वही आज बिना किसी परदेके जनसमूहमें पैदल चल रही हैं ॥ ६ ॥ भाइयो ! इन सर्वलोकैकसुन्दर भगवान् रामकी ओर भी देखो; ये भी आज बिना हाथी-घोड़ेके पैदल ही जा रहे हैं ॥ ७ ॥ यह कैकेयी-नामकी राक्षसी सबका नाश करनेके लिये उत्पन्न हुई है। भाई ! इन सीताजीके पैदल चलनेसे रामजीको भी तो बड़ा दुःख होता होगा ॥ ८ ॥ किन्तु किया क्या जाय ? इसमें दैव ही प्रबल है, पुरुषका प्रयत्न सर्वथा असमर्थ है ।”
इति दुःखाकुले वृन्दे साधूनां मुनिपुङ्गवः ॥ ९ ॥<br>अब्रवीद्वामदेवोऽथ साधूनां सङ्घमध्यगः ।<br>मानुशोचथ रामं वा सीतां वा वच्मि तत्त्वतः ॥ १० ॥<br>एष रामः परो विष्णुरादिनारायणः स्मृतः ।<br>एषा सा जानकी लक्ष्मीर्योगमायेति विश्रुता ॥ ११ ॥<br>असौ शेषस्तमन्वेति लक्ष्मणाख्यश्च साम्प्रतम् ।<br>एष मायागुणैर्युक्तस्तत्तदाकारवानिव ॥ १२ ॥<br>एष एव रजोयुक्तो ब्रह्माऽभूद्विश्वभावनः ।<br>सत्त्वाविष्टस्तथा विष्णुस्त्रिजगत्प्रतिपालकः ॥ १३॥इस प्रकार साधु-समाजको दुःखार्तुर देख मुनिवर वामदेव उनके बीचमें आकर कहने लगे—“मैं आप-लोगोंको वास्तविक बात बताता हूँ, आप इन राम और सीताके लिये किसी प्रकारकी चिन्ता न करें ॥ ९-१० ॥ ये राम आदिनारायण भगवान् विष्णु हैं और ये जानकीजी योगमाया नामसे विख्यात श्रीलक्ष्मीजी हैं ॥ ११ ॥ इस समय जो लक्ष्मण नाम धारणकर इनका अनुगमन कर रहे हैं ये शेषजी हैं। ये पुरुषोत्तम भगवान् ही मायाके गुणोंसे युक्त होकर विभिन्न आकारवाले-से प्रतीत हुआ करते हैं ॥ १२ ॥ रजोगुणसे युक्त होकर ये ही विश्वरचयिता ब्रह्माजी हुए हैं और सत्त्वगुणविशिष्ट होनेपर ये ही त्रिलोक-