अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
एष रुद्रस्तामसोऽन्ते जगत्प्रलयकारणम् । एष मत्स्यः पुरा भूत्वा भक्तं वैवस्वतं मनुम् ॥१४॥ नाव्यारोप्य लयस्यान्ते पालयामास राघवः । समुद्रमथने पूर्वं मन्दरे सुतलं गते ॥१५॥ अधारयत्स्वपृष्ठेऽद्रिं कूर्मरूपी रघूत्तमः । महीं रसातलं याता प्रलये सूकरोऽभवत् ॥१६॥ तोलयामास दंष्ट्राग्रे तां क्षोणीं रघुनन्दनः । नारसिंहं वपुः कृत्वा प्रह्लादवरदः पुरा ॥१७॥ त्रैलोक्यकण्टकं रक्षः पाटयामास तन्नखैः । पुत्रराज्यं हृतं दृष्ट्वा ह्यदित्या याचितः पुरा ॥१८॥ वामनत्वमुपागम्य याच्ञया चाहरतपुनः । दुष्टक्षत्रियभूभारनिवृत्त्यै भार्गवोऽभवत् ॥१९॥ स एव जगतां नाथ इदानीं रामतां गतः । रावणादीनि रक्षांसि कोटिशो निहनिष्यति ॥२०॥ मानुषेणैव मरणं तस्य दृष्टं दुरात्मनः । राज्ञा दशरथेनापि तपसाऽऽराधितो हरिः ॥२१॥ पुत्रत्वाकाङ्क्षया विष्णोस्तदा पुत्रोऽभवद्धरिः । स एव विष्णुः श्रीरामो रावणादिवधाय हि ॥२२॥ गन्ताऽद्यैव वनं रामो लक्ष्मणेन सहायवान् । एषा सीता हरेर्माया सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥२३॥ राजा वा कैकेयी वापि नात्र कारणमण्वपि । पूर्वेद्युर्नारदः प्राह भूभारहरणाय च ॥२४॥ रामोऽप्याह स्वयं साक्षाच्छ्वो गमिष्याम्यहं वनम् । अतो रामं समुद्दिश्य चिन्तां त्यजत बालिशाः ॥२५॥ रामरामेति ये नित्यं जपन्ति मनुजा भुवि । तेषां मृत्युभयादीनि न भवन्ति कदाचन ॥२६॥
रक्षक भगवान् विष्णु होते हैं ॥१३॥ तथा कल्पान्त-में तमोगुणका आश्रय कर ये ही जगत्का प्रलय करनेवाले रुद्र होते हैं । पूर्वकालमें इन्हीं रघुनाथजीने मत्स्यरूप होकर अपने भक्त वैवस्वत मनुको नावमें बैठाकर प्रलयकालके समय उनकी रक्षा की थी । समुद्र-मन्थनके समय, जब मन्दराचल पाताल-लोकको जाने लगा ॥१४-१५॥ तब इन्हीं रघुनाथजीने कूर्मरूप होकर उसे अपनी पीठपर धारण किया था । प्रलयकालमें जब पृथिवी रसातलको चली गयी तो ये शूकररूप हुए ॥१६॥ और उस पृथिवीको अपनी दाढ़ोंपर उठा लिया । इसी प्रकार एक बार प्रह्लादको वर देनेके लिये इन्होंने नृसिंहरूप धारण किया ॥१७॥ और तीनों लोकोंके कण्टकरूप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको अपने नखोंसे फाड़ डाला । एक बार, अपने पुत्र इन्द्रका राज्य गया हुआ देख जब अदितिने इनसे प्रार्थना की ॥१८॥ तब इन्होंने वामनरूप धारणकर याचना करके उसे फिर लौटा लिया । इन्होंने पृथिवीके भाररूप दुष्ट क्षत्रिय-गणोंको नष्ट करनेके लिये भृगुपुत्र परशुरामका रूप धारण किया था ॥१९॥ वे ही जगत्प्रभु इस समय रामरूपसे प्रकट हुए हैं; अब ये रावण आदि करोड़ों राक्षसोंका वध करेंगे ॥२०॥ उस दुरात्माकी मृत्यु मनुष्यके हाथ ही बदी है । महाराज दशरथने (अपने पूर्वजन्ममें) तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी इसलिये आराधना की थी कि वे उनके यहाँ पुत्ररूपसे अवतार लें; इसलिये भगवान् इनके पुत्र हुए हैं । वे विष्णु भगवान् ही श्रीरामचन्द्रजी हैं । अब ये रावणके वधके लिये आज ही लक्ष्मणसहित वनको जायेंगे । ये सीताजी जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाली साक्षात् भगवान्की माया हैं ॥२१-२३॥ इनके वन-गमनमें राजा या कैकेयी अणुमात्र भी कारण नहीं हैं । कल ही इनसे नारदजीने पृथिवी-का भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी ॥२४॥ उस समय स्वयं रामने भी उनसे यही कहा था कि कल मैं वनको जाऊँगा । अतः भोले भाइयो ! आप-लोग रामके लिये कोई चिन्ता न करें ॥२५॥ संसारमें जो लोग नित्य प्रति 'राम-राम' जपा करते हैं उनको भी किसी समय मृत्युके भय आदि नहीं