भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 423 में से

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पृष्ठ 88

सर्ग ५] अयोध्याकाण्ड ६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
का पुनस्तस्य रामस्य दुःखशङ्का महात्मनः।<br>रामनाम्नैव मुक्तिः स्यात्कलौ नान्येन केनचित् ॥२७॥होते ॥२६॥ फिर उन महात्मा रामके लिये तो दुःखकी शंका ही कैसे हो सकती है ? कलियुगमें तो एकमात्र राम-नामसे ही मुक्ति हो सकती है और किसी उपायसे नहीं ॥२७॥
मायामानुषरूपेण विडम्बयति लोककृत् ।<br>भक्तानां भजनार्थाय रावणस्य वधाय च ॥२८॥ये जगत्कर्त्ता प्रभु भक्तोंको गुण-कीर्तनका सुयोग देनेके लिये और रावणको मारनेके लिये ही मायामानुषरूपसे संसारमें लीला कर रहे हैं ॥२८॥
राजाभीष्टसिद्धयर्थं मानुषं वपुराश्रितः ।<br>इत्युक्त्वा विररामाथ वामदेवो महामुनिः ॥२९॥इसके सिवा राजा दशरथकी मनोरथ-सिद्धिके लिये भी इन्होंने यह मनुष्य-शरीर धारण किया है।" ऐसा कह महामुनि वामदेवजी मौन हो गये ॥२९॥
श्रुत्वा तेऽपि द्विजाः सर्वे रामं ज्ञात्वा हरिं विभुम् ।<br>जहुर्हृत्संशयग्रन्थि राममेवान्वचिन्तयन् ॥३०॥यह सुन वहाँ एकत्रित हुए सब द्विजगणोंने भी भगवान् रामको सर्वव्यापक श्रीविष्णु भगवान् जाना और वे अपने हृदयका संशय छोड़कर श्री-रामचन्द्रजीका ही स्मरण करने लगे ॥३०॥
य इदं चिन्तयेन्नित्यं रहस्यं रामसीतयोः।<br>तस्य रामे दृढा भक्तिर्भवेद्विज्ञानपूर्विका ॥३१॥'जो पुरुष नित्यप्रति राम और सीताके इस रहस्यका मनन करेगा, उसकी भगवान् राममें विज्ञानके सहित दृढ-भक्ति हो जायगी ॥३१॥
रहस्यं गोपनीयं वो यूयं वै राघवप्रियाः ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तेऽपि रामं परं विदुः ॥३२॥आप सब लोग रामके परम प्रिय हैं अतः इस रहस्यको सदा गुप्त रक्खें।' ऐसा कह विप्रवर वामदेवजी वहाँसे चले गये और पुरजनोंने भी जाना कि राम परमात्मा हैं ॥३२॥
ततो रामः समाविश्य पितुर्गेहमवारितः ।<br>सानुजः सीतया गत्वा कैकेयीमिदमब्रवीत् ॥३३॥तदनन्तर रामजीने बिना किसी रोक-टोकके पिताके महलमें प्रवेश किया और लक्ष्मण तथा सीताके सहित वहाँ पहुँचकर कैकेयीसे कहा—॥३३॥
आगताः स्मो वयं मातस्त्वयस्ते सम्मतं वनम् ।<br>गन्तुं कृतधियः शीघ्रमाज्ञापयतु नः पिता ॥३४॥"माताजी ! आपके कथनानुसार हम तीनों बनको जानेके लिये तैयार होकर आ गये हैं; अब शीघ्र ही पिताजी हमें आज्ञा दें" ॥३४॥
इत्युक्ता सहसोत्थाय चीराणि प्रददौ स्वयम् ।<br>रामाय लक्ष्मणायाथ सीतायै च पृथक् पृथक् ॥३५॥रामके ऐसा कहनेपर कैकेयीने सहसा उठकर स्वयं ही राम, लक्ष्मण और सीताको अलग-अलग वल्कल-वस्त्र दिये ॥३५॥
रामस्तु वस्त्राण्युत्सृज्य वन्यचीराणि पर्यधात् ।<br>लक्ष्मणोऽपि तथा चक्रे सीता तन्न विजानती ॥३६॥तब रामचन्द्रजीने अपने राजोचित वस्त्रोंको उतारकर बनवासियोंके-से वस्त्र धारण किये; लक्ष्मणजीने भी ऐसा ही किया किन्तु सीताजी उन्हें पहनना नहीं जानती थीं ॥३६॥
हस्ते गृहीत्वा रामस्य लज्जया मुखमैक्षत ।<br>रामो गृहीत्वा तच्चीरमंशुके पर्यवेष्टयत् ॥३७॥अतः उन वस्त्रोंको हाथमें लेकर वे लज्जापूर्वक रामजीकी ओर देखने लगीं । तब रामचन्द्रजीने उस चीरको लेकर सीताजीके वस्त्रोंपर ही लपेट दिया ॥३७॥
तद्दृष्ट्वा रुरुदुः सर्वे राजदाराः समन्ततः ।<br>वसिष्ठस्तु तदाकर्ण्य रुदितं भर्त्सयन् रुषा ॥३८॥यह देखकर रनिवासकी सभी स्त्रियाँ रोने लगीं । तब वसिष्ठजीने उनके रोनेका शब्द सुनकर क्रोधित हो कैकेयीको डाँटते हुए कहा—"अयि दुःशीले !
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