भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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७४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

ननाम शिरसा रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।<br>दृष्ट्वां रामं रमानाथं वाल्मीकिर्लोकसुन्दरम् ॥४५॥<br>जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ।<br>कन्दर्पसदृशाकारं कमनीयाम्बुजेक्षणम् ॥४६॥ | लक्ष्मण और सीताके सहित उन्हें शिर झुकाकर प्रणाम किया। तब श्रीवाल्मीकिजीने सुन्दर कमलके समान नेत्रवाले, कामदेवकी-सी आकृतिवाले, जटा-मुकुटधारी, त्रिलोकमोहन लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित देखा ॥ ४५-४६ ॥ दृष्ट्वैव सहसोत्तस्थौ विस्मयानिमिपेक्षणः ।<br>आलिङ्ग्य परमानन्दं रामं हर्षाश्रुलोचनः ॥४७॥ | उन्हें देखते ही श्रीवाल्मीकिजी सहसा उठ खड़े हुए, उनके नेत्र आश्चर्यसे निमेषशून्य हो गये और उन्होंने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर परमानन्दस्वरूप श्री-रामचन्द्रजीका आलिंगन किया ॥ ४७ ॥ तथा अति पूजयित्वा जगत्पूज्यं भक्त्यार्घ्यादिभिरादृतः ।<br>फलमूलैः स मधुरैर्भोजयित्वा च लालितः ॥४८॥ | भक्तिभावसे जगत्पूज्य भगवान् रामकी अर्ध्यादिसे सादर पूजा कर उन्हें मीठे-मीठे फल-मूलादि खिलाकर उनका लालन किया ॥ ४८ ॥ राघवः प्राञ्जलिः प्राह वाल्मीकिं विनयान्वितः ।<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानागता वयम् ॥४९॥ | तब श्रीरघुनाथजीने अति नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रीवाल्मीकिजीसे कहा—"हम पिताजीकी आज्ञा मान कर दण्डक-वनमें आये हैं ॥ ४९ ॥ आप भवन्तो यदि जानन्ति किं वक्ष्यामोऽत्र कारणम् ।<br>यत्र मे सुखवासाय भवेत्स्थानं वदस्व तत् ॥५०॥ | सब कुछ जानते ही हैं, फिर हम आपको इसका कारण क्या बताएँ ? अब आप मुझे कोई ऐसा स्थान बताइये जहाँ मैं सुखपूर्वक रह सकूँ ॥ ५० ॥ सीतया सहितः कालं किञ्चित्त्र नयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो राघवेणासौ मुनिः सस्मितमब्रवीत् ॥५१॥ | आपके बताये हुए उस स्थानमें मैं सीताके साथ रहकर कुछ समय विताऊँगा ।" त्वमेव सर्वलोकानां निवासस्थानमुत्तमम् ।<br>तवापि सर्वभूतानि निवाससदनानि हि ॥५२॥ | रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर मुनिवरने मुसकरा-कर कहा—॥ ५१ ॥ "हे राम ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आप ही एकमात्र उत्तम निवास-स्थान हैं और सब जीव भी आपके निवास-गृह हैं ॥ ५२ ॥ हे रघुनन्दन ! एवं साधारणं स्थानमुक्तं ते रघुनन्दन ।<br>सीतया सहितस्येति विशेषं पृच्छतस्तव ॥५३॥ | इस प्रकार यह मैंने आपका साधारण निवास-स्थान बताया, परन्तु आपने विशेषरूपसे सीताके सहित अपने रहनेका स्थान पूछा है इसलिये हे रघुश्रेष्ठ ! अब तद्वक्ष्यामि रघुश्रेष्ठ यत्ते नियतमन्दिरम् ।<br>शान्तानां समदृष्टीनामद्वेष्टृणां च जन्तुषु ।<br>त्वामेव भजतां नित्यं हृदयं तेऽधिमन्दिरम् ॥५४॥ | मैं आपका जो निश्चित गृह है वह बताता हूँ। जो शान्त, समदर्शी और सम्पूर्ण जीवोंके प्रति द्वेषहीन हैं तथा अहर्निश आपका ही भजन करते हैं उनका हृदय आपका प्रधान निवास-स्थान है ॥ ५३-५४ ॥ जो धर्माधर्मान्परित्यज्य त्वामेव भजतोऽनिशम् ।<br>सीतया सह ते राम तस्य हृत्सुखमन्दिरम् ॥५५॥ | धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़कर निरन्तर आपका ही भजन करता है, हे राम ! उसके हृदय-मन्दिरमें सीताके सहित आप सुखपूर्वक रहते हैं ॥ ५५ ॥ जो त्वन्मन्त्रजापको यस्तु त्वामेव शरणं गतः ।<br>निर्द्वन्द्वो निःस्पृहस्तस्य हृदयं ते सुमन्दिरम् ॥५६॥ | आपहीके मन्त्रका जाप करता है, आपहीकी शरणमें रहता है तथा द्वन्द्वहीन और निःस्पृह है उसका हृदय आपका सुन्दर मन्दिर है ॥ ५६ ॥ जो अहंकारशून्य, निरहङ्कारिणः शान्ता ये रागद्वेषवर्जिताः । | शान्तस्वभाव, राग-द्वेष-रहित और मृत्पिण्ड, पत्थर

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