भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७५


समलोष्टाश्मकनकास्तेषां ते हृदयं गृहम् ॥ ५७ ॥
त्वयि दत्तमनोबुद्धिर्यः सन्तुष्टः सदा भवेत् ।
त्वयि सन्त्यक्तकर्मा यस्तन्मनस्ते शुभं गृहम् ॥ ५८ ॥
यो न द्वेष्ट्यप्रियं प्राप्य प्रियं प्राप्य न हृष्यति ।
सर्वं मायेति निश्चित्य त्वां भजेत्तन्मनो गृहम् ॥ ५९ ॥
षड्भावादिविकारान्यो देहे पश्यति नात्मनि ।
क्षुत्तृट् सुखं भयं दुःखं प्राणबुद्ध्योर्निरीक्षते ॥ ६० ॥
संसारधर्मैर्निर्मुक्तस्तस्य ते मानसं गृहम् ॥ ६१ ॥
पश्यन्ति ये सर्वगुहाशयस्थं
  त्वां चिद्धनं सत्यमनन्तमेकम् ।
अलेपकं सर्वगतं वरेण्यं
  तेषां हृदब्जे सह सीतया वस ॥ ६२ ॥
निरन्तराभ्यासदृढीकृतात्मनां
  त्वत्पादसेवापरिनिष्ठितानाम् ।
त्वन्नामकीर्त्या हतकल्मषाणां
  सीतासमेतस्य गृहं हृदब्जे ॥ ६३ ॥
राम त्वन्नाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ।
यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् ॥ ६४ ॥
अहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वर्धितः ।
जन्ममात्राद्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥ ६५ ॥
शूद्रायां बहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः ।
ततश्चौरैश्च सङ्गम्य चौरोऽहमभवं पुरा ॥ ६६ ॥
धनुर्बाणधरो नित्यं जीवानामान्तकोपमः ।
एकदा मुनयः सप्त दृष्टा महति कानने ॥ ६७ ॥
साक्षान्मया प्रकाशन्तो ज्वलनार्कसमप्रभाः ।
तानन्वधावं लोभेन तेषां सर्वपरिच्छदान् ॥ ६८ ॥


तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं, उनका हृदय आपका घर है ॥ ५७ ॥ जो तुम्हींमें मन और बुद्धिको लगाकर सदा सन्तुष्ट रहता है और अपने समस्त कर्मोंको तुम्हारे ही अर्पण कर देता है उसका मन ही आपका शुभ गृह है ॥ ५८ ॥ जो अप्रियको पाकर द्वेष नहीं करता और प्रियको पाकर हर्षित नहीं होता तथा 'यह सम्पूर्ण प्रपञ्च मायामात्र है' ऐसा निश्चय कर सदा आपका भजन करता है उसका मन ही आपका घर है ॥ ५९ ॥ जो (सत्ता, जन्म लेना, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना इन) छः विकारोंको शरीरमें ही देखता है, आत्मामें नहीं; तथा क्षुधा, तृषा, सुख, दुःख और भय आदिको प्राण और बुद्धिके ही धर्म मानता है और स्वयं सांसारिक धर्मोंसे मुक्त रहता है उसका चित्त आपका निज गृह है ॥ ६०-६१ ॥ जो लोग चिद्घन, सत्यस्वरूप, अनन्त, एक, निर्लेप, सर्वगत और स्तुत्य आप परमेश्वरको समस्त अन्तःकरणोंमें विराजमान देखते हैं, हे राम ! उनके हृदय-कमलमें आप सीताजीके सहित निवास कीजिये ॥ ६२ ॥ निरन्तर अभ्यास करनेसे जिनका हृदय स्थिर हो गया है, जो सर्वदा आपकी चरण-सेवामें लगे रहते हैं तथा आपके नाम-संकीर्तनसे जिनके पाप नष्ट हो गये हैं उनके हृदय-कमलमें सीताके सहित आपका निवास-गृह है ॥ ६३ ॥ हे राम ! जिसके प्रभावसे मैंने ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त किया है, आपके उस नामकी महिमा कोई किस प्रकार वर्णन कर सकता है ? ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें मैं किरातोंके साथ रहता था और उन्हींके साथ रहकर बड़ा हुआ । मैं निरन्तर शूद्रोंके आचरणोंमें रत रहता था, मेरी द्विजातीयता केवल जन्ममात्रकी थी ॥ ६५ ॥ मुझ अजितेन्द्रियके शूद्राके गर्भसे बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए । उस समय चोरोंके समागमसे मैं भी पक्का चोर हो गया था ॥ ६६ ॥ जीवोंके अन्तकर्ता कालके समान मैं सदा धनुष-बाण धारण किये रहता था । एक दिन एक घोर वनमें मैंने साक्षात् सप्तर्षियोंको जाते देखा । वे अपनी प्रभासे अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशमान थे । उनके सम्पूर्ण वस्त्रादि छीननेकी इच्छासे मैं लोभके वश होकर उनके पीछे दौड़ा और बोला—'ठहरो, ठहरो।' तब मुनीश्वरोंने मेरी ओर देखकर पूछा—'हे द्विजाधम !