भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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७६अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

ग्रहीतुकामस्तत्राहं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवम् ।
दृष्ट्वा मां मुनयोऽपृच्छन्किमायासि द्विजांधम । ६९।
अहं तानब्रवं किञ्चिद्दातुं मुनिसत्तमाः ।
पुत्रदारादयः सन्ति बहवो मे बुभुक्षिताः ॥७०॥
तेषां संरक्षणार्थाय चरामि गिरिकानने ।
ततो मामूचुरव्यग्राः पृच्छ गत्वा कुटुम्बकम् ॥७१॥
यो यो मया प्रतिदिनं क्रियते पापसञ्चयः ।
यूयं तद्भागिनः किं वा नेति वेति पृथक्पृथक् ॥७२॥
वयं स्थास्यामहे तावदागमिष्यसि निश्चयः ।
तथेत्युक्त्वा गृहं गत्वा मुनिभिर्यदुदीरितम् ॥७३॥
अपृच्छं पुत्रदारादींस्तैरुक्तोऽहं रघूत्तम ।
पापं तवैव तत्सर्वं वयं तु फलभागिनः ॥७४॥
तच्छ्रुत्वा जातानिर्वेदो विचार्य पुनरागमम् ।
मुनयो यत्र तिष्ठन्ति करुणापूर्णमानसाः ॥७५॥
मुनीनां दर्शनादेव शुद्धान्तःकरणोऽभवम् ।
धनुरादीन्परित्यज्य दण्डवत्पतितोऽस्म्यहम् ॥७६॥
रक्षध्वं मां मुनिश्रेष्ठा गच्छन्तं निरयार्णवम् ।
इत्यग्रे पतितं दृष्ट्वा मामूचुर्मुनिंसत्तमाः ॥७७॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते सफलः सत्समागमः ।
उपदेक्ष्यामहे तुभ्यं किञ्चित्तेनैव मोक्ष्यसे ।
परस्परं समालोच्य दुर्वृत्तोऽयं द्विजाधमः ॥७८॥
उपेक्ष्य एव सद्वृत्तैस्तथापि शरणं गतः ।
रक्षणीयः प्रयत्नेन मोक्षमार्गोपदेशतः ॥७९॥
इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् ।
एकाग्रमनसाऽत्रैव मरेति जप सर्वदा ॥८०॥
आगच्छामः पुनर्यावत्तावदुक्तं सदा जप ।
इत्युक्त्वा प्रययुः सर्वे मुनयो दिव्यदर्शनाः ॥८१॥
अहं यथोपदिष्टं तैस्तथाऽकरवमञ्जसा ।
जपन्नेकाग्रमनसा वाह्यं विस्मृतवानहम् ॥८२॥

क्यों आ रहा है ?” ॥ ६७–६९ ॥ मैंने कहा—"हे मुनिश्रेष्ठगण ! मेरे बहुत-से भृत्य पुत्र-कलत्रादि हैं। अतः उनके पोषणार्थ कुछ लेनेके लिये आ रहा हूँ ॥ ७० ॥ उन्हींका पालन-पोषण करनेके लिये मैं वन-पर्वतादिमें घूमता फिरता हूँ।” तब उन मुनीश्वरोंने मुझसे निर्भयतापूर्वक कहा—"अच्छा, एक बार तू अपने कुटुम्बियोंके पास जाकर प्रत्येकसे अलग-अलग पूछ कि मैं प्रतिदिन जो पाप-सञ्चय करता हूँ उनके आप लोग भी भागी हैं या नहीं ? ॥ ७१-७२ ॥ इस बातका निश्चय रख कि जबतक तू लौटकर आयेगा हम यहीं रहेंगे।” मैं 'बहुत अच्छा' कह अपने घर आया और जिस प्रकार मुनीश्वरोंने मुझसे कहा था मैंने अपने पुत्र-स्त्री आदिसे पूछा । हे रघूश्रेष्ठ ! तब वे बोले, “वह पाप तो सब तुम्हींको लगेगा, हम तो उससे प्राप्त हुए फल (धन आदि) को ही भोगनेवाले हैं” ॥७३-७४॥ यह सुनकर मुझे अति वैराग्य हुआ और मैं विचार करता हुआ, जहाँ करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले मुनीश्वर थे, वहाँ आया ॥७५॥ तब उन मुनीश्वरोंके दर्शनमात्रसे ही मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया और मैं धनुष आदिको फेंककर दण्डके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७६ ॥ 'हे मुनिश्रेष्ठगण ! इस पाप-समुद्रमें पड़े हुए मेरी आप रक्षा कीजिये'—इस प्रकार चिल्लाते हुए मुझे अपने सामने पड़ा देख वे मुनिश्रेष्ठ मुझसे बोले— ॥ ७७ ॥ "खड़ा हो, खड़ा हो, तेरा सत्संग सफल हो गया है; तेरा अवश्य कल्याण होगा । हम तुझे थोड़ा-सा उपदेश करते हैं उसीसे तू मुक्त हो जायगा।” तब उन्होंने आपसमें मिलकर यह विचार किया कि यद्यपि यह ब्राह्मणाधम अत्यन्त दुराचारी होनेसे श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये उपेक्षाका ही पात्र है तथापि अब यह शरणमें आ गया है, इसलिये मोक्ष-मार्गके उपदेशद्वारा इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी ही चाहिये ॥ ७८-७९ ॥ हे राम ! ऐसा विचारकर उन्होंने आपके नामाक्षरोंको उलटा करके मुझसे कहा "तू इसी स्थानपर रहकर एकाग्र-चित्तसे सदा 'मरा-मरा' जपा कर ॥ ८० ॥ जबतक हम फिर लौटकर आयें तबतक तू सर्वदा हमारे कथनानुसार इसका जाप कर।” ऐसा कहकर वे सब दिव्य-दर्शन मुनीश्वर चले गये ॥ ८१ ॥ तब उन्होंने मुझे जैसा उपदेश दिया था मैंने ठीक वैसा ही