अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ६ ] अयोध्याकाण्ड ७७
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं बहुतिथे काले गते निश्चलरूपिणः ।<br>सर्वसङ्गविहीनस्य वल्मीकोऽभून्ममोपरि ॥८३॥<br><br>ततो युगसहस्रान्ते ऋषयः पुनरागमन् ।<br>मामूचुर्निष्क्रमस्वेति तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थितः ॥८४॥<br><br>वल्मीकान्निर्गतश्चाहं नीहारादिव भास्करः ।<br>मामप्याहुर्मुनिगणा वाल्मीकिस्त्वं मुनीश्वर ॥८५॥<br><br>वल्मीकात्सम्भवो यस्माद्वितीयं जन्म तेऽभवत् ।<br>इत्युक्त्वा ते ययुर्दिव्यगतिं रघुकुलोत्तम ॥८६॥<br><br>अहं ते राम नाम्नश्च प्रभावादीदृशोऽभवम् ।<br>अद्य साक्षात्प्रपश्यामि ससीतं लक्ष्मणेन च ॥८७॥<br><br>रामं राजीवपत्राक्षं त्वां मुक्तो नात्र संशयः ।<br>आगच्छ राम भद्रं ते स्थलं वै दर्शयाम्यहम् ॥८८॥<br><br>एवमुक्त्वा मुनिः श्रीमांल्लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>शिष्यैः परिवृतो गत्वा मध्ये पर्वतगङ्गयोः ॥८९॥<br><br>तत्र शालां सुविस्तीर्णां कारयामास वासभूः ।<br>प्राक्पश्चिमं दक्षिणोदक् शोभनं मन्दिरद्वयम् ॥९०॥<br><br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>तत्र ते देवसदृशा ह्यवसन् भवनोत्तमे ॥९१॥<br><br>वाल्मीकिना तत्र सुपूजितोऽयं<br>रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन ।<br>देवैर्मुनीन्द्रैः सहितो मुदाऽऽस्ते<br>स्वर्गे यथा देवपतिः स शच्या ॥९२॥ | किया । इस प्रकार निरन्तर एकाग्र-चित्तसे जप करते-करते मुझे बाह्य ज्ञान नहीं रहा ॥ ८२ ॥ इस तरह बहुत समयतक निश्चलतापूर्वक रहनेसे मुझ सर्वसङ्गविहीनके ऊपर वल्मीक (मिट्टीका ढेर) बन गया ॥८३॥<br><br>तदनन्तर, एक हजार युग बीतनेपर वे ऋषीश्वर फिर लौटे और मुझसे कहा—'निकल आओ' यह सुनकर मैं तुरन्त खड़ा हो गया ॥८४॥ और जिस प्रकार कुहरेको पार करके सूर्य निकल आता है उसी प्रकार मैं वल्मीकसे निकल आया । तब मुनिगणने मुझसे कहा “हे मुनिवर ! तुम वाल्मीकि हो ॥ ८५ ॥ इस समय तुम वल्मीकसे निकले हो, इसलिये तुम्हारा यह दूसरा जन्म हुआ है ।” हे रघुश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर वे दिव्यलोकको चले गये ॥ ८६ ॥ हे राम ! आपके नामके प्रभावसे मैं ऐसा हो गया जो आज सीता और लक्ष्मणके सहित साक्षात् आप कमलनयनको देख रहा हूँ । अहा ! मैं निस्सन्देह मुक्त हो गया । हे राम ! आपका मंगल हो, आइये मैं आपको रहनेके लिये स्थान दिखलाता हूँ” ॥८७-८८ ॥<br><br>ऐसा कह शिष्योंसे घिरे हुए श्रीमान् मुनिवर वाल्मीकिजीने लक्ष्मणके सहित गंगा और पर्वतके बीचके स्थलमें जाकर वहाँ भगवान् रामके रहनेके लिये एक सुविशाल शाला बनवायी, उसमें एक पूर्व-पश्चिम और दूसरा उत्तर-दक्षिण ऐसे दो सुन्दर घर बनाये गये ॥ ८९-९० ॥ उस भव्य भवनमें जानकीके सहित श्रीराम और लक्ष्मण देवताओंके समान रहने लगे ॥ ९१ ॥ श्रीवाल्मीकिजीसे भली प्रकार सम्मान पाकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीरामचन्द्रजी वहाँ सीता और लक्ष्मणके साथ इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे जैसे स्वर्गलोकमें शचीके साथ देवराज इन्द्र रहते हैं ॥ ९२ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥